ज्योतिष में हमारे पूर्वज हमसे ज्यादा श्रेष्ठ थे : Yogesh Mishra

ज्योतिष या ज्योतिषी शब्द सुनते ही मन में भविष्य, भविष्यकथन या ग्रह चालन की फलश्रुति का विचार आता है ! परन्तु क्योंकि संस्कृत शब्द उस शब्द के अर्थ को स्वयं प्रकट कर देने वाले होते हैं ‘ज्योतिष’ शब्द में भविष्य या फल कहीं नहीं है ! इसका वास्तविक अर्थ तो ‘ज्योतिष्मतांग्रह-नक्षत्रादीनांगतिंस्तिथिञ्चाधिकृत्यकृतंशास्त्रम्’ है अर्थात् वह शास्त्र जिससे प्रकाशमान ग्रह-नक्षत्रों इत्यादि की गति और स्थिति का कलन या ज्ञान किया जाता है ! क्या आपको यह परिभाषा आज के एस्ट्रोनोमी शब्द के समीप नहीं लगती? कैम्ब्रिज शब्दकोष कहता है कि ब्रह्मांड और सूर्य, चंद्र, तारे आदि अंतरिक्ष में स्वाभाविक रूप से उपस्थित पदार्थों का वैज्ञानिक अध्ययन ही एस्ट्रोनोमी है ! ज्योतिष भी तो यही है !

इससे पता चलता है कि ज्योतिष शास्त्र वास्तव में आकाश में ज्योतिष्मान पिण्डों की गति और स्थिति के कलन और ज्ञान का ही विज्ञान है ! चूंकि कलन बिना गणित के संभव नहीं है, अत: गणना और गणित के बिना ज्योतिष का ज्ञान असंभव ही है ! अब प्रश्न आता है कलन या गणना किसकी? आपके पास आकाश में ज्योतिष्मान पिण्ड हैं, आप हैं और आपका आकाशीय प्रेक्षण के लिए समय है ! किस प्रकार की गणना और कलन संभव है यहाँ ?

यह है समय का प्रेक्षण, पिण्डों की गति एवं स्थिति (किसी भी दिशा और दशा) का प्रेक्षण और इनका यथासंभव अभिलेख कार्य ! अभिलेखों के एकत्र होते जाने के साथ ही साथ उनकी गतियों तथा स्थितियों के एक निश्चित प्रारूप का यथासंभव आकलन और उनसे उनके भविष्य या पूर्व गति-स्थिति का अंतर्गणन या बाह्यगणन ! ये नए सिरे ज्योतिष के ज्ञान के लिए बन गये ! इनके साथ ही साथ और इसके बाद का अगला चरण है ! विभिन्न ग्रह-नक्षत्रों और अन्य ज्योतिष्पिण्डों की गति और स्थिति के सिद्धांत बनाना !

यहाँ तक समझ में आ गया कि भविष्यफलकथन और ज्योतिष में अंतर है, यह हमें समझ लेना चाहिये ! इसलिए ज्योतिष का अर्थ जितना सामान्य लोग सोचते हैं या अक्सर समाचार-पत्रों में स्तंभलेखक लिखते हैं, उससे कहीं बहुत अधिक जटिल, दुरूह और धैर्य एवं कठोर परिश्रम का कार्य है ! इसके बारे में हमारे प्राचीन लोगों ने सोचा-विचारा और परिश्रम किया इसके लिए हम उनके ऋणी हैं !

गणना सिद्धांत ज्योतिष का अनन्य और मूलभूत भाग है, और इसे ही बहुधा गणित नाम से संबोधित किया गया है, इसके बिना ज्योतिष की कल्पना ही नहीं हो सकती ! पारिभाषिक रूप से ‘सिद्ध:अन्त:यस्य स:सिद्धान्त:’ अर्थात जिसका निगमन किया जा सके और प्रयोगात्मक रूप से सही सिद्ध हो वह सिद्धांत है ! इसके अतिरिक्त ज्योतिष के अन्य दो स्कन्ध (भाग) बन गये !

