शैव और वैष्णव संस्कृति के झगड़ो के कारण शुरू हुई सती प्रथा | Yogesh

स्कंद पुराण के अनुसार एक बार लोमस ऋषि ने ऋषियों को बतलाया कि राजा दक्ष प्रजापति की बेटी “सती” ने पिता की इच्छा के विरुद्ध भगवान शिव से विवाह कर लिया ! विवाह उपरांत जब राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया तो उसमें अपनी बेटी सती को नहीं बुलाया ! सती को जब इस यज्ञ के आयोजन की सूचना मिली तो बिना बुलाए ही वह अपने पिता के द्वारा आयोजित यज्ञ स्थल पर पहुंच गई !

वहां पर उसने देखा कि उसके पिता राजा दक्ष ने सती के पति भगवान शिव अर्थात अपने दमाद के सम्मान के लिए कोई व्यवस्था नहीं की है और न ही उनका कोई अंश निर्धारित किया है ! जिससे सती क्रोधित हो गई और राजा दक्ष से उसका विवाद हो गया ! परिणामत: सती ने यज्ञ स्थल पर प्रज्ज्वलित यज्ञ कुंड में कूद कर अग्नि समाधि ले ली !

जब इसकी सूचना भगवान शिव को हुई तो वे तत्काल यज्ञ स्थल पर पहुंचे और अग्नि में आंशिक जल चुकी अपनी पत्नी पति को अग्नि से बाहर निकाला, किंतु तब तक उसका शरीर लगभग पूरी तरह से जल चुका था ! जिसे देख कर भगवान शिव को क्रोध आ गया और उन्होंने पूरे के पूरे यज्ञ स्थल को तहस-नहस कर दिया ! अपने ससुर राजा दक्ष से भयंकर युद्ध किया और उनके सर को काट लिया !

यह कथा यह बताती है कि भगवान शिव जो की शैव संस्कृति के संस्थापक तथा पोषक थे ! उनका विवाह वैष्णव संस्कृति के राजा दक्ष की कन्या “सती” से हो गया ! वैष्णव संस्कृति क्योंकि नगरीय कृतिम संस्कृति है जो कि शैव संस्कृति अर्थात प्राकृतिक संस्कृति के बिल्कुल विपरीत है ! इसलिए वैष्णव संस्कृति वाले शैव संस्कृति वालों को पिछड़ा और अविकसित मानते हुये उनसे नफ़रत करते थे !

ऐसी स्थिती में बेटी की जिद में मजबूर होकर वैष्णव संस्कृति के पालनहार राजा दक्ष ने अपनी बेटी का विवाह शैव संस्कृत के पोषक भगवान शिव से कर तो दिया किन्तु वैष्णव संस्कृति के पालनहार राजा दक्ष इस विपरीत संस्कृति के विवाह से खुश नहीं थे ! अतः दक्ष ह्रदय से भगवान शिव का कोई सम्मान नहीं करते थे ! इसीलिए उन्होंने यज्ञ स्थल पर भगवान शिव के सम्मान की न तो कोई भी व्यवस्था की थी और न ही उनका इस यज्ञ में कोई अंश निर्धारित किया था !

जिस से क्रोधित होकर राजा दक्ष की बेटी “सती” ने अग्नि समाधि ले ली और अपनी पत्नी को यज्ञ कुंड में जलता देख कर भगवान शिव को क्रोध आया और उन्होंने यज्ञ स्थल को तहस-नहस कर राजा दक्ष की का सर काट लिया यह पूरा का पूरा वाक्य स्पष्ट रूप से वैष्णव संस्कृति और शैव संस्कृत के मध्य सदैव से संघर्ष रहा है ! इसको विभिन्न लोगों ने भिन्न-भिन्न तरीके से व्याख्यापित किया है !

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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