प्राचीन काल की अलौकिक जातियां देव, दैत्य, दानव, राक्षस, यक्ष, किन्नर, आदि का रहस्य ! Yogesh Mishra

वर्तमान में वर्ण (रंग) को भी जाति ही समझा जाता है ! किताबों में या डिक्शनरी में जाति शब्द को कई अन्य शब्दों से संयुक्त करके दर्शाया जाता है जिसके चलते समाज में भ्रम की स्थिति है ! आजकल जाति कहने से जातिवाद समझ में आता है, लेकिन हम यहां उस तरह की जाति की बात नहीं कर रहे हैं जो वर्तमान में प्रचलित है !

बहुत प्राचीनकाल में लोग हिमालय के आसपास ही रहते थे ! वेद और महाभारत पढ़ने पर हमें पता चलता है कि आदिकाल में प्रमुख रूप से ये जातियां थीं- देव, दैत्य, दानव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व, भल्ल, वसु, अप्सराएं, पिशाच, सिद्ध, मरुदगण, किन्नर, चारण, भाट, किरात, रीछ, नाग, विद्‍याधर, मानव, वानर आदि ! देवताओं को सुर तो दैत्यों को असुर कहा जाता था ! हम यहां बता रहे हैं कि प्राचीन जातियों के बारे में !

देव जाति के लोग कौन थे ?

देव जाति : देवताओं की उत्पत्ति कश्यप की पत्नीं अदिति से हुई ! देवताओं के धरती पर रहने के स्थान को पुराणों अनुसार हिमालय में दर्शाया गया है ! देवताओं को पहले लोग स्वर्गदूत, आकाशदेव, ईश्वरदूत आदि नामों से जानते थे ! कुछ लोगों का मानना है कि ये सभी मानव समान ही थे ! ये सभी कश्यप ऋषि और अदिति की संताने हैं और ये सभी हिमालय के नंदनकानन वन में रहते थे !

सभी देवता, गंधर्व, यक्ष और अप्सरा आदि देव या देव समर्थक जातियां हिमालय के उत्तर में ही रहती थी ! देवताओं के अधिपति इन्द्र, गुरु बृहस्पति और विष्णु परम ईष्ट हैं ! देवताओं के भवन, अस्त्र आदि के निर्माणकर्ता विश्‍वकर्मा थे !

माना जाता है कि आज से लगभग 12-13 हजार वर्षं पूर्व तक संपूर्ण धरती बर्फ से ढंकी हुई थी और बस कुछ ही जगहें रहने लायक बची थी उसमें से एक था देवलोक जिसे इन्द्रलोक और स्वर्गलोक भी कहते थे ! यह लोक हिमालय के उत्तर में था ! सभी देवता, गंधर्व, यक्ष और अप्सरा आदि देव या देव समर्थक जातियां हिमालय के उत्तर में ही रहती थी !

भारतवर्ष जिसे प्रारंभ में हैमवत् वर्ष कहते थे यहां कुछ ही जगहों पर नगरों का निर्माण हुआ था बाकि संपूर्ण भारतवर्त समुद्र के जल और भयानक जंगलों से भरा पड़ा था, जहां कई अन्य तरह की जातियां प्रजातियां निवास करती थी ! सुर और असुर दोनों ही आर्य थे !

देवताओं के राजा को इंद्र कहा जाता था ! इस तरह स्वर्ग पर राज करने वाले 14 इंद्र माने गए हैं ! जिनके नाम इस प्रकार हैं- यज्न, विपस्चित, शीबि, विधु, मनोजव, पुरंदर, बाली, अद्भुत, शांति, विश, रितुधाम, देवास्पति और सुचि ! कहा जाता है कि एक इन्द्र ‘वृषभ’ (बैल) के समान था ! असुरों के राजा बली भी इंद्र बन चुके हैं और रावण पुत्र मेघनाद ने भी इंद्रपद हासिल कर लिया था !

जानिए असुर कौन थे ?

असुरों को दैत्य कहा जाता है ! दैत्यों की कश्‍यप पत्नी दिति से उत्पत्ति हुई ! कश्यप ऋषि ने दिति के गर्भ से हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्र एवं सिंहिका नामक एक पुत्री को जन्म दिया ! श्रीमद्भागवत् के अनुसार इन तीन संतानों के अलावा दिति के गर्भ से कश्यप के 49 अन्य पुत्रों का जन्म भी हुआ, जो कि मरुन्दण कहलाए ! कश्यप के ये पुत्र निसंतान रहे ! जबकि हिरण्यकश्यप के चार पुत्र थे- अनुहल्लाद, हल्लाद, भक्त प्रह्लाद और संहल्लाद ! इन्हीं से असुरों के कुल और साम्राज्य का विस्तार हुआ !

