हिंदुत्व की नई परिभाषा ने देश बेच दिया : Yogesh Mishra

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुखिया सर संघचालक मोहन भागवत ने मध्यप्रदेश-यात्रा के दौरान एक बयान द्वारा हिंदुत्व शब्द की परिभाषा को ही बदल दिया है ! वैसे यह वही हैं जो गौ रक्षा और हिन्दू राष्ट्र निर्माण की बात तो करते हैं, पर पीठासीन शंकराचार्य को हिन्दुओं का धर्म गुरु नहीं मानते हैं तथा हिंदुत्व के लिये काम करने का सही मौके आने पर हिंदुत्व की परिभाषा ही बदल देते हैं !

इनके राजनैतिक लाभ के लिये कभी गाय माता हो जाती है, तो कभी इन्हीं के राजनैतिक दल के मुखिया गौरक्षक को गुंडा बतलाने लगते हैं और इन्हीं के राजनैतिक दल के मुख्यमंत्री खुले आम बयान देते हैं कि गौ मांस के आपूर्ति को कभी कम नहीं होने देंगे, तो कभी वास्तव में इन्हीं के राजनैतिक दल के शासन काल में विश्व में भारतीय गौमांस की आपूर्ति तीन गुना हो जाती है !

यह बात तो वीर सावरकर की करते हैं पर यदि इन्हीं को आधार मान कर विनायक दामोदर सावरकर के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘हिंदुत्व’ पर विचार किया जाये तो उसमें लिखा था की ‘हिंदुत्व’ की विचारधारा ने ही हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को जन्म दिया था ! लेकिन तब का हिंदुत्व अलग था और अब का अलग है !

सावरकरजी की मान्यता थी कि जिस व्यक्ति का ‘पुण्यभू’ और ‘पितृभू’ भारत में हो, वही हिंदू है ! यानी जिसका पूजा-स्थल, तीर्थ, देवी-देवता, पैगंबर, मसीहा, पवित्र ग्रंथ आदि भारत के बाहर के हों, उसका पुण्यभू भी बाहर ही होगा !

उसे आप हिंदू नहीं कह सकते चाहे भारत उसकी पितृभूमि हो यानी उसके पुरखों का जन्म स्थान हो ! कोई भारत में पैदा हुआ है लेकिन, उसकी पुण्यभूमि मक्का-मदीना, यरुशलम, रोम या मशद है तो वह खुद को हिंदू कैसे कह सकता है?

सावरकरजी की हिंदू की यह परिभाषा उस समय काफी लोकप्रिय हुई, क्योंकि उस समय मुस्लिम लीग का जन्म हो चुका था और इस्लाम के नाम पर अलग राष्ट्र की मांग जोर पकड़ने लगी थी ! सावरकर का हिंदुत्व उस समय राष्ट्रवाद का पर्याय-सा बन गया था और लोग समझ रहे थे कि लीगी सांप्रदायिकता का यही करारा जवाब है ! स्वयं सावकर ने भारत के आज़ाद होने के 15-20 साल बाद अपने अभिमत पर पुनर्विचार किया था !
जो धर्म भारत के बाहर पैदा हुए, वह अहिंदू यानी ईसाई, इस्लाम, पारसी, यहूदी आदि ही हैं और जो धर्म भारत में पैदा हुए, वह हिंदू यानी वैदिक, पौराणिक, वैष्णव, शैव, शाक्त, जैन, बौद्ध, सिख, आर्यसमाजी, ब्रह्म समाजी आदि है !

इन तथाकथित हिंदू धर्म की शाखाओं में चाहे जितना भी परस्पर सैद्धांतिक विरोध हो, उन सब को एक ही छत्र के नीचे स्वीकार किया जाता है ! हिंदू-अहिंदू तय करने के लिए किसी सिद्धांत की जरूरत नहीं है ! इस निर्णय का आधार सैद्धांतिक नहीं बल्कि भौगोलिक है ! क्योंकि इसमें राष्ट्रीयता का भाव निहित है !

लेकिन संघ-प्रमुख मोहन भागवत ने ‘पुण्यभू’ की छूट देकर ‘हिंदू’ शब्द की परिभाषा को अधिक उदार बना दिया है ! उन्होंने बैतूल के भाषण में कहा कि हिंदुस्तान में रहने वाला हर नागरिक उसी तरह हिंदू कहलाएगा, जैसे अमेरिका में रहने वाला हर नागरिक अमेरिकी कहलाता है, उसका धर्म चाहे जो हो !

उनके इस तर्क को थोड़ा आगे बढ़ाएं तो यहां तक जा सकता है कि किसी नागरिक के पुरखे या वह स्वयं भी चाहे किसी अन्य देश में पैदा हुआ हो, यदि उसे भारत की नागरिकता मिल जाए तो वह खुद को हिन्दू घोषित कर सकता है ! तो फिर संघ के चमचों द्वारा सोनिया गाँधी का विरोध क्यों ?

इस तरह संघ के मुखिया के अनुसार यदि किसी के हिंदू होने में धर्म आड़े आएगा या उसके पुरखों का जन्म-स्थल यानी ‘पुण्यभू’ के साथ ‘पितृभू’ की शर्त आड़े आयेगी तो संघ के मुखिया के अनुसार सैद्धांतिक और भौगोलिक दोनों ही आधार इस नई परिभाषा के तहत वह हिन्दू है ! भले ही उसमें राष्ट्र निष्ठा हो या न हो !

मुझे तो यह वैश्विक गुलामी की नई शुरुआत दिखलाई देती है ! जबकि दूसरी तरफ इन्हीं के राजनैतिक दल का मुखिया पूरी दुनियां में घूम घूम कर विदेशियों को भारत में धंधा करने के लिये आमंत्रित कर रहा है और भारत के प्राकृतिक संसाधन विदेशियों को निजीकरण के नाम पर अप्रत्याक्ष्य रूप से खुले आम बाँट रहा है ! जो प्राकृतिक संसाधन राष्ट्र का सम्मान, धरोहर और पैत्रिक पूंजी है !!

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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