नेहरू की तरह गांधी भी गौ हत्या के मुद्दे पर पलटी मार गये थे ,(एतिहासिक तथ्य ) जरूर देखें ।

अंग्रेजों द्वारा भारत को अस्थिर करने की योजना के एक भाग के रूप में गौ हत्या शुरू की गई। भारत में पहला क़साईख़ाना 1760 में शुरू किया गया था, एक क्षमता के साथ प्रति दिन 30,000 (हज़ार तीस केवल) और प्रतिवर्ष कम से कम एक करोड़ गायों को मारा गया ।

सन 1921 में गोपाष्टमी के अवसर पर पटौदी हाउस में एक सभा के अन्दर , जिसमें हकीम अजमल खान , डॉ. अन्सारी , लाला लाजपतराय , पं. मदन मोहन मालवीय आदि उपस्थित थे , तभी इन सभी लोगों के समक्ष एक प्रस्ताव पास कराया गया कि – ” गौहत्या को अंग्रेजी सरकार कानूनी दृष्टि से बन्द करे , नहीँ तो देशव्यापी असहयोग आन्दोलन आरम्भ किया जायेगा । ” इसके बाद कांग्रेस के कार्यक्रमों में ‘ गौरक्षा ‘ सम्मेलनों का आयोजन होने लगा ।

एक सवाल के जवाब में गाँधी ने कहा था कि जिस दिन भारत स्वतंत्रत हो जायेगा उसी दिन से भारत में सभी वधशालाओं को बंद किया जाएगा, 1929 में एक सार्वजनिक सभा में नेहरू ने कहा कि अगर वह भारत का प्रधानमंत्री बने तो वह पहला काम इन कसाईखानो को बंद करने का करेंगे, आज़ादी के बाद से अब तक 120 से करोड़ से अधिक गायों को मौत के घाट उतारा जा चुका है। 1947 के बाद वधशालाओं की संख्या 350 से 36,000 तक बढ़ गई है वर्तमान में सरकार की अनुमति से 36,000 कत्लखाने चल रहे हैं इसके अलावा जो अवैध रूप से चल रहे हैं वो अलग है उनकी संख्या की कोई पूरी जानकारी नहीं है।

15 अगस्त 1947 को भारत के आजाद होने की सूचना मिलने पर देश के कोने – कोने से लाखों पत्र और तार प्रायः सभी जागरूक व्यक्तियों तथा सार्वजनिक संस्थाओं द्वारा भारतीय संविधान परिषद के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के माध्यम से गाँधी को भेजे गये जिसमें उन्होंने मांग की थी कि अब देश स्वतन्त्र हो रहा है अतः गौहत्या को बन्द करा दें ।

(लेकिन बेचारे भोले-भाले लोग ये नहीं जानते थे कि गांधी के गौरक्षा के सभी ब्यान मात्र आजादी से पूर्व हिन्दुओं को अपना अनुयायी बनाने के लिए थे)

खैर तब गांधी जी ने कहा कि –

” राजेन्द्र बाबू ने मुझको बताया कि उनके यहाँ करीब 50 हजार पोस्ट कार्ड , 25-30 हजार पत्र और कई हजार तार आ गये हैं । हिन्दुस्तान में गौ – हत्या रोकने का कोई कानून बन ही नहीं सकता । इसका मतलब तो जो हिन्दू नहीं हैं(मुसलमान ईसाई) , उनके साथ जबरदस्ती करना होगा . . . . . जो आदमी अपने आप गौकशी नहीं रोकना चाहते, उनके साथ मैं कैसे जबरदस्ती करूँ कि वह ऐसा न करें । इसलिए मैं तो यह कहूँगा कि तार और पत्र भेजने का सिलसिला बन्द होना चाहिये इतना पैसा इन पर फैंक देना मुनासिब नहीं है । मैं तो अपनी मार्फत सारे हिन्दुस्तान को यह सुनाना चाहता हूँ कि वे सब तार और पत्र भेजना बन्द कर दें । भारतीय यूनियन कांग्रेस में मुसलमान , ईसाई आदि सभी लोग रहते हैं । अतः मैं तो यही सलाह दूँगा कि विधान – परिषद् पर इसके लिये जोर न डाला जाये ।”
( पुस्तक- ‘धर्मपालन’ भाग – दो , प्रकाशक – सस्ता साहित्य मंडल , नई दिल्ली , पृष्ठ – 135 )

गौहत्या पर कानूनी प्रतिबन्ध को अनुचित बताते हुए इसी आशय के विचार गांधी ने प्रार्थना सभा में 25 जुलाई 1947 को दिये –

उन्होने कहा था कि ” हिन्दुस्तान में गौ-हत्या रोकने का कोई कानून बन ही नहीं सकता है । गौहत्या को बन्द कराने का मतलब तो जो हिन्दू नहीं हैं उनके साथ जबरदस्ती करना होगा । ” संदर्भ के लिये देखिये समाचार पत्र हिन्दुस्तान ( 26 जुलाई 1947 ) , हरिजन एवं हरिजन सेवक पत्रिका ( 26 जुलाई 1947 )

अपनी 4 नवम्बर 1947 की प्रार्थना सभा में गांधी जी ने फिर कहा कि –
” भारत कोई हिन्दू धार्मिक राज्य नहीं हैं , इसलिए हिन्दुओं के धर्म को दूसरों पर जबरदस्ती नहीं थोपा जा सकता । मैं गौ सेवा में पूरा विश्वास रखता हूँ , परन्तु उसे कानून द्वारा बन्द नहीं किया जा सकता । ” ( दिल्ली डायरी , पृष्ठ 134 से 140 तक )

इससे स्पष्ट हैं कि गांधी की गौरक्षा के प्रति कोई आस्था नहीं थी । वह केवल हिन्दुओं की भावनाओं का शौषण करने के लिए बनावटी तौर पर ही गौ रक्षा की बात आजादी से पूर्व किया करते थे , इसलिए उपयुक्त समय आने पर उन्होने देश की सनातन आस्थाओं के साथ विश्वासघात किया ।

योगेश मिश्र
ज्योतिषाचार्य,संवैधानिक शोधकर्ता एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)
संपर्क – 9044414408

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