प्राचीन काल में हिमालय से इतर जो भी भाग था उसे धरती और हिमालय के भाग को स्वर्ग माना जाता था ! कुछ लोग मानते हैं कि ब्रह्मा और उनके कुल के लोग धरती के नहीं थे ! उन्होंने धरती पर आक्रमण करके मधु और कैटभ नाम के दैत्यों का वध कर धरती पर अपने कुल का विस्तार किया था ! बस, यहीं से धरती के दैत्यों और स्वर्ग के देवताओं के बीच लड़ाई शुरू हो गई !

दैत्यों के अधिपति हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप के बाद विरोचन बने जिनके गुरु शुक्राचार्य और शिव परम ईष्ट हैं ! एक ओर जहां देवताओं के भवन, अस्त्र आदि के निर्माणकर्ता विश्‍वकर्मा थे तो दूसरी ओर असुरों के मयदानव !

इंद्र का युद्ध सबसे पहले वृत्तासुर से हुआ था जो पारस्य देश में रहता था ! माना जाता है कि ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के कुछ क्षे‍त्रों में असुरों का ही राज था ! इंद्र का अंतिम युद्द शम्बासुर के साथ हुआ था ! महाबली बलि का राज्य दक्षिणभारत के महाबलीपुरम में था जिसको भगवान विष्णु ने पाताल लोक का राजा बना दिया था ! असुरों के राजा बलि की चर्चा पुराणों में बहुत होती है ! वह अपार शक्तियों का स्वामी लेकिन धर्मात्मा था ! प्रह्लाद के कुल में विरोचन के पुत्र राजा बलि का जन्म हुआ ! इस बलि ने ही अमृत मंथन के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी !

जानिए राक्षस कौन थे ?

राक्षस जाति : राक्षस लोग पहले रावण के समय में सभी की रक्षा करने के लिए नियुक्त हुए थे, लेकिन बाद में रावण की मृत्यु के बाद विभीषण के शासन काल में इनकी प्रवृत्तियां बदलने के कारण ये अपने कर्मों के कारण बदनाम होते गए और आज के संदर्भ में इन्हें असुरों और दानवों जैसा ही माना जाता है !

राक्षसों की उत्पत्ति और उनका इतिहास!!!

पुराणों अनुसार कश्यप की सुरसा नामक रानी से यातुधान (राक्षस) उत्पन्न हुए, लेकिन एक कथा अनुसार प्रजापिता ब्रह्मा ने समुद्रगत जल और प्राणियों की रक्षा के लिए अनेक प्रकार के प्राणियों को उत्पन्न किया ! उनमें से कुछ प्राणियों ने रक्षा की जिम्मेदारी संभाली तो वे राक्षस कहलाए और जिन्होंने यक्षण (पूजन) करना स्वीकार किया वे यक्ष कहलाए ! जल की रक्षा करने के महत्वपूर्ण कार्य को संभालने के लिए ये जाति पवित्र मानी जाती थी ! समुद्र के तटवर्ती क्षेत्र पर राक्षस जाति के लोग रहते थे !

राक्षसों का प्रतिनिधित्व दोनों लोगों को सौंपा गया- ‘हेति’ और ‘प्रहेति’ ! ये दोनों भाई थे ! ये दोनों भी दैत्यों के प्रतिनिधि मधु और कैटभ के समान ही बलशाली और पराक्रमी थे ! प्रहेति धर्मात्मा था तो हेति को राजपाट और राजनीति में ज्यादा रुचि थी !

नाग जाति के लोग कौन थे ?

नाग जाति : नाग जाति के लोगों को वैसे पाताल का वासी माना जाता है ! धरती पर ही सात पातालों का वर्णन पुराणों में मिलता है ! ये सात पाताल है- अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल ! सुतल नामक पाताल में कश्यप की पत्नी कद्रू से उत्पन्न हुए अनेक सिरों वाले सर्पों का ‘क्रोधवश’ नामक एक समुदाय रहता है ! उनमें कहुक, तक्षक, कालिया और सुषेण आदि प्रधान नाग हैं !

