बुद्धिजीवियों की दुर्गति क्यों होती है : Yogesh Mishra

भगवान श्री कृष्ण के श्री मुख से निकली हुई श्रीमद भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं कहा है कि यदि ज्ञानमार्गी साधकों का ज्ञान मार्ग में समर्पण नहीं है और वह मात्र वेदों का अनुकरण कर रहे हैं तो भी वह जीवन मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकते हैं !

अर्थात दूसरे शब्दों में कहा जाए तो उच्च से उच्चतम ज्ञान के मार्ग पर चिंतन करने वाला बुद्धिजीवी भी यदि अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित नहीं है, तो उसका सर्वनाश सुनिश्चित है !

इसी को सरल शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है कि ज्ञान ईश्वर का अनमोल वरदान है और ईश्वर की यह इच्छा है कि ईश्वर इस वरदान को जिस व्यक्ति को देता है, वह ईश्वर का प्रतिनिधि बनकर समाज को बिना किसी कामना और भय के सत्य से अवगत करवाये !

लेकिन आज ईश्वर की कृपा से व्यक्ति को सत्य का ज्ञान तो हो जा रहा है, लेकिन उस सत्य के ज्ञान के प्रचार प्रसार के साथ ज्ञानी से ज्ञानी व्यक्ति भी माया के प्रभाव में यश और धन की कामना कर रहा है !

उसी का परिणाम है कि छोटे-छोटे छुब्ध स्वार्थों के लिए व्यक्ति ईश्वर के वरदान स्वरूप प्राप्त ज्ञान के बदले समाज से यश और धन की कामना करने लगता है ! बस यहीं से ईश्वर का जो कार्य उसे दिया गया है ! वह उससे भटक जाता है !

अखबार ने मेरी फोटो छोटी छाप दी ! यूट्यूब चैनल पर मेरे वीडियो के साथ मेरा नाम प्रकाशित नहीं किया गया ! फला पत्रिका में पत्रिका के मालिक ने द्वेष की भावना से मेरे विरोधी व्यक्ति की फोटो छाप दी या मुझ जैसे ज्ञानी को मंच पर स्थान नहीं दिया गया ! या फिर मैंने समाज में इतना कार्य किया और उसके बदले में समाज ने मुझे कोई सहयोग नहीं किया ! आदि आदि

ऐसे ही सैकड़ों तरह के विचार बुद्धिजीवियों की दुर्गति का कारण बनते हैं ! समाज बहुत विस्तृत है ! इस विस्तृत समाज को आत्मसात करने के लिए हृदय और मस्तिष्क भी उतना ही विस्तृत होना चाहिए ! धैर्य सभी समस्याओं का समाधान है !

प्रकृति कभी किसी का उधार नहीं रखती है ! व्यक्ति के कर्म के अनुसार कुछ व्यक्तियों को प्रकृति उनके जीवनकाल में ही यश और धन प्रदान करवा देती है और कुछ व्यक्तियों को उनके न रहने के उपरांत अपार यश प्रदान करके उन्हें इतिहास में महापुरुष बना देती है !

लेकिन संकीर्ण बुद्धि, संस्कार और विचारों के साथ जो बुद्धिजीवी समाज में काम करते हैं ! वह न तो जीवन काल में ही धन यश प्राप्त कर पाते हैं और न ही मरणो उपरांत उन्हें समाज द्वारा महापुरुष की श्रेणी में रखा जाता है !

बल्कि समाज उन्हें ज्ञानी, विद्वान और बुद्धिजीवी होने के बाद भी अहंकारी, लालची, धूर्त और स्वार्थी कहकर ही संबोधित करता है ! ज्ञान तो ईश्वर की कृपा से प्राप्त हो गया लेकिन लालच और धूर्तता का संस्कार व्यक्ति को अपने चिंतन और पुरुषार्थ से बदलना पड़ता है !

यह चिंतन और पुरुषार्थ की प्रक्रिया नितांत व्यक्तिगत है ! जब व्यक्ति ईश्वर द्वारा प्रदत्त ज्ञान को समाज में बांटना शुरू करता है, तो छोटे-छोटे जन समूहों की भीड़ व्यक्ति के अहंकार को पुष्ट करने लगती है और व्यक्ति अपने को योग्य समझकर ईश्वर प्रदत्त ज्ञान को अपनी उत्पत्ति मान बैठता है !

यहीं से उत्पन्न हुआ नकारात्मक चिंतन व्यक्ति के पुरुषार्थ पर पानी फेर देता है और ज्ञानी से ज्ञानी व्यक्ति भी दुर्गति को प्राप्त होता है !

इसलिए एकदम स्पष्ट यह जान लेना चाहिए कि ईश्वर द्वारा प्रदत्त ज्ञान से समाज को बदला ने का मार्ग उदारता और संवेदना से जुड़ा हुआ है ! इसका सांसारिक बाजार में कोई मूल्य नहीं है !

इसलिए ईश्वरीय ज्ञान को बेचकर धन कमाने की कामना या यश प्राप्त करने की कामना ईश्वर की व्यवस्था के विपरीत है ! इसीलिए ईश्वरीय ज्ञान से धन या यश कमाने की कामना करने वाले बुद्धिजीवी प्रकृति की व्यवस्था के अनुसार ईश्वरीय कार्य करते हुए भी दुर्गति को ही प्राप्त होते हैं !!

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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