पहला सिद्धान्त-संहिता-होरा रूपं स्कन्धत्रयात्मकम् और दूसरा वेदस्य निर्मलं चक्षु: ज्योति:शास्त्रमकल्मषम् ! इसके बाद इसका पाँच स्कंधों में विकास हुआ जिसमें केरली (प्रश्न) और शकुन शास्त्र और जुड़ गया ! आजकल अनावश्यक रूप से नए-नए आयाम इसमें सायास जोड़े जा रहे हैं, जैसे फेंगशुई, टैरो इत्यादि ! इनका सम्बन्ध भविष्य फलकथन से तो है परन्तु ‘ज्योतिष’ से नहीं ! अंततोगत्वायदि सिद्धांत की शक्ति ज्योतिष में न हो तो ज्योतिष के अन्य स्तम्भ वैसे ही हैं जैसे बिना नींव के ताश का महल !

अभी ज्योतिष की परिभाषा का संक्षिप्त उल्लेख किया कि समय और ज्योतिष्पिण्डों की गति का मापन, गणना, कलन और इनके सिद्धांत बनाना ज्योतिष सिद्धांत है, इसे अब विस्तार से समझते हैं ! सृष्टि के बारे में सनातन वैदिक मत की आधारभूत संकल्पना चक्रीय है न कि रैखिक जोकि समय को मापने में बहुत सही सिद्ध होती है !

इसके आधार पर ज्योतिष में युगादि व्यवस्था, समय मापने के लिए पञ्चाङ्ग, सूर्य-चन्द्र ग्रहण, सूर्य और चन्द्रमा के समान अन्य ग्रहों, नक्षत्रों का उदय और अस्त, ग्रहों की परिधि और उनकी मंद-तीव्र गति इत्यादि अनेक जटिल उपविषय बने ! इनके विकास का कालखंड भी एक-दो शताब्दी नहीं, बल्कि सहस्राब्दियों में है ! इन एक-एक उपविषयों में भी अनेक छोटे विषय बने जैसे समयमापन के लिए ही नौ प्रकार के कालमान हैं – ब्राह्मंदिव्यंतथापैत्र्यं प्राजापत्यं च गौरवम् ! सौरं च सावनं चान्द्रमाक्र्षं मानानि तैर्नव !!

प्राचीन उपलब्ध गणित की पुस्तकों में समीकरणों और सूत्रों को बताने की व्यवस्था भी आज जैसी नहीं रही, लिखित में शब्द और जगह बचाने की परम्परा रही है ! तो यदि किसी पुरानी पुस्तक को देखें तो ऊपर से देखने में नहीं लगता कि 2 पंक्ति के किसी श्लोक में गणित करने के लिए कोई सूत्र या कोई गणनीय संख्या लिखी होगी ! आज के जन-सामान्य के लिए तो ये संस्कृत में भगवान की पूजा-अर्चना के श्लोक ही होते हैं ! संस्कृत ग्रंथों में ‘कटपयादि और ‘भूतसंख्या विधियों से अंकों और संख्याओं को सामान्य संस्कृत छंदों में पिरोकर संस्कृत के तथ्य और सूत्र लिखे गये हैं !

कटपयादि विधि – इस संस्कृत छंद में वृत्त की त्रिज्या और परिधि का अनुपात (पाई) का मान बताया गया है !

गोपीभाग्यमधुव्रातशृङ्गिशोदधिसन्धिग !
खलजीवितखातावगलहालारसंधर ॥

भूतसंख्या विधि – इस संस्कृत छंद में सभी नक्षत्रों में उनमें उपस्थित तारों की संख्या बतायी गई है !

