राम सेतु का निर्माण राम ने नहीं रावण ने किया था : Yogesh Mishra

भारत के समुद्र विज्ञान के राष्ट्रीय संस्थान के शोधकर्ताओं के अनुसार 7500 साल पहले समुद्र का जल स्तर आज से 100 मीटर नीचे था ! पिछले 7500 साल पहले हुये राम रावण के युद्ध में प्रयोग किये गये अस्त्र शस्त्रों ने पृथ्वी के तापमान को बढ़ा दिया था और उससे पिघले हुये ग्लेशियर ने समुद्र के जल स्तर बढ़ा दिया ! जिसमें लंका का सम्पूर्ण राष्ट्र “कुमारी कंदम” जो कभी भारत, आस्ट्रेलिया और अफ्रीका तक विस्तारित था ! वह भूखण्ड महाद्वीप हिन्द महा सागर में जलमग्न हो गया !

यह विश्व की एक प्राचीनतम मानव सभ्यता थी ! जो भारतीय उपमहाद्वीप से भी तीन गुना बड़े भूखण्ड पर स्थित थी !

इस खो चुके समुद्र में खो चुके महाद्वीप का वर्णन आज भी तमिल के लोक गीतों में मिलता है ! पुरातन खोजकर्ताओं द्वारा इसे “कुमारी कंदम” की सभ्यता से जोड़ा गया है ! कुमारी कंदम आज के भारत के दक्षिण में स्थित तमिल सभ्यता थी ! जो महाविनाशकारी राम रावण के युद्ध के बाद विनाशकारी हथियारों के प्रयोग से 49 टुकड़ों में खण्ड खण्ड होकर हिंद महासागर में विलुप्त हो गयी !

इस विलुप्त हो चुकी तमिल सभ्यता को आज के सीकुलर सोच के वैज्ञानिक एक काल्पनिक तमिल सभ्यता का मिथ कह कर पुकारते हैं ! इसे तमिल लोक गीतों में “कुमारी कंदम” या “कुमारी नाडू” (इसी से बाद में तमिलनाडु बना) के नाम से भी जाना जाता है !

तमिल पुरातन विद्वानों के अनुसार “कुमारी कंदम” प्राचीन तमिल लोगों का घर हुआ करता था ! जो शैव संस्कृति के पोषक एवं शिव के उपासक थे ! जिनका निवास रावण के त्रिभुजाकार राष्ट्र में यथार्थ स्वरूप में था ! जिसका विस्तार उत्तर में भारत से लेकर पूर्व में आस्ट्रेलिया और पश्चिम में अफ्रीका के मेडागास्कर तक था !

इसे तमिल साहित्य के अनुसार भारतीय उपमहादीप के दक्षिण में “कुमारी कंदम” नाम की एक तमिल सभ्यता के रूप में जाना जाता था ! जो कभी मनुष्य की उत्पत्ति के केन्द्र भी था ! जो राम रावण के महाविनाशकारी युद्ध के कारण विलुप्त हो गई ! 19वीं सदी के भू वैज्ञानिक फिलिप सेल्टर ने इसे “लैमुरिया” महाद्वीप का नाम दिया था !

कुमारी कंदम के अस्तित्व का समर्थन करने के लिये एक सबूत “पल्क स्ट्रीट” में आज भी स्थित है ! जो श्रीलंका की मुख्य भूमि को भारत से 18 मील की दूरी को जोड़ने वाला चूना पत्थर, रेत, गाद और छोटे कंकड़ से बना बलुआ रेत की एक समुद्र में मानव निर्मित भू श्रृंखला है ! जिसे आज के वैज्ञानिक “एडम ब्रिज” यानि (अनादि कालीन पुल) के नाम से जानते हैं !

जिसे वैष्णव धर्मी साहित्यों में “राम सेतु” कहा गया है ! जो कि भारत और श्रीलंका के मध्य राम के जन्म के पूर्व से ही स्थित था ! ऐसे अनेक प्रमाणिक सबूत होने के बाद भी इस सत्य को वैष्णव ग्रन्थों में हटधार्मिता से राम सेतु कहा जाता है ! इसमें कितनी सत्यता है ! इस बारे में गम्भीर शोध की आवश्यकता है ! जो पुरातन सोच के वैष्णव जीवन शैली के रुढ़िवादी लोग नहीं चाहते हैं ! क्योंकि इससे उनके भगवान राम की चमक फीकी पड़ जायेगी !

वैष्णव ग्रन्थों के अनुसार तथाकथित “राम सेतु” निर्माण लंका के निवासियों के आग्रह पर लंकेश रावण ने भारत में व्यापार व्यवसाय की मंशा से आने जाने के लिये करवाया था ! यह बात भी बहुत ही कम लोग जानते हैं कि लंका के राजवैद्य सुषेण की एक पुत्री सरमा का विवाह विभीषण से और दूसरी पुत्री तारा का विवाह दक्षिण भारत के राजा बाली से हुआ था ! जिसकी राम ने पेड़ों के पीछे छिपकर हत्या कर दी थी और राजा बलि का साम्राज्य सुग्रीव को सौंप दिया था !

