हमारी अव्यवस्थित विकसित बुद्धि ही हमारे पतन का कारण है
हमारी अव्यवस्थित विकसित बुद्धि ही हमारे पतन का मार्ग प्रशस्त कर रही है। यदि हम इसे न्यूरोबायोलॉजी और हार्मोनल दृष्टिकोण से समझें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारे मस्तिष्क के अभूतपूर्व विकास ने हमारे ही शरीर के प्राकृतिक रसायनों को हमारे विरुद्ध खड़ा कर दिया है। जिसे हम तीन मुख्य हार्मोन्स के जरिए समझ सकते हैं !
- कॉर्टिसोल : अज्ञात और काल्पनिक भय का हार्मोन
पशुओं में बुद्धि सीमित होती है, इसलिए उनका तनाव केवल वर्तमान के वास्तविक और शारीरिक खतरे तक सीमित रहता है। परंतु इंसान अपनी विकसित बुद्धि (प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स) के कारण भविष्य की सटीक कल्पना कर सकता है।
इसी अव्यवहारिक बुद्धि के कारण हम नौकरी, ईएमआई, भविष्य की सुरक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा जैसी अमूर्त चीजों को लेकर लगातार चिंता करते हैं। हमारी बुद्धि लगातार मस्तिष्क को खतरे का संकेत देती है, जिससे शरीर में चौबीसों घंटे कॉर्टिसोल जैसे तनाव हार्मोन का स्राव होता रहता है। यह दीर्घकालिक तनाव हमारे हृदय, पाचन और नर्वस सिस्टम को भीतर से खोखला कर रहा है।
- डोपामाइन : आप का कृत्रिम दोहन
प्रकृति ने हमें मेहनत करने और जीवन में आगे बढ़ने के लिए ‘डोपामाइन’ के रूप में एक जैविक इनाम प्रणाली दी थी। लेकिन हमारी विकसित बुद्धि ने ऐसे कृत्रिम साधन (जैसे उपभोक्तावाद, सोशल मीडिया, और जंक फूड) बना लिए हैं जो बिना वास्तविक मेहनत के डोपामाइन का स्तर बढ़ा देते हैं।
इससे इंसान लालच, व्यसन और कभी संतुष्ट न होने वाली इच्छाओं के चक्रव्यूह में फंस गया है। डोपामाइन की यह अंधी दौड़ ही पृथ्वी के संसाधनों के अत्यधिक दोहन और हमारे पर्यावरणीय सर्वनाश का मुख्य कारण है।
3. टेस्टोस्टेरोन : अंधी प्रतिस्पर्धा के कारण वंश अवरोध
प्राकृतिक रूप से टेस्टोस्टेरोन का उद्देश्य परिवार और समाज की रक्षा करना था। लेकिन हमारी जटिल बौद्धिक और कॉर्पोरेट व्यवस्थाओं ने इस हार्मोन की ऊर्जा को अंधी प्रतिस्पर्धा, एकाधिकार और शक्ति के विनाशकारी प्रदर्शन में बदल दिया है, जो अंततः समाज में युद्ध और गहरा अलगाव पैदा कर रहा है।
कहने का तात्पर्य यह है कि हमारी बुद्धि ने हमें भौतिक साधन और कृत्रिम सुरक्षा तो दी, लेकिन इसने हमारे नर्वस सिस्टम को प्राकृतिक सह-अस्तित्व से पूरी तरह काट दिया है। यही हार्मोनल और जैविक असंतुलन हमारे शारीरिक, मानसिक और वैश्विक पतन का कारण बन रहा है।
इस सर्वनाश से बचने का एक मात्र उपाय अपनी जड़ों की ओर लौटना और एक ऐसी सादगीपूर्ण जीवन शैली अपनाना है, जो हमारे प्राकृतिक और जैविक मूल के अनुकूल हो। इसी के लिये शैव ग्राम की स्थापना की जा रही है ! जहाँ व्यक्ति भोजन, आवास की चिंता से मुक्त आत्म निर्भर जीवन जी सके !!
