जानिये । आखिर मुसलमान ही सबसे अधिक भिखारी क्यों होते हैं ? क्या है वास्तविक कारण ? जरूर पढ़ें ।

2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार देश में भिखारियों की संख्या 3 लाख 70 हजार है। जबकि उसमें मुसलमान भिखारी 92,760 हैं। वैसे इस तरह के लोग सभी धर्मों और जातियों में पाए जाते हैं लेकिन भारत की कुल जनसंख्या में मुसलमान 15 प्रतिशत हैं अर्थात देश में मुस्लिमों की कुल जनसंख्या 18 करोड़ है लेकिन देश के भिखारियों की कुल आबादी में इनकी संख्या 25 प्रतिशत से अधिक है। यानि कि लगभग दुगुनी है। भारत का हर चौथा भिखारी मुसलमान है.

मुस्लिम भिखारियों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या ज्यादा है. जबकि मुसलमान दावा करते हैं कि इन्होने 800 साल भारत पर शासन किया फिर भी भिखारी के भिखारी रह गये | अब यहां प्रश्न यह है कि क्या ये लोग मुसलमान होने के कारण भिखारी हैं या इसका कोई और कारण है | मुझे यह समझ में आता है कि पांच-सात सौ साल पहले जब वे हिंदू थे, तब भी वे प्रायः गरीब थे, मजदूर थे, वे मुश्किल से गुजर-बसर करते थे । तत्कालीन मुगल शासकों के भय या प्रलोभन से इनके मुसलमान बनने पर भी उनकी हालत वही रही | शिक्षा का अभाव व अधिक सन्तान पैदा करने के चक्कर में इनके हालत और भी बदतर हो गये हैं ।

आज भी भारत में 42.72 प्रतिशत से अधिक मुसलमान अनपढ़ हैं और जो मुसलमान संपन्न हैं, सुशिक्षित हैं और शक्तिशाली हैं, उनका वर्ग अलग बन गया है। वे इन विपन्न, अशिक्षित और कमजोर मुसलमानों से रोटी-बेटी का रिश्ता नहीं रखना चाहते । यह वर्ग-भेद अब मुस्लिम देशों में भी फैलता जा रहा है और मुस्लिम नेता राजनीति में अपना करियर बना रहे हैं | आज हिन्दोस्तान के मुसलमान भिखारी हिंदुओं की दया, रहमो-करम पर जिंदा हैं। मुस्लिम समाज के ठेकेदार इनके लिये कुछ नहीं करते हैं |

बल्कि यह ठेकेदार कहते हैं कि भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं. ऐसे में सरकार पर मुस्लिम समाज को नजरंदाज करने के आरोप भी लगाए जाते हैं और उनकी बदहाली के लिए सरकार को जिम्मेदार भी ठहराते हैं. लेकिन मैं बताना चाहता हूँ कि मुस्लिम समाज के उत्थान के लिए 7,730 समाज सेवी संस्थायें कार्य कर रही हैं | जिनके द्वारा अगर सही दिशा में काम किया जाए तो मुस्लिम भिखारियों की संख्या कुछ अरसे में कम की जा सकती है. देश में 4 लाख भिखारी हैं, सरकार को इनके लिये एक अलग शहर ही बसा देना चाहिये |

भीख मांगने वाले इन लोगों में से बहुत से विकलांग होंगे तो बहुत से ऐसे भी जो हाथ-पैरों से ठीक होंगे. विकलांग लोगों को उनके हिसाब से वोकेशनल ट्रेनिंग दी जा सकती है. जो पढ़े लिखे नहीं हैं उन्हें कोई दूसरा व्यावसायिक काम सिखाया जा सकता है जिससे वो कमाकर खाने के लिए प्रेरित हों. जो पढ़े लिखे हैं उनको उनकी शिक्षा के मुताबिक काम मुहैया करवाया जाए, और जो कुछ नहीं कर सकते उनके लिए ऐसे संस्थाएं भी हैं जो आजीवन उनका ध्यान रख सकती हैं.

देखा जाए तो इस संख्या को इन्हीं वर्गों के आधार पर बांटा जाए और हर वर्ग पर पुनर्वास के लिए सकारात्मक काम किया जाए तो बिल्कुल मुमकिन है कि भारत का कोई भी मुसलमान भीख मांगता नजर नहीं आएगा.!

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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