त्रित्र्यङ्गपञ्चाग्निकुवेदवह्नय:शरेषुनेत्राश्विशरेन्दुभूकृता: !
वेदाग्निरुद्राश्वियमाग्निवह्नयोस्ब्धय:शतंद्विरदा:भतारका: ! ! (मुहूर्त चिंतामणि,नक्षत्र प्रकरण, श्लोक 58)

अब देखते हैं एक सूत्र जो ज्योतिष के आर्ष ग्रन्थ सूर्यसिद्धान्त से है, हालांकि ऐसे और भी कई जटिल सूत्र हैं ! इस सूत्र से जन्म के समय तात्कालिक ग्रह साधन करना बताया गया है –

इष्टनाड़ीगुणा भुक्ति: षष्ट्या भक्ता कलादिकम् !
गतेशोध्यंयुतंगम्येकृत्वातात्कालिकोभवेत् ! ! (सूर्यसिद्धान्त, मध्यमाधिकार, 67)

अर्थात ग्रह की मध्यम गति कला को इष्ट (जिस समय का ग्रह साधन करना है) घटी से गुणा कर 60 का भाग देने से जो कलादि मिलें, उसे गत इष्ट घटी होने पर मध्यरात्रिकालिक ग्रह में घटाने तथा गम्य इष्ट घटी हो तो मध्यरात्रिकालिक ग्रह में जोडऩे से इष्टकालिक ग्रह होता है !

इसका आज के अनुसार गणितीय सूत्र होगा –

इष्ट कालिक ग्रह = मध्यरात्रि कालिक ग्रह (ग्रह गति कला*इष्ट घटी)/ 60

इसी प्रकार मुहूर्त चिंतामणि (वास्तु प्रकरण, श्लोक 3) में गृहपिण्डायन (घर की जमीन का आकार) की गणना का सूत्र इस श्लोक में है –

एकोनितेष्टक्र्षहताद्वितिथ्यो, रुपोनितेष्टायहतेन्दुनागै: !
युक्ताघनैश्चापियुताविभक्ता, भूपाश्विभि:शेषमितोहिपिण्ड: !!

तो सूत्र ये बना –

पिण्ड मान = [6(इष्ट नक्षत्र संख्या – 1) 3 1528 +6(इष्ट आय -1) 3 818 + 17] / 216

कहने का तात्पर्य यह है कि जटिलतम सूत्र और जटिलतम अंक एवं संख्याएं विभिन्न संस्कृत साहित्यिक छंदों की सीमा में रहते हुए महान गणितज्ञों ने जो कि वास्तव में ज्ञान की कई सारी शाखाओं के ज्ञाता थे, इस प्रकार से स्पष्ट कर दिया है ! विस्मयकारी बात ये है कि वे गणितज्ञ ही नहीं छंदों (काव्य) के भी प्रतिभाशाली विद्वान थे !
अंकगणित के अंकों और संख्याओं के ही नहीं अपितु त्रिकोणमिति और रेखागणित के भी बहुतेरे सूत्र इसी प्रकार छंदों में मिलते हैं, जिन्हें उपयुक्त चित्र बना कर सरलीकृत किया जा सकता है ! आर्यभटीय में समलम्बचतुर्भुज के क्षेत्रफल का वर्णन इस प्रकार किया गया है –

आयामगुणे पाश्र्वे तद्योगह्रितेस्वपातरेखेते !
विस्तरयोगार्धगुणेज्ञेयंक्षेत्रफलमायामे !!

उपरोक्त श्लोक से समलम्ब चतुर्भुज का क्षेत्रफल नीचे दिए गये चित्र से समझ सकते हैं !
ये तो केवल उदाहरण मात्र हैं जो कि क्लिष्ट, जटिल और बहुविध गणितीय समस्याओं को सुलझाते हैं और उनके सिद्धांतों को प्रतिपादित करते हैं !

हालांकि कर्मठ गणितज्ञों ने उनका निराकरण बड़े ही सरल तरीके से किया है ! आवश्यकता है कि इस ज्ञान पर ढेर सारा शोध किये जाने की और इसका प्रयोग करके साधारण जन के दैनिक जीवन में इनको उपयोगी बनाने की !!

अपने बारे में कुण्डली परामर्श हेतु संपर्क करें !

योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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