पूर्वजों का साहित्यिक ज्ञान अद्भुत था : Yogesh Mishra

पश्चिम के विचारकों के अनुसार वैदिक ग्रंथों को लिपि के उपयोग के बिना ही मौखिक रूप से रचा और प्रसारित किया गया था ! जिसमें शिक्षक से लेकर छात्र तक एक अटूट संचरण रेखा मौजूद थी ! जिसे समाज द्वारा पूर्ण स्वीकृति प्राप्त थी !

क्योंकि उस समय वही विद्या व्यक्ति के जीवकोपार्जन का आधार थी ! जैसे आजकल अंग्रेजी भाषा व्यक्ति के जीवकोपार्जन का आधार है ! अतः अंग्रेजी भाषा को समाज में स्वीकृति प्रदान कर दी गई है !

इसी तरह उस समय संस्कृत भाषा को शास्त्रीय ग्रंथों से बेहतर त्रुटिहीन पाठ संचरण के लिये काव्य रूप में तैयार किया गया था ! यह वास्तव में उस समय मानवीय टेप-रिकॉर्ड जैसा ही कुछ था ! इस प्रयोग में न केवल वास्तविक शब्द, बल्कि संगीत के स्वरों के अनुसार उच्चारण का भी महत्व था !

यहीं से स्वर विज्ञान पर शोध कार्यों को आरंभ किया गया ! जो बाद में विकसित होकर स्वर संगीत के रूप में एक नई विधा बन कर समाज के सामने आई ! जो स्वर तरंगों के आधार पर व्यक्ति ही नहीं प्रकृति को भी नियंत्रित करने का सामर्थ्य रखती थी !

प्राचीन भारतीयों द्वारा श्रुतियों के श्रवण, स्मरण और सस्वर पाठ की तकनीक विकसित की गई थी ! सस्वर पाठ या पाठ के कई रूपों को पुनरावृत्ति में सटीकता और वेदों और अन्य ज्ञान ग्रंथों के प्रसारण को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए डिज़ाइन किया गया था ! प्रत्येक वेद में सभी भजन इसी तरह से सुनाये गये थे ! जो आज भी चलन में हैं !

उदाहरण के लिए ऋग्वेद के 10,600 श्लोकों वाले सभी 1,028 भजनों को इसी तरह से संरक्षित किया गया है ! जैसा कि प्राचार्य उपनिषदों के साथ-साथ वेदांगों सहित अन्य सभी वेद के निर्माता थे !

इस असाधारण प्रतिधारण तकनीकों ने न केवल अनछुये शब्द क्रम के संदर्भ में बल्कि ध्वनि के संदर्भ में भी एक सटीक श्रुति के रूप में निर्मित किया गया है ! जो पीढ़ी दर पीढ़ी में प्रसारित होती रही है ! इस विधि के प्रभाव को सबसे प्राचीन भारतीय धार्मिक ग्रंथ, ऋग्वेद के संरक्षण में देख कर हमें अपने पूर्वजों के ज्ञान पर आश्चर्य होता है !

वहीं दूसरी ओर श्रुति के अलावा अन्य पवित्र ग्रंथों को स्मृति के रूप में वर्गीकृत किया गया है ! स्मृति को माध्यमिक अधिकार प्राप्त हैं और ये अधिकार उनको श्रुति से प्राप्त हुए हैं ! जहाँ श्रुति को प्रकृति में निरर्थक और शाश्वत माना जाता है, वहीं स्मृति प्राचीन द्रष्टा और ऋषियों की रचना है !

इसीलिये पाठ के आधार पर, स्मृति को चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है, वेदांग, उपवेद, उपंग, दर्शन ! प्रत्येक स्मृति पाठ कई संस्करणों में मौजूद है, जिसमें कई अलग-अलग पाठन हैं ! महाभारत और रामायण के महाकाव्य स्मृति के प्रमुख उदाहरण हैं ! भगवद गीता भी स्मृति की श्रेणी में आता है !

साथ ही स्मृति हिंदू धर्म को उजागर करने में योगदान देती है लेकिन श्रुति की तुलना में कम आधिकारिक मानी जाती है ! प्राचीन हिंदू न्यायशास्त्र और कानून के मूल ग्रंथ धर्म-सूत्र हैं ! यह व्यक्त करते हैं कि श्रुति, स्मृति और एकरा न्यायशास्त्र और कानून के स्रोत हैं ! धर्म-सूत्रों से ज्ञात, प्रत्येक छंद में इन स्रोतों की पूर्व घोषणा की गई है !

लेकिन पश्चिम के लोग हमारे साहित्यिक ज्ञान के आभाव में मात्र इतना ही कहते हैं कि हिंदू धर्म में श्रुति और स्मृति की भूमिका को मात्र मार्गदर्शन के स्रोत के रूप में मानते हैं !!

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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