यह बहुत ही सामान्य चिंतन का विषय है कि भारत और लंका के मध्य व्यापार संबंध बनाये रखने वाले तत्कालीन व्यापारी और व्यवसायी नागरिक आदि के भारत आने जाने के लिये एक मात्र यह समुद्र मार्ग मे निर्मित पुल ही था जो लंका के नागरिकों को भारत से जोड़ता था ! जिसका निर्माण रावण ने राम के जन्म से पहले ही करावा दिया था ! जिसकी लम्बाई 49 किलोमीटर थी ! जिसके देख रेख और कर संग्रह की जिम्मेदारी दक्षिण के राजा समुद्र के पास थी !

भगवान राम ने जब युद्ध के लिये अपनी सेना को लेकर इस पुल के माध्यम से लंका पर आक्रमण करने का निर्णय लिया ! तब युद्ध के अस्त्र शस्त्र ले जाने के लिये इस पुल की चौड़ाई बढ़ाने की आवश्यकता महसूस की गयी ! तब उस क्षेत्र के राजा समुद्र ने राम को इस पुल पर किसी भी किस्म के अतिरिक्त निर्माण की इजाजत नहीं दी !

जिस पर 3 दिन तक गंभीर चिंतन मंथन चलता रहा और अंततः जब राम ने समुद्र के साम्राज्य के सर्वनाश की धमकी देते हुये अपने परमाणु अस्त्र शस्त्र से हमले की तैयारी शुरू कर दी ! तब राजा समुद्र ने अपनी प्रजा की रक्षा के लिये भगवान राम को इस पुल पर निर्माण करने की आज्ञा दी !

क्योंकि राम की कितनी बड़ी सेना कितने बकरे पुल से समस्त अस्त्र शस्त्रों के साथ लंका नहीं जा सकती थी अतः इस पुल का चौड़ा किया जाना उस युद्ध के लिये अति आवश्यक था ! जिस पुल की चौड़ाई का विस्तार भगवान राम के साथ आये हुये दो इंजीनियर नल-नील ने पांच दिन के अन्दर लगभग तीन किलोमीटर चौड़ा किया !

लेकिन इसका तात्पर्य यह कतई नहीं है कि भगवान राम ने भारत से लंका जाने के लिये किसी पुल का निर्माण करवाया था बल्कि तमिल लोकगीतों के अनुसार वर्णित सत्य यह है कि इस पुल का निर्माण रावण ने लंका के निवासी और व्यवसायियों के भारत आने जाने के लिये राम के जन्म से पूर्व ही करवाया दिया था ! जिसका राम रावण युद्ध के समय मात्र चौड़ीकरण करके प्रयोग किया गया था ! इस 48 किलोमीटर लम्बे और 3 किलोमीटर चौड़े पुल का निर्माण मात्र पांच दिन में किया जाना संभव नहीं था !

इसीलिये इस पुल के चौड़ीकरण का कार्य अति अल्प समय में हो गया क्योंकि वहां पर पहले से ही रावण द्वारा लंका के नागरिकों के भारत आने जाने के लिये एक पुल मौजूद था ! अतः उसी पुल के दोनों तरफ पत्थर डालकर उसे मात्र पांच दिन में 49 किलोमीटर लम्बे पुल को 3 कि.मी. चौड़ा किया जाना अति सरल कार्य था !

एक दूसरा तर्क यह भी है कि 49 किलोमीटर लंबे और 3 किलोमीटर चौड़े तथा 1 किलो मीटर गहरे पुल के निर्माण के लिये जितने पत्थरों की आवश्यकता हुई होगी ! वह पत्थर इकट्ठा करने के लिये कहीं पर इतना गहरा गड्ढा भी खोदा गया होगा ! यह किसी पहाड़ के अंश को तोड़कर लाया गया होगा ! किंतु धनुष्कोटी के निकट ऐसा कोई भी स्थान नहीं दिखता है ! जहां से इतने बड़े पैमाने में पत्थरों को लाया गया हो !

अतः इस तरह यह स्पष्ट हो जाता है कि नल नील ने पुल का निर्माण नहीं किया था बल्कि सेना व सेना के अस्त्र शस्त्रों को ले जाने के लिये जिस जगह पर पुल सकरा था ! मात्र उसको चौड़ीकरण कर दिया था ! जो पांच दिन में सम्पादित हो गया !

इस तरह सिद्ध होता है कि राम सेतु का निर्माण भगवान श्री राम के जन्म से बहुत पहले ही रावण द्वारा करवा दिया गया था ! राम के इंजीनियर नल नील द्वारा मात्र इस राम सेतु पुल से सेना हथियार आदि ले जाने के लिये मात्र इसके चौड़ीकरण का कार्य किया गया था ! जिसे वैष्णव धर्म ग्रंथों में नल नील द्वारा निर्मित बतलाया गया है ! जैसे ताजमहल को शाहजहाँ द्वारा और विष्णु स्तम्भ कुतुबमीनार को कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा निर्मित बतलाया जाता है !!

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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