कद्रू जो प्रजापति दक्ष की कन्या हैं तथा कश्यप मुनि की पत्नी, से सम्पूर्ण नाग जाती का जन्म हुआ हैं, इसीलिए उन्हें नाग माता के नाम से जाना जाता हैं ! देवी मनसा, जो भगवान शिव की बेटी हैं, उन्हें भी नाग माता कहा जाता हैं, जिनका विवाह जरत्कारु नाम के ऋषि के साथ हुआ था ! एक समय राजा जनमेजय द्वारा, अपने पिता के नाग दंश से मृत्यु हो जाने पर, नागों को भस्म कर देने वाला नाग यज्ञ हुआ ! परिणामस्वरूप सभी नाग, यज्ञ में गिरकर भस्म होने लगे, तदनंतर देवी मनसा के पुत्र आस्तिक द्वारा, ऐसा उपाए किया गया, जिससे नाग यज्ञ बंद हुआ और सभी नागों की रक्षा हुई, तभी से देवी मनसा भी नाग माता के नाम से विख्यात हैं ! नाग प्रजाति के मुख्य 12 नाग हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं- 1. अनंत 2. कुलिक 3. वासुकि 4. शंकुफला 5. पद्म 6. महापद्म 7. तक्षक 8. कर्कोटक 9. शंखचूड़ 10. घातक 11. विषधान 12. शेष नाग !

अनंत (शेष), वासुकी, तक्षक, कार्कोटक और पिंगला- उक्त पांच नागों के कुल के लोगों का ही भारत में वर्चस्व था ! इन्हीं से नागवंश चला ! महाभारत काल में पूरे भारत वर्ष में नागा जातियों के समूह फैले हुए थे ! विशेष तौर पर कैलाश पर्वत से सटे हुए इलाकों से असम, मणिपुर, नागालैंड तक इनका प्रभुत्व था ! ये लोग सर्प पूजक होने के कारण नागवंशी कहलाए ! कुछ विद्वान मानते हैं कि शक या नाग जाति हिमालय के उस पार की थी ! अब तक तिब्बती भी अपनी भाषा को ‘नागभाषा’ कहते हैं !

एक सिद्धांत अनुसार ये मूलत: कश्मीर के थे ! कश्मीर का ‘अनंतनाग’ इलाका इनका गढ़ माना जाता था ! कांगड़ा, कुल्लू व कश्मीर सहित अन्य पहाड़ी इलाकों में नाग ब्राह्मणों की एक जाति आज भी मौजूद है ! नाग वंशावलियों में ‘शेष नाग’ को नागों का प्रथम राजा माना जाता है ! शेष नाग को ही ‘अनंत’ नाम से भी जाना जाता है ! इसी तरह आगे चलकर शेष के बाद वासुकी हुए फिर तक्षक और पिंगला ! वासुकी का कैलाश पर्वत के पास ही राज्य था और मान्यता है कि तक्षक ने ही तक्षकशिला (तक्षशिला) बसाकर अपने नाम से ‘तक्षक’ कुल चलाया था ! उक्त तीनों की गाथाएं पुराणों में पाई जाती हैं !

उनके बाद ही कर्कोटक, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अनत, अहि, मनिभद्र, अलापत्र, कम्बल, अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना इत्यादी नाम से नागों के वंश हुआ करते थे ! भारत के भिन्न-भिन्न इलाकों में इनका राज्य था !

अथर्ववेद में कुछ नागों के नामों का उल्लेख मिलता है ! ये नाग हैं श्वित्र, स्वज, पृदाक, कल्माष, ग्रीव और तिरिचराजी नागों में चित कोबरा (पृश्चि), काला फणियर (करैत), घास के रंग का (उपतृण्य), पीला (ब्रम), असिता रंगरहित (अलीक), दासी, दुहित, असति, तगात, अमोक और तवस्तु आदि !

‘नागा आदिवासी’ का संबंध भी नागों से ही माना गया है ! छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी नल और नाग वंश तथा कवर्धा के फणि-नाग वंशियों का उल्लेख मिलता है ! पुराणों में मध्यप्रदेश के विदिशा पर शासन करने वाले नाग वंशीय राजाओं में शेष, भोगिन, सदाचंद्र, धनधर्मा, भूतनंदि, शिशुनंदि या यशनंदि आदि का उल्लेख मिलता है !

पुराणों अनुसार एक समय ऐसा था जबकि नागा समुदाय पूरे भारत (पाक-बांग्लादेश सहित) के शासक थे ! उस दौरान उन्होंने भारत के बाहर भी कई स्थानों पर अपनी विजय पताकाएं फहराई थीं ! तक्षक, तनक और तुश्त नागाओं के राजवंशों की लम्बी परंपरा रही है ! इन नाग वंशियों में ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि सभी समुदाय और प्रांत के लोग थे !

