जानिए कैसे यज्ञ ही कृषि वृद्धि का आधार है !!

कृषि को अच्छी प्रकार करने के वेदों ने अनेक उपाय बतायें हैं वा मनुष्यों का मार्गदर्शन किया है ! वेद के अनुसार कृषि कार्य में यज्ञ का उपयोग करना चाहिये ! यजुर्वेद 18/9 में कहा है ‘कृषिश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्’ अर्थात् कृषि के लिए भूमि को उपयोगी बनाते समय यज्ञ का प्रयोग करो ! यज्ञ से भूमि कृषि कार्य में समर्थ व शक्तिशाली बनेगी !

यज्ञ करने से भूमि की उत्पादन सामर्थ्य में वृद्धि होगी ! कृषि कार्य में असमर्थ भूमि में यज्ञ करने से वह कृषि के लिए समर्थ होगी और कृषि भूमि में यज्ञ करने से उसकी उर्वरा शक्ति में वृद्धि होगी ! यज्ञ से भूमि माता कृषि के लिए समर्थ बने, यह प्रार्थना यजुर्वेद 18/22 मन्त्र ‘पृथिवी च मे यज्ञेन कल्पन्ताम् !’ में की गई है ! यज्ञ किए बिना पृथिवी को जीवन नहीं मिलेगा ! यज्ञ करने से भूमि में विद्यमान तत्व एवं द्रव्य शक्ति सम्पन्न होते हैं ! कृषि का वृष्टि वा वर्षा से गहरा सम्बन्ध है !

यजुर्वेद 18/9 मन्त्र में कहा गया है ‘वृष्टिश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्’ कृषि के लिए वर्षा जल की आवश्यकता है वह वर्षा जल भी यज्ञ के द्वारा समर्थ होना चाहिये ! कृषि के लिए जो जल वृष्टि से प्राप्त हो वह यज्ञ से सुसंस्कृत हो और उसी वृष्टि जल से पूर्ण नदी, तालाब, कूवे, बावड़ी, रूीलें भी हों जिससे वृक्ष, वनस्पतियों को सदा यज्ञ का जल प्राप्त होता रहे ! प्रकृतिस्थ वृक्ष व वनस्पतियों को जो वायु प्राप्त हो वह भी यज्ञ द्वारा सुसंस्कृत हो !

इस विषयक यजुर्वेद मन्त्र 18/17 ‘मरुतश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम् !’ अर्थात् वायु भी यज्ञ के द्वारा समर्थ हो ! कृषि कार्यों से संबंधित यजुर्वेद का एक मन्त्र 9/22 ‘नमो मात्रे पृथिव्यै नमो मात्रे पृथिव्या ….. कृष्यै त्वा क्षेमाय त्वा रय्यै त्वा पोषाय त्वा ! !’ भी महत्वपूर्ण है ! इसमें कहा गया है कि हे भूमि माता ! तुझे प्रणाम हो ! हे भूमि माता ! तुझे शतशः वन्दन है ! तुझे कृषि के लिए हम स्वीकार करते हैं ! तुझे अपनी रक्षा के लिए ग्रहण करते हैं ! तुझे ऐश्वर्य के लिए हम चाहते हैं और तुझे अपने पोषण के लिए माता क तुल्य वन्दनीय समझते हैं !

अग्निहोत्र कृषि का मूल सिद्धांत अग्नि द्वारा व्यक्ति, कृषि प्रक्षेत्र व वायुमंडल को पवित्र करने की प्रक्रिया से है ! इसकी प्रक्रिया द्वारा वायुमंडल एवं वातावरण में प्रकृति की स्वाभाविक शक्तियों, ज्योतिषीय संयोजनों एवं मंत्र शक्ति से ऐसे परिवर्तन लाने का प्रयास किया जाता है जिससे सूर्य और चन्द्रमा से प्राप्त होने वाली उच्च शक्ति युक्त ब्रह्माण्डीय ऊर्जा को और अच्छे ढंग से ग्रहण किया जा सके !

सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय 45 से 55 सेकेंड की एक ऐसी घड़ी आती है जब पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र में 20 गुना अधिक वृद्धि होती है ! इस 45-55 सेकेंड के दरम्यान जब देशी गाय के जलते हुए कंडे पर एक ग्राम देशी गाय के घी में दो ग्राम अक्षत चावल मिला कर सूर्य मंत्र के साथ डाले जाते है ! तब एक टन आक्सीजन के अलावा एसीटीलीन, एथीलीन, प्रोपलीन, फार्मल्दीहाईड, बीटा प्रापियोलेक्टीन, जैसे सूक्ष्म पदार्थ निकलते हैं जो सेकेंड के बीसवें हिस्से में सवा किलोमीटर तक तीव्रगति से प्रक्षेपित हो जाते हैं !

जिससे तन और मन को अद्भुत ऊर्जा की प्राप्ति होती है तथा उससे मष्तिक शोधित पोषित हो कर व्यवहारिक निर्णय लेने में सक्षम हो जाता है ! इस ही क्रिया को अग्नि होत्र कहते हैं जो हजारों लाखों वर्ष पुरानी हमारी संस्कृतिक विधा है ! जिसे राम, कृष्ण, भीष्म, कर्ण और द्रोणाचार्य भी किया करते थे !

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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