भारत में सांसद और विधायक अपने वेतन, भत्ते तथा पेंशन में बढ़ोत्तरी स्वयं करते हैं !! Yogesh Mishra

विश्व में भारत ऐसा लोकतांत्रिक देश है जहां जनप्रतिनिधि अपना कम करें या न करें, अपने फायदे के लिए वेतन भत्ते तथा पेंशन में बढ़ोत्तरी के लिए कानून बनाते हैं। हैरानी की बात यह है कि सांसद को जहां प्रतिमाह 1.45 लाख रुपये वेतन और भत्ते के रूप में मिलते हैं वहीं उत्तर प्रदेश में विधायक को 1.95 लाख रुपये वेतन और भत्ते के रूप में मिलते हैं। वहीं सांसद को जहां 20 हजार रुपये प्रतिमाह पेंशन मिलती है वहीं विधायक को 33 हजार रुपये पेंशन मिलती है जबकि एक संसदीय क्षेत्र में चार से पांच विधायक होते हैं।

इसी विषय को लेकर सांसदों के लिए वेतन और भत्तों का निर्धारण करने के लिए स्थायी आयोग के गठन पर केंद्र सरकार की विफलता पर नाराजगी जाहिर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा है कि वो पांच मार्च तक कोर्ट को इस संबंध में अपना रुख स्पष्ट करे। न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर और न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की पीठ ने पिछले साल सितंबर में सरकार द्वारा दायर किए गए हलफनामे का हवाला देते हुए कहा, “आपका हलफनामा स्पष्ट नहीं है कि आप सांसदों के वेतन और भत्ते के लिए स्थायी आयोग चाहते हैं या नहीं।”

केन्द्र के लिए पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अजित सिन्हा ने पीठ को बताया कि सरकार मौजूदा विधायकों और सांसदों के लिए वेतन और भत्ते तय करने के लिए एक स्वतंत्र आयोग की स्थापना करने पर विचार कर रही है। हालांकि, न्यायालय को तस्वीर स्पष्ट करने के लिए कम से कम एक हफ्ते का समय लगेगा। “केंद्र हमेशा इस बात की दलील क्यों देता है कि नीतिगत मामलों को संसद के लिए छोड़ा जाना चाहिए और अदालत को फैसला नहीं करना चाहिए ?” सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा। बेंच ने कहा कि राजनीतिज्ञों द्वारा संपत्ति के स्रोत के अनिवार्य बनाने का आदेश का केंद्र की आपत्ति के बावजूद सभी राजनीतिक दलों द्वारा स्वागत किया गया था। बेंच ने 6 मार्च को मामले की सुनवाई तय करते समय इस मुद्दे पर विशिष्ट रुख की मांग की।

दरअसल इलाहाबाद हाईकोर्ट के अप्रैल, 2016 के आदेश के खिलाफ एनजीओ लोकप्रहरी ने अपील दाखिल की है। हाईकोर्ट ने रिट याचिका को खारिज किया था जिसमें संसद द्वारा किए गए सांसद भत्ता और पेंशन अधिनियम, 1954 संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी।इसमें संसद ने संसद के पूर्व सदस्यों को पेंशन और सुविधाएं प्रदान करने के लिए नियम बनाए हैं। याचिका को खारिज करते हुए उच्च न्यायालय ने इस दलील कि अनुच्छेद 106, जो अपने सदस्यों के वेतन और भत्ते पर संसद को कानून बनाने का अधिकार देता है,

केवल वेतन और भत्ते को सीमित करता है और यह पेंशन के बारे में नहीं कहता, को अस्वीकर कर दिया। उसमें कहा गया है कि ये मामला विधायिका के अधिकार में है और इसके पूर्व सदस्यों के लिए सामाजिक सुरक्षा के इस तरह के एक उपाय को अपनाने के लिए संसद पर कोई संवैधानिक निषेध नहीं है। इसमें उन लोगों के लिए सुविधाओं और लाभों के अनुदान के खिलाफ चुनौती को भी खारिज कर दिया जो संसद के सदस्य रहे हैं।

