सात्विक दुर्घटना भी हमें विद्वान बना सकती है : Yogesh Mishra

लोग व्यर्थ ही अपना संपूर्ण जीवन पढ़ने-लिखने में नष्ट कर देते हैं ! अब विज्ञान भी इस बात को मानने के लिए तैयार हो रहा है कि इस ब्रह्मांड में व्याप्त समस्त ज्ञान मानव मस्तिष्क के अंदर पहले से ही विद्यमान है !

अर्थात दूसरे शब्दों में कहा जाए तो इस ब्रह्मांड में व्याप्त ज्ञान रूपी ऊर्जा का स्रोत मानव मस्तिष्क से गर्भधारण के समय से ही जुड़ा होता है ! तभी तो गर्भ में भी शिशु स्वप्न देख कर सुख और दुख की अनुभूति करता है ! हम तो बस कुछ अभ्यास द्वारा उस ज्ञान को पुन: स्मरण कर सक्रिय कर लेते हैं !

यह एक ध्रुव सत्य है कि इस सृष्टि में मानव मस्तिष्क के अंदर अनुभूत होने वाला संपूर्ण ज्ञान श्रोत पहले से ही ऊर्जा के रूप में मौजूद है जो कि वास्तव में इस ब्रह्मांड में विद्यमान है ! बस आवश्यकता है साधना द्वारा अपने मस्तिष्क को इतना तैयार कर लेने की कि व्यक्ति उस ज्ञान रूपी ऊर्जा स्रोत से सफलतापूर्वक जुड़ सके !

हमारे अनादि सनातन धर्म ग्रंथ भी यही बतलाते हैं कि व्यक्ति को किसी भी बाह्य स्रोत से कोई भी नया ज्ञान प्राप्त नहीं होता है और न ही दिया जा सकता है बल्कि इस ब्रह्मांड में पर्याप्त ज्ञान पहले से ही मौजूद है ! जिसे गुरु अपने साधना बल से अपने शिष्य के अंदर शक्ति जागृत कर उसे प्रदान कर देता है ! जिसके द्वारा शिष्य उस ज्ञान श्रोत से जुड़ जाता है !

इसे दूसरे शब्दों में कहा जाये तो जिस तरह भौतिक विज्ञान में अब यह सिद्ध हो गया है कि सृष्टि में न तो किसी भी वस्तु उत्पत्ति होती है और न ही कोई भी वस्तु नष्ट होती है बल्कि वस्तुओं के स्वरूप में हुआ परिवर्तन ही हमें उस वस्तु के उत्पन्न या नष्ट होना का भ्रम भाषित करवाता है !
ठीक इसी तरह ज्ञान भी अनादि है, अनंत है, विस्तारित है और ब्रह्माण्ड में ज्ञान एक कम्पन ऊर्जा के रूप में विद्यमान है ! भगवान ने आपको जो मस्तिष्क दिया है, उस मस्तिष्क की क्षमता है कि वह ज्ञान के उस ऊर्जा स्रोत से आपका संबंध जोड़ सके और जैसे ही कोई मानव मस्तिष्क किसी भी ज्ञान के ऊर्जा स्रोत से संबंध जोड़ लेता है, वैसे ही उस ज्ञान में विद्यमान कंपन मानव मस्तिष्क के अंदर होने लगता है और मनुष्य वह सारे रहस्य समझने लगता है जो प्रकृति के ज्ञान रूपी गर्भ में छिपा हुआ होता है !

यह या तो गुरु की कृपा से संभव है या ईश्वर की कृपा से और या फिर प्रारब्ध और संयोग के द्वारा यह शक्ति व्यक्ति को प्राप्त हो सकती है ! जिसे कुंडलिनी जागरण या सात्विक दुर्घटना कहते हैं !

सनातन ग्रन्थ गवाह है बहुत से ऐसे विद्वान हुए जो कि सामान्यतः बौद्धिक रूप से विकसित नहीं थे ! लेकिन उनके साथ अचानक किसी घटना ने उन्हें घटी एक आदर्श विद्वान पुरुष के रूप में समाज में विख्यातिक कर दिया ! इसका मूल कारण यही था कि उस दुर्घटना के कारण उस वक्त का उसका मस्तिष्क ब्रह्मांड में व्याप्त ऊर्जा स्रोत से जुड़ गया ! जिसके जुड़ जाने के बाद उसको प्राप्त अनुभूतियों को उसने शब्दों में जब समाज के सामने व्यक्त किया तो समाज ने उसे अति विद्वान घोषित कर दिया !

यह स्थिति अप्रत्याशित सदमा, दुर्घटना, अपमान, प्राकृतिक आपदा आदि अचानक आई किसी भी परिस्थिति से पैदा हो सकती है !

इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि हम कोई भी ज्ञान पढ़कर या अभ्यास से प्राप्त नहीं कर सकते हैं ! बल्कि जब हम किसी भी विषय को पढ़ते हैं या अभ्यास करते हैं ! तो हमारे मस्तिष्क के अंदर न्यूरॉन्स में जो हलचल होती है ! वह जब एक सीमा से अधिक हो जाती है तो उसके बाद हमारा मस्तिष्क सक्रिय होकर ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जुड़ जाता है और हमें अद्भुत ज्ञान की अनुभूति होने लगती है !

जिसे मंत्र या तंत्र की शक्ति से भी प्राप्त किया जा सकता है ! गुरु इसके लिये शक्तिपात कर सकता है या व्यक्ति स्वयं भी व्यक्तिगत स्तर पर साधना या तप द्वारा इस अवस्था को प्राप्त कर सकता है !

लेकिन यह सभी कुछ ईश्वर की कृपा से ही संभव है ! इसलिए यदि ज्ञानी बनना चाहते हैं तो बिना किसी संशय की ईश्वर की शरण में जाईये ! वहीं से ही आपको योग्य गुरु और ज्ञान दोनों प्राप्त होंगे !!

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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