दलितों का कोई जनाधार नहीं था अम्बेडकर के पास : Yogesh Mishra

आज, भारतरत्न बाबा साहब डा. भीमराव आंबेडकर की एक सौ छब्बीसवीं जयंती पर उन्हें याद करते हुए देश की नई पीढ़ी के लिए यह जानना दिलचस्प है कि भारत के जिस संविधान का उन्हें निर्माता कहा जाता है 26 नवंबर, 1949 को उसके अधिनियमित, आत्मार्पित व अंगीकृत होने के बाद 1952 में संपन्न हुए देश के पहले लोकसभा चुनाव में वह बुरी तरह हार गए थे ! उनकी यह चुनावी पराजय लंबे समय तक चर्चा का विषय बनी रही थी !

दुर्भाग्य से, बाबासाहब की जयंतियों व निर्वाण दिवसों पर अनेकानेक समारोही आयोजनों के बावजूद हमारी नई पीढ़ी को उनके व्यक्तित्व व कृतित्व के बारे में ज्यादा जानकारियां नहीं हैं ! उनके लिखे-पढ़े और कहे पर भी या तो चर्चा ही नहीं होती या खास राजनीतिक नजरिये से होती है, जिस कारण उनका असली मन्तव्य सामने नहीं आ पाता है !

इसलिये कम ही लोग जानते हैं कि अम्बेडकर आजादी के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व में बनी देश की पहली अंतरिम सरकार में वह विधि और न्यायमंत्री हुआ करते थे ! बाद में कई मुद्दों पर कांग्रेस से नीतिगत मतभेदों के कारण उन्होंने 27 सितंबर, 1951 को पंडित नेहरू को पत्र लिखकर मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया था और अपने द्वारा 1942 में गठित जिस शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन यानी अनुसूचित जाति संघ को स्वतंत्रता संघर्ष की व्यस्तताओं के कारण ठीक से खड़ा नहीं कर पाये थे, अपने अस्तित्व रक्षा के लिये उसको नये सिरे से मजबूत करने में लग गये थे !

1952 का पहला आम चुनाव आया तो उन्होंने उक्त फेडरेशन के बैनर पर 35 प्रत्याशी खड़े किये ! लेकिन जनाधार न होने के कारण उनके सिर्फ दो ही प्रत्याशी जीत सके ! खुद डा आंबेडकर ही महाराष्ट्र बंबई शहर उत्तरी सीट से चुनाव लड़ें और हार गये थे और कांग्रेस के प्रत्याशी चुन लिये गये !

यह हार डा. आंबेडकर के लिए इस कारण कुछ ज्यादा ही पीड़ादायक थी कि महाराष्ट्र उनकी कर्मभूमि हुआ करती थी ! जिस पर कोढ़ में खाज यह कि मई 1952 में फिर लोकसभा के उपचुनाव हुये जिसमें वह फिर खड़े हुये और फिर हार गये !

बाबा साहब की इन्हीं हारों के कारण उनसे असहमत नेता व पार्टियां तर्क दिया करती थीं कि दलित उन्हें अपना नेता नहीं मानते हैं अत: दलितों की ओर से उन्हें बोलने का नैतिक अधिकार नहीं है !

यह भी बतला देता हूँ कि जिस संविधान के निर्माण में बाबासाहब का अविस्मरणीय योगदान बतलाया जाता है पहली बार बनी गयी संविधान सभा के सदस्यों में भी उनका नाम नहीं था ! बाबा साहब के समर्थकों को यह बात ठीक नहीं लगी तो बंगाल के एक सदस्य ने संविधान सभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर उनकी सदस्यता का रास्ता साफ किया था !

जहाँ से वह चुनाव लड़ें और जीत ! लेकिन 1947 मे भारत विभाजन के बाद आंबेडकर का चुनाव क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान चला गया था ! तब आंबेडकर का संविधान सभा में पहुंचना फिर मुश्किल हो गया था ! तब बड़े दिल वाले उदार ब्राह्मण महापुरुष पी. जयकर ने पुणे की अपनी सीट आंबेडकर के लिये खाली कर दी ! ताकि आंबेडकर संविधान सभा पहुँच सकें !

इससे सिद्ध होता है कि अम्बेडकर के पास कोई जनाधार नहीं था ! वह मात्र भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन को कमजोर करने के लिये अंग्रेजों द्वारा राजनैतिक प्रयोग के लिये नेता बनाये गये थे

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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