वैष्णव ने बद्रीनाथ शैव तीर्थ को कैसे हड़पा : Yogesh Mishra

स्कन्द पुराण के अनुसार सतयुग में बद्रीनाथ क्षेत्र को “मुक्तिप्रदा” के नाम से जाना जाता था ! तब यह भगवान शिव की एक सैन्य प्रशिक्षण छावनी हुआ करती थी ! यह अलकनंदा नदी के निकट थी ! यहाँ ठण्ड बहुत पड़ती थी ! क्योंकि इस स्थान पर एक गर्म और एक ठंडा पीने योग्य पानी का श्रोता था ! इसलिये इसे भगवान शिव के निर्देश पर हिमालय पर्वतीय निवासियों के सैन्य प्रशिक्षण के लिये दुर्गम कैलाश पर्वत से 800 किलोमीटर नीचे एक सैन्य प्रशिक्षण अड्डे के रूप में सतयुग में विकसित किया गया था !

क्योंकि उस समय पूरी दुनिया में वैष्णव सैनिकों का आतंक था ! विष्णु के निर्देश पर वैष्णव साम्राज्य विस्तार के लिये वैष्णव सैनिक पूरी दुनिया में गैर वैष्णव लोगों की खुले आम हत्या कर रहे थे ! दैत्य, दानव, असुर, यक्ष, किन्नर आदि संस्कृति के सभी प्रजाति के लोग इन वैष्णव सैनिकों के आतंक से भयभीत थे !

ऐसी स्थिति में इन वैष्णव आक्रान्ताओं से शैव संस्कृत को बचाया जाना एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया था ! क्योंकि वैष्णव सैनिक क्रूर और अत्याचारी थे ! इसलिये शैव जीवन शैली जीने वालों के लिये यह आवश्यक हो गया था कि वह वैष्णव सैनिकों से अपनी आत्मरक्षा के लिये सैन्य प्रशिक्षण लें !

क्योंकि यह वैष्णव सैनिक जहां भी जाते थे ! वहां पर क्रूरता से कत्लेआम किया करते थे ! घरों को लूट कर जला दिया करते थे ! बहू बेटियों का अपहरण कर उनके साथ बलात्कार कर उनकी हत्या कर दिया करते थे ! विशेष रुप से ज्ञानी और विद्वान जनों से इन्हें विशेष नफरत थी !

यह नगरीय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिये छोटे-छोटे कबीलों में रहने वाले शैव संस्कृत के अनुयायियों के परम दुश्मन थे ! इसी वजह से शैव संस्कृति का अनुपालन करने वाले शिव भक्तों के लिये यह आवश्यक हो गया था कि वह आत्मरक्षा के लिये सैन्य प्रशिक्षण लें और अपने परिवार व गांव की रक्षा करें !

जिसकी जानकारी वैष्णव विश्व जासूस नारद मुनि को हुई ! वह व्यक्तिगत रूप से यहां पर आये और उन्होंने यहां की समस्त गतिविधियों को देखा ! जो अति आधुनिक दिव्य अस्त्र-शास्त्रों से प्रशिक्षण ले रहे थे उन शैव सैनिकों को देखकर नारद आश्चर्यचकित हो गये !

नारद यह समझ गये कि यदि इस प्रशिक्षण स्थल को शीघ्र अति शीघ्र नहीं नष्ट नहीं किया गया तो यहां पर प्रशिक्षण ले रहे पर्वतीय क्षेत्रों के शैव सैनिकों को भविष्य में युद्ध में हराया जाना असंभव हो जायेगा ! अतः उन्होंने तत्काल यूरोप जाकर इसकी सूचना भारत पर आक्रमण करने की तैयारी कर रहे अपने वैष्णव शासक विष्णु को दी !

नारद से मिली सूचना के आधार पर विष्णु स्वयं बालक रूप रखकर यहां आये और सारी गतिविधियों का अवलोकन किया और उन्होंने यह समझ लिया कि यहां पर बड़े सैनिकों को भेजा जाना उचित नहीं रहेगा ! क्योंकि यहाँ अति आधुनिक दिव्य अस्त्र शास्त्रों के साथ प्रशिक्षित शैव सैनिक भी हैं ! जिन्हें युद्ध में हराया जाना असंभव है !

अतः विष्णु ने सदैव की तरह छल से काम लिया ! उन्होंने वहीं के क्षेत्रीय छोटे-छोटे बालकों को इकट्ठा किया और उन्हें तरह-तरह के उपहार देकर अपनी और आकर्षित किया और नीलकंठ पर्वत पर बच्चों की एक बड़ी सेना तैयार की ! साथ ही अपने यहां के महान योद्धाओं को भी सैनिकों सहित बुलवा लिया ! जिन्हें नीलकंठ पर्वत पर छुपा दिया गया !

कुछ समय बाद मौका देख कर भगवान शिव की मैरेज एन्वार्सरी के मौके पर “शिवरात्रि” के उत्सव पर विष्णु ने जो छोटे छोटे बालकों की सेना तैयार की थी ! उनको नीचे बद्री सैन्य स्थल पर भेजा ! वहां पर जाकर उन्होंने अति आधुनिक संयंत्रों को एक निश्चित समय पर एक साथ नष्ट कर दिया और उसी समय वैष्णव सेना के महान योद्धाओं ने सेना सहित इस शैव सैन्य प्रशिक्षण छावनी पर हमला कर दिया और वहां के शैव भक्तों की समूल हत्या कर बद्रीनाथ को अपने कब्जे में ले लिया !

कालांतर में धीरे-धीरे यहां पर बड़ा वैष्णव सैन्य केंद्र की स्थापित की गयी और आसपास के क्षेत्रों को जीतकर वहां पर छोटे-छोटे सैनिक केंद्र को स्थापित किया गया ! जिनको आज हम पंच बद्री के नाम से जानते हैं !

शैवों ने विवाद को बढ़ाने के स्थान पर अपने सैन्य केंद्र को अति दुर्गम स्थल जिसे अब हम “केदारनाथ” के नाम से जानते हैं ! वहां ले जाकर स्थापित कर लिया !

इसी को इतिहास में कहा जाता है कि विष्णु का नीलकंठ पर्वत पर बाल रूप में अवतरण हुआ था और वहां वह रोने लगे ! उनके रोने की आवाज सुनकर माता पार्वती द्रवित हो गई और उन्हें अपने यहां ले आयी ! जिन्होंने बाद में माता पर्वती से बद्रीनाथ क्षेत्र को मांग लिया था और मांगने पर माता पार्वती ने वात्सल्य प्रेम में बद्रीनाथ क्षेत्र विष्णु को निवास करने के लिये दे दिया !
विष्णु के इसी छलिया कृत्य से क्रोधित होकर परम शैव साधक महर्षि भृगु ने विष्णु के सीने पर लात मारी थी !

इस बद्रीनाथ को त्रेता युग में भगवान नारायण के “योग सिद्ध” क्षेत्र के नाम से जाना जाता था और फिर द्वापर युग में इसे “मणिभद्र आश्रम” या “विशाला तीर्थ” के रूप में जाना गया ! जिसकी कृष्ण ने यात्रा की थी और अब कलियुग में इस धाम को “बद्रिकाश्रम” अथवा “बद्रीनाथ” के नाम से जाना जाता है ! क्योंकि यहाँ पर बहुतायत मात्र में बद्री (बेर) के वृक्ष पाये जाते थे ! हालाँकि अब जलवायु परिवर्तन के कारण उनका कोई निशान नहीं बचा है !!

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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