पीठ ने कहा कि संसद के सदस्य लोगों के निर्वाचित प्रतिनिधि हैं जो उनकी ओर से बहस करते हैं और भारतीय लोकतंत्र के सार का प्रतिनिधित्व करने के लिए उनके निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुने गए हैं। संसद सदस्यों को लोगों द्वारा प्रतिनिधियों के रूप में चुना जाता है: ऐसे व्यक्ति, जिनके प्रतिनिधित्व और व्यक्तियों का वे प्रतिनिधित्व करते हैं।

किसी सदस्य को पेंशन भुगतान का अनुदान एक संसद सदस्य के रूप में पद समाप्त होने के बाद जीवन की एक प्रतिष्ठित स्थिति की रक्षा करने की आवश्यकता को पूरा करने के लिए है। एक पूर्व सांसद को भी गरिमा के जीवन जीने की जरूरत होती है। ये केवल संसद सदस्यों के लिए ही चिंता का मामला नहीं है, बल्कि एक ऐसा मुद्दा है जो लोकतंत्र के कामकाज के लिए महत्वपूर्ण है।

यह सुनिश्चित करने में एक महत्वपूर्ण सामाजिक हित है कि जिन लोगों ने संसद में निर्वाचित प्रतिनिधियों के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, पेंशन भुगतान के प्रावधान द्वारा सम्मान के साथ जीने में सक्षम होना चाहिए। जिन स्थितियों के अधीन पेंशन की अनुज्ञा की परिकल्पना की जानी चाहिए, यह एक ऐसा मामला है जो हमारे विचार में, उस निकाय के विवेक में है जो कानून बनाता है। संसद पर ऐसा कोई भी संवैधानिक निषेध नहीं है, जिसके तहत वो इसके पूर्व सदस्यों के लिए सामाजिक सुरक्षा के इस तरह के उपाय ना कर सके।

पूर्व सांसदों को क्या क्या सुविधाएं मिलती हैं.

संसद सदस्य वेतन, भत्ता और पेंशन अधिनियम 1954 के तहत सांसदों को पेंशन मिलती है. एक पूर्व सांसद को हर महीने 20 हजार रुपये पेंशन मिलती है.

5 साल से अधिक होने पर हर साल के लिए 1500 रुपये अलग से दिए जाते हैं. बता दें कि योगी आदित्यनाथ कमेटी ने सांसदों की पेंशन राशि बढ़ाकर 35 हजार रुपये करने की सिफारिश की है.

आज की तारीख में पेंशन के लिए कोई न्यूनतम समय सीमा तय नहीं है. यानी कितने भी समय के लिए सांसद रहा व्यक्ति पेंशन का हकदार होगा.
एक अजीब विरोधाभासी नियम है. सांसदों और विधायकों को डबल पेंशन लेने का भी हक है. कोई व्यक्ति पहले विधायक रहा हो और बाद में सांसद भी बना हो तो उसे दोनों की पेंशन मिलती है.

पति, पत्नी या आश्रित को फेमिली पेंशन की सुविधा भी है. सांसद या पूर्व सांसद की मृत्यु पर उनके पति, पत्नी या आश्रित को आजीवन आधी पेंशन दी जाती है.

मुफ्त रेल यात्रा की सुविधा दी जाती है. पूर्व सांसदों को किसी एक सहयोगी के साथ ट्रेन में सेकेंड एसी में मुफ्त यात्रा की सुविधा है. अकेले यात्रा पर प्रथम श्रेणी एसी की सुविधा है.

संसद सदस्य वेतन, भत्ता और पेंशन अधिनियम, 1954 तथा उसके अन्तर्गत बनाये गये नियम, वेतन और भत्ता:

(i) संसद अधिकारी वेतन और भत्ता अधिनियम, 1953 तथा उसके अन्तर्गत बनाए गए नियम

(ii) संसद में विपक्षी नेता वेतन और भत्ता अधिनियम, 1977और उसके अन्तर्गत बनाए गए नियम

(iii) संसद में मान्यताप्राप्त दलों तथा समूहों के नेता और मुख्य सचेतक (प्रसुविधाएं) अधिनियम, 1998 उसके अंतर्गत बनाए गए नियम

(iv)उपराष्ट्रपति पेंशन अधिनियम ,1997

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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