शहर और गांव : नागवंशियों ने भारत के कई हिस्सों पर राज किया था ! इसी कारण भारत के कई शहर और गांव ‘नाग’ शब्द पर आधारित हैं ! मान्यता है कि महाराष्ट्र का नागपुर शहर सर्वप्रथम नागवंशियों ने ही बसाया था ! वहां की नदी का नाम नाग नदी भी नागवंशियों के कारण ही पड़ा ! नागपुर के पास ही प्राचीन नागरधन नामक एक महत्वपूर्ण प्रागैतिहासिक नगर है ! महार जाति के आधार पर ही महाराष्ट्र से महाराष्ट्र हो गया ! महार जाति भी नागवंशियों की ही एक जाति थी !

इसके अलावा हिंदीभाषी राज्यों में ‘नागदाह’ नामक कई शहर और गांव मिल जाएंगे ! उक्त स्थान से भी नागों के संबंध में कई किंवदंतियां जुड़ी हुई हैं ! नगा या नागालैंड को क्यों नहीं नागों या नागवंशियों की भूमि माना जा सकता है !

गंधर्व और अप्सरा कौन ?

गंधर्वों की उत्पत्ति कश्यप पत्नी अरिष्टा से हुई ! हिमालय के उत्तर में देवलोक के पास गंधर्व लोक की स्थिति बनाई गई है ! भारतीय पुराणों में यक्षों, गंधर्वों और अप्सराओं का जिक्र आता रहा है ! यक्ष, गंधर्व और अप्सराएं देवताओं की इतर श्रेणी में माने गए हैं ! कहते हैं कि इन्द्र ने 108 ऋचाओं की रचना कर अप्सराओं को प्रकट किया ! मंदिरों के कोने-कोने में आकर्षक मुद्रा में अंकित अप्सराओं की ‍मूर्तियां सुंदर देहयष्टि और भाव-भंगिमाओं से ध्यान खींच लेती हैं !

वेद और पुराणों की गाथाओं में उर्वशी, मेनका, रम्भा, घृताची, तिलोत्तमा, कुंडा आदि नाम की अप्सराओं का जिक्र होता रहा है ! सभी अप्सराओं की विचित्र कहानियां हैं ! माना जाता है कि ये अप्सराएं गंधर्व लोक में रहती थीं ! ये देवलोक में नृत्य और संगीत के माध्यम से देवताओं का मनोरंजन करती थीं !

गन्धर्वों के दूसरे नाम ‘गातु’ और ‘पुलम’ भी हैं ! महाभारत में गन्धर्व नाम की एक ऐसी जाति का भी उल्लेख हुआ है, जो पहाड़ों और जंगलों में रहती थी ! ऋग्वेद में गंधर्व वायुकेश, सोमरक्षक, मधुर-भाषी, संगीतज्ञ और स्त्रियों के ऊपर अतिप्राकृत रूप से प्रभविष्णु बतलाए गए हैं !

शास्त्रों के अनुसार देवराज इन्द्र के स्वर्ग में 11 अप्सराएं प्रमुख सेविका थीं ! ये 11 अप्सराएं हैं-कृतस्थली, पुंजिकस्थला, मेनका, रम्भा, प्रम्लोचा, अनुम्लोचा, घृताची, वर्चा, उर्वशी, पूर्वचित्ति और तिलोत्तमा ! इन सभी अप्सराओं की प्रधान अप्सरा रम्भा थी !

अलग-अलग मान्यताओं में अप्सराओं की संख्या 108 से लेकर 1008 तक बताई गई है ! कुछ नाम और- अम्बिका, अलम्वुषा, अनावद्या, अनुचना, अरुणा, असिता, बुदबुदा, चन्द्रज्योत्सना, देवी, घृताची, गुनमुख्या, गुनुवरा, हर्षा, इन्द्रलक्ष्मी, काम्या, कर्णिका, केशिनी, क्षेमा, लता, लक्ष्मना, मनोरमा, मारिची, मिश्रास्थला, मृगाक्षी, नाभिदर्शना, पूर्वचिट्टी, पुष्पदेहा, रक्षिता, ऋतुशला, साहजन्या, समीची, सौरभेदी, शारद्वती, शुचिका, सोमी, सुवाहु, सुगंधा, सुप्रिया, सुरजा, सुरसा, सुराता, उमलोचा आदि !

