वेद” अनुसार शासक को कब हटा देना चाहिये ? Yogesh Mishra

ऋग्वेद 10.173.1 !! ॠचा 2-4 के अनुसार राज्य सत्ता में एक “पुरोहित” होता था ! कोई जरुरी नहीं कि यह ब्राहमण ही हो ! पुरोहित सत्ता क्षेत्र में “प्रजा का प्रतिनिधित्व” करता था ! राजा का चुनाव होने के पश्चात यह पुरोहित नवनिर्वाचित शासक को सम्बोधित करते हुये यह कहता था कि “मैं तुझे प्रजा के मध्य से चुनकर लाया हूँ ! प्रजा के आदेश से मैं तुझे राजा के पद पर आसीन कर रहा हूँ !” इससे स्पष्ट होता है कि जिसे आज हम चुनाव अधिकारी कहते हैं , उसे वेद ने पुरोहित कहा गया है ! आज के चुनाव अधिकारी इस पुरोहित का ही प्रतिरूप होते हैं !

यह पुरोहित अथवा चुनाव अधिकारी जनता की प्रतिमूर्ति होने के कारण जनता की इच्छानुसार ही राजा को चलाते थे, ज्यों ही प्रजा किसी राजा से अथवा किसी शासक दल से विमुख होती थी, त्यों ही यह पुरोहित या चुनाव अधिकारी उस राजा को हटा कर दूसरा शासक चुनने के लिए पुनः जनता के पास जाता था ! समस्या तो उस समय पैदा होती थी, जब शासक अथवा राजा प्रजा की चिंता भी नहीं करता था और पद को छोड़ने के लिए तैयार भी नहीं होता था, जैसा कि हम विगत कई वर्षों से भारत के कई राज्यों में देख रहे थे !

प्रजा ने वर्तमान समय में कई राज्यों (बिहार,केरल,पश्चिम बंगाल, आदि) में शासकों का भरपूर विरोध किया किन्तु यहाँ का शासक निरंकुश बनकर कहने लगा “हम जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं, अब जनता में से कोई भी हमारे विरोध में नहीं बोला सकता! जो बोलेगा, उसे हम कुचल कर रख देंगे !” इससे हमारे देश के विभिन्न राज्यों में अव्यवस्था को बल मिला है तथा समस्याएँ खडी हुई हैं !

वेदों में नए राजा को उपदेश करते हुए चुनाव अधिकारी अथवा “पुरोहित” आगे कहता है कि जनता के निर्णय के अनुसार मैं तुझे इस देश की सत्ता का अधिकारी बना रहा हूँ ! तू इस सत्ता पर स्थिर हो, इस का अधिष्ठाता बन , तू इस सत्ता पर बैठ कर जनता के लिए कार्य कर ! इस शासन को संभालने के पश्चात तूं कभी भी अपने कर्तव्य से विचलित मत होना ! बड़ी से बड़ी समस्या आने पर भी घबराना नहीं ! तुझे उत्तम मान कर ही यह शासन की चाबी तेरे हाथ में दी गई है ! तुझे तत्काल उत्तम निर्णय लेने की शक्ति है, तेरे में उत्तम व्यवस्था करने के गुण जनता द्वारा प्रदत्त हैं ! यदि तूं ठीक से इस कार्य को करता रहेगा तो मैं (जनता) तेरे साथ हूँ तथा यह जनता, यह प्रजा भी तेरा आदर करती रहेगी !

ज्यों ही तूने जनता को भुला दिया, जनता की इच्छा के विरुद्ध कार्य करने लगा त्यों ही तुझे इस सत्ता से वंचित कर दिया जावेगा ! वेदों के अनुसार पुरोहित आगे कहता है कि अब तूं किसी एक समुदाय का, किसी एक दल का प्रतिनिधि नहीं है, अब पूरे देश की जनता का तू प्रतिनिधि है, शासक है ! तूं ऐसे कार्य कर की देश की पूरी की पूरी प्रजा तुझे पसंद करे, तुझे चाहे तथा तेरी कामना करे ! सारी प्रजा की सब कामनाएं जब तू पूरा करेगा तो इस सत्ता का अधिकारी बना रहेगा किन्तु प्रजा के रुष्ट होते ही तेरी यह सत्ता तेरे से छीन जावेगी ! प्रजा तुझे हटा देवेगी ! इसलिए तू सदा ऐसे कार्य करना कि यह सत्ता तेरे से कभी भी छीन न पावे ! इसका एक मात्र उपाय है कि तूं शासन को प्रजा की इच्छा के अनुरूप शासन चला !

इस से स्पष्ट होता है कि वेद शासन व्यवस्था भी प्रजा को ही सर्वोपरि मानता है तथा आदेश देता है कि देश के शासक का चुनाव भी प्रजा ही करे तथा यह शासक तब तक ही कार्य करेगा, जब तक प्रजा प्रसन्न है ! प्रजा के विरोध में आते ही शासक सत्ता के सूख को त्याग दे तथा नया शासक चुना जावे ! इस से यह भी स्पष्ट होता है कि हर काल में “राजा का शासन प्रजा की दया पर ही निर्भर है !” ज्यों ही राजा निरंकुश होता है और प्रजा के अनुरूप कार्य नहीं करता है तो यह प्रजा तत्काल उसे पदच्युत करने की शक्ति रखती है और नया शासक सत्ता में बैठा सकती है !

ऋग्वेद का यह मन्त्र स्पष्ट आदेश देता है कि “राजा तब तक ही सत्ता का अधिकारी है, जब तक वह प्रजा को प्रसन्न रख सकता है, अन्यथा नहीं!” जब देश के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग तरह के अत्याचार बढ़ रहे हों, राज्य केंद्र के निर्देश का पालन न करें, अनाचार का शासन हो जावे, महंगाई बढ़ने लगे किन्तु इसे रोकने की क्षमता सरकार के पास न हो या फिर जान बुझ कर इसे रोक न पा रही हो, भृष्टाचार बढ़ जावे, सरकार के सांसद या विधायक अथवा मंत्रिगण भ्रष्टाचार से अपना घर भर रहे हों, देश की सुरक्षा व्यवस्था गड़बड़ा रही हो, अन्याय का राज्य हो, जनता को अकारण ही परेशान किया जाने लगे, शिक्षा, भोजन, पानी आदि की ठीक से व्यवस्था न हो पा रही हो अथवा जनता की किसी मांग को सरकार स्वीकार करने को तैयार न हो, तो जनता तत्काल ऐसे शासक को हटा दे तथा अपनी व्यवस्था के लिए नये शासक को चुने ! ऐसा वेदों का आदेश है !

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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