योग्य गुरु को क्रोधी क्यों होना चाहिये : Yogesh Mishra

उच्चतम आध्यात्मिक सत्य सनातन ज्ञान मात्र भौतिक ज्ञान या कुछ कर्मकाण्डीय श्लोकों को रट लेने से प्राप्त नहीं होता है ! यह एक योग्य गुरु की मानसिक कृपा से ही प्राप्त हो सकता है !

जब गुरु इतना योग्य होता है कि वह समाज के नाकारा से नाकारा व्यक्ति को अपने सानिध्य में रख कर समाज के लिए योग्य और उपयोगी बना देता है, तो समाज का बहुत बड़ा स्वार्थी और अहंकारी वर्ग उस योग्य गुरु के ज्ञान का लाभ प्राप्त करने के लिए उस योग्य गुरु के संपर्क में आना चाहता है !

ऐसी स्थिति में उस योग्य गुरु की यह मजबूरी हो जाती है कि वह स्वार्थी और अहंकारी वर्ग के शिष्यों को अपने पास न आने दे ! इसके लिए उसे अपने व्यक्तित्व को क्रोधी रूप में समाज के सामने प्रकट करना पड़ता है ! जिससे स्वार्थी और अहंकारी वर्ग स्वतः ही उस गुरु को त्याग कर चला जाता है और गुरु को अपना स्वाभाविक कार्य करने में अवरोध पैदा नहीं होता है !

अर्थात क्रोध वह छन्नी है, जिसके अंदर से कभी भी कोई स्वार्थी और अहंकारी व्यक्ति उस पार निकल कर योग्य गुरु के निकट नहीं पहुंच सकता है ! साथ ही योग्य गुरु का क्रोध वह अग्नि भी है जिसमें शिष्य का समस्त लालच और अहंकार जलकर नष्ट हो जाता है ! यदि गुरु क्रोधी न हुआ तो शिष्य कभी भी भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से शुद्ध नहीं हो पायेगा !

इतिहास गवाह है कि हमने जिनको महापुरुष के रूप में गिना है उन सभी के गुरु अत्यंत क्रोधी व्यक्ति हुआ करते थे ! फिर वह योग्य गुरु परशुराम, विश्वामित्र, दुर्वासा, चाणक्य आदि ही क्यों न हों !

योग्य गुरु की क्रोधाग्नि ही शिष्य को सिद्धांतवादी, शुद्ध और समर्पित बना सकती है ! यदि शिष्य गुरु की क्रोधाग्नि में नहीं तपा है तो वह कभी भी समाज के लिए उपयोगी नहीं हो सकता है !

अर्थात दूसरे शब्दों में कहा जाये कि जिस गुरु में क्रोध न हो वह अपने शिष्य को साधना और ज्ञान की अग्नि में तप ही नहीं सकता है और जब तक शिष्य साधना और ज्ञान की अग्नि में तपता नहीं है ! तब तक वह किसी भी सिद्धि को प्राप्त कर ही नहीं सकता है और न कभी सफल साधक और ज्ञानी ही बन सकता है !

इसलिए अपने शिष्य को समाज के हित में सफल साधक और ज्ञानी बनाने के लिए यह क्रोधी व्यक्तित्व गुरु की मजबूरी है ! अत: गुरु को सदैव अपने ज्ञान रूपी क्रोध की अग्नि को प्रज्वलित बनाये रखना उसकी मजबूरी है !

यह क्रोधी व्यक्तित्व भी गुरु की एक साधना है क्योंकि गुरु के क्रोधी व्यक्तित्व के कारण वह अपने जीवन में कभी भी उन भौतिक वस्तुओं को सहज प्राप्त नहीं कर पाता है, जो एक सामान्य कम योग्य व्यक्ति भी सरलता से प्राप्त कर लेता है !

इस बात को जानते हुये भी योग्य गुरु लोकहित में अपने क्रोधी व्यक्तित्व को नहीं त्यागता है, जब कि वह इसे बड़ी सरलता से त्याग सकता है क्योंकि क्रोध ज्ञानी व्यक्ति के संस्कार का हिस्सा नहीं होता है !

यह मात्र संसार के लोभी, स्वार्थी, नाकारा, अयोग्य, व्यक्ति से दूरी बनाये रखने के लिए ओढ़ा गया एक सांसारिक आडंबर मात्र है ! सोचिए की एक योग्य गुरु लोक के हित में अपने सांसारिक नुकसानों को जानते हुये भी मात्र लोक कल्याण के लिए जीवन भर उस क्रोधी व्यक्तित्व के आडंबर को ओढ़े रहता है ! जिसको त्याग देना उसके लिए क्षण मात्र का विषय है !
लेकिन फिर भी वह क्रोध का आडम्बर लोक हित में नहीं छोड़ता है ! यह कितनी बड़ी साधना है क्योंकि गुरु के क्रोध से ही सत्तायें बदलती हैं ! व्यवस्थाएं बदलती हैं ! इतिहास बदलता है और शिष्य का भविष्य भी बदलता है !

एक सरल और निर्मल हृदय का गुरु ही अपने क्रोध की अग्नि में अपने शिष्य को तपा कर खरा सोना बना कर समाज को दे सकता है ! जो गुरु अपने शिष्य और समाज के हित में क्रोध का आडम्बर भी नहीं कर सकता है ! वह व्यक्ति योग्य गुरु कहलाने योग्य भी नहीं है !

इसीलिए आज व्यवसाय कारणों से जिन गुरुओं ने अपने क्रोध को त्याग दिया है ! वह समाज को स्वार्थी, धूर्त, मक्कार और अनुपयोगी शिष्य दे रहे हैं ! ऐसे क्रोध विहीन गुरु के सानिध्य में शिक्षा प्राप्त किया हुआ शिष्य कभी भी समाज के लिए उपयोगी नहीं हो सकता है !
यही शिष्य और समाज दोनों के लिये गुरु के क्रोधी व्यक्तित्व का महत्व है !!

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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