कौन थे यक्ष ?

यक्ष, पुरुष तथा उनकी स्त्रियों को यक्षिणियां कहते हैं, ये एक प्रकार के प्रेत ही हैं जो भूमि में गड़े हुऐ गुप्त निधि खजाना) के रक्षक हैं, इन्हें निधि पति भी कहा जाता हैं ! इनके सर्वोच्च स्थान पर निधि पति ‘कुबेर’ विराजित हैं तथा देवताओं के निधि के रक्षक हैं !

उत्लेखनीय है कि जब पाण्डव दूसरे वनवास के समय वन-वन भटक रहे थे तब एक यक्ष से उनकी भेंट हुई जिसने युधिष्ठिर से विख्यात ‘यक्ष प्रश्न’ किए थे ! उपनिषद की एक कथा अनुसार एक यक्ष ने ही अग्नि, इंद्र, वरुण और वायु का घमंड चूर-चूर कर दिया था !

यक्षिणी साधना के विषय में जानकारी मिलती है ! प्रमुख रूप से आठ यक्षिणियों की पुराणों में चर्चा मिलती है ! ये प्रमुख यक्षिणियां है – 1. सुर सुन्दरी यक्षिणी, 2. मनोहारिणी यक्षिणी, 3. कनकावती यक्षिणी, 4. कामेश्वरी यक्षिणी, 5. रतिप्रिया यक्षिणी, 6. पद्मिनी यक्षिणी, 7. नटी यक्षिणी और 8. अनुरागिणी यक्षिणी !

किन्नर जाति के लोग !

आज भी किन्नर जाति के लोग हिमालयीन राज्यों की पहाड़ियों पर रहते हैं ! खासकर ये नेपाल और सिक्किम में फैले हुए हैं ! पुराणों अनुसार किन्नर हिमालय के क्षेत्रों में बसने वाली एक मनुष्य जाति का नाम है, जिसके प्रधान केंद्र हिमवत्‌ और हेमकूट थे ! वर्तमान में किन्नर हिमालय में आधुनिक कन्नोर प्रदेश के पहाड़ी लोगों को कहा जाता है, जिनकी भाषा कन्नौरी, गलचा, लाहौली आदि बोलियों के परिवार की है ! आजकल हिजड़ों के लिए भी किन्नर शब्द का प्रयोग किया है, लेकिन ये जाति आलौकिक और जादुई थी !

पौराणिक ग्रन्थों, वेदों-पुराणों और साहित्य तक में किन्नर हिमालय क्षेत्र में बसने वाली अति प्रतिष्ठित व महत्वपूर्ण आदिम जाति है जिसके वंशज वर्तमान जनजातीय जिला किन्नौर के निवासी माने जाते हैं ! संविधान में भी इन्हें किन्नौरा और किन्नर से संबोधित किया गया है ! महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने किन्नौर जिसे वे प्रमाण के साथ प्राचीन ‘किन्नर देश’ मानते हैं, इस क्षेत्र की अनेक यात्राएं की हैं और कई पुस्तकें लिखी हैं ! किन्नर देश और किन्नर जाति का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व समझने के लिए उनकी बहुचर्चित पुस्तकें ‘किन्नर देश’ और ‘हिमाचल’ है ! उनके अनुसार ‘यह किन्नर देश है ! महाभारत के दिग्विजय पर्व में अर्जुन का किन्नरों के देश में जाने का वर्णन आता है ! एक शाप के चलते अर्जुन को किन्नर बनना पड़ा था !

गंधर्वों की तरह गायन, वादन में निपुण मृदुभाषी किन्नरियां अपने अनुपम तथा मनमुग्ध कर देने वाले सौन्दर्य के लिए प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध हैं ! किन्नरियों में रूप परिवर्तन की अद्भुत काला होती हैं ! हिन्दू तंत्र ग्रंथों में किन्नरियों को विशेष स्थान प्राप्त है ! शतपथ ब्राह्मण (7.5.2.32) में अश्वमुखी मानव शरीरवाले किन्नर का उल्लेख है ! बौद्ध साहित्य में किन्नर की कल्पना मानवमुखी पक्षी के रूप में की गई है ! मानसार में किन्नर के गरुड़मुखी, मानवशरीरी और पशुपदी रूप का वर्णन है !

