जैविक हमले नये नहीं हैं : Yogesh Mishra

पुरातात्विक साक्ष्यों से संकेत मिलता है कि सदियों पहले प्राचीन फारस और रोमन सेनाओं के युद्ध में बिटुमिन और सल्फर जैसे घातक क्रिस्टलों का इस्तेमाल हुआ था !

कहा जाता है कि साल 1347 में मुगलों ने प्लेग से संक्रमित शरीरों का इस्तेमाल काले सागर के बंदरगाह पर किया था ! 1710 में रूसी सेना ने भी रवाल (मौजूदा टालिन, एस्टोनिया) में इसी तरह हमला किया था ! 1763 में ब्रिटेन की फौज ने चेचक से संक्रमित कंबल अमेरिकी इंडियन आबादी में बांट दिए थे, जिससे महामारी फैल गई थी !

1845 में फ्रांस ने अल्जीरिया के बेरबेर कबीले के खिलाफ धुएं वाले केमिकल हथियारों का इस्तेमाल किया था ! अमेरिकी गृह युद्ध में गुब्बारों के जरिये जहर के कनस्तर गिराए गए थे !

आधुनिक लड़ाइयों में क्लोरीन, फोसजीन और मस्टर्ड गैस का इस्तेमाल पहले विश्व युद्ध के दौरान किया गया है ! अमेरिका ने वियतनाम युद्ध में एजेंट ऑरेंज का इस्तेमाल किया था ! यह एक तरह का खरपतवार नाशक था ! इसमें ऐसे केमिकल थे कि लड़ाई के दशकों बाद तक वियतनाम के इस हिस्से में बच्चे अपंगता के साथ पैदा हुए और कई लोगों की मौत कैंसर से हुई !

साल 1675 में हुए स्ट्रासबुर्ग समझौते के बाद से केमिकल और बायोलॉजिकल हथियारों को सीमित करने और उत्पादन पर रोक लगाने की कोशिश की जा रही है ! इसके बावजूद यह हथियार आज भी दुनिया में हैं ! 2019 में जब चीन से कोविड-19 के मामले सामने आने शुरू हुए तो फिर से जैविक हथियारों के बारे में चर्चा होने लगी थी !

हालांकि कोविड-19 को चीन द्वारा बायोलॉजिकल हथियार बनाने का कोई भी सबूत आज तक सामने नहीं आया है ! यह विशुद्ध अमेरिका का प्रपोगंडा था ! यूक्रेन युद्ध में भी दोनों पक्षों की ओर से रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल की आशंका लगातार जताई जा रही है ! जो सम्पूर्ण मानवता के लिये घातक है !!

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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