कुछ लोक प्रसिद्ध और सिद्ध किन्नरियों की साधना करते हैं ! गायन तथा सौंदर्यता हेतु इनकी साधना विशेष लाभप्रद हैं ! किन्नरियों का वरदान अति शीघ्र तथा सरलता से प्राप्त हो जाता हैं ! मुखतः छह किन्नरियों का समूह है:- 1.मनोहारिणी किन्नरी, 2.शुभग किन्नरी, 3.विशाल नेत्र किन्नरी, 4.सुरत प्रिय किन्नरी, 5. सुमुखी किन्नरी, 6. दिवाकर मुखी किन्नरी !

जानिए दानव कौन थे ?

दैत्यों और दानवों को एक ही माना जाता रहा है जबकि ये सभी अलग अलग थे ! हालांकि दोनों एक दूसरे के सहयोगी थे ! दानव विशालकाय होते थे ! इतने विशालकाय की वे मानव को अपने पैरों से कुचल सकते थे !

ऋषि कश्यप को उनकी पत्नी दनु के गर्भ से द्विमुर्धा, शम्बर, अरिष्ट, हयग्रीव, विभावसु, अरुण, अनुतापन, धूम्रकेश, विरूपाक्ष, दुर्जय, अयोमुख, शंकुशिरा, कपिल, शंकर, एकचक्र, महाबाहु, तारक, महाबल, स्वर्भानु, वृषपर्वा, महाबली पुलोम और विप्रचिति आदि 61 महान पुत्रों की प्राप्ति हुई ! इन सभी ने दानव कुल और साम्राज्य का विस्तार किया !

ब्रह्माजी की आज्ञा से प्रजापति कश्यप ने वैश्वानर की दो पुत्रियों पुलोमा और कालका के साथ भी विवाह किया ! उनसे पौलोम और कालकेय नाम के साठ हजार रणवीर दानवों का जन्म हुआ जो कि कालान्तर में निवातकवच के नाम से विख्यात हुए !

नायिकाएं कौन थीं ?

नायक और नायिकाओं नाम का भी एक समूह था ! नायिकाओं को यक्षिणियां तथा अप्सराओं की उप-जाति माना जाता था ! ये मन मुग्ध करने वाली अति सुन्दर स्त्रियां होती थीं ! ये मुख्यतः आठ हैं, 1. जया 2. विजया 3. रतिप्रिया 4. कंचन कुंडली 5. स्वर्ण माला 6. जयवती 7. सुरंगिनी 8. विद्यावती !

इन नायिकाओं का भी ऋषि-मुनियों की कठिन तपस्या को भंग करने हेतु देवताओं द्वारा नियुक्त किया गया था ! इनकी भी साधनाएं की जाती है जो वशीकरण तथा सुंदरता प्राप्ति हेतु होती है ! नारियों को आकर्षित करने का हर उपाय इन के पास हैं !

कौन है चारण और भाट !

चारण भारत के पश्चिमी गुजरात राज्य में रहने वाले व हिन्दू जाति की वंशावली का विवरण रखने वाले वंशावलीविद होते हैं ! चारणों का उद्भवन कैसे और कब हुआ, वे इस देश में कैसे फैले और उनका मूल रूप क्या था, आदि प्रश्नों के संबंध में पुराणों में जानकारी मिलती है ! ये देवताओं की उप जाति है !

चारणों की उत्पत्ति दैवी कही गई है ! ये पहले मृत्युलोक के पुरुष न होकर स्वर्ग के देवताओं में से थे (श्रीमद्भा. 3 ! 10 ! 27-28) ! ब्रह्मा ने चारणों का कार्य देवताओं की स्तुति करना निर्धारित किया ! मत्स्य पुराण (249.35) अनुसार चारणों का उल्लेख स्तुतिवाचकों के रूप में है ! चारणों ने सुमेरू छोड़कर आर्यावर्त के हिमालय प्रदेश को अपना तप क्षेत्र बनाया, इस प्रसंग में उनकी भेंट अनेक देवताओं और महापुरुषों से हुई !

ब्रह्मपुराण का प्रसंग तो स्पष्ट करता है कि चारणों को भूमि पर बसानेवाले महाराज पृथु थे ! उन्होंने चारणों को तैलंग देश में स्थापित किया और तभी से वे देवताओं की स्तुति छोड़ राजपुत्रों और राजवंश की स्तुति करने लगे ! महाभारत के बाद भारत में कई स्थानों पर चारण वंश नष्ट हो गया ! केवल राजस्थान, गुजरात, कच्छ तथा मालवे में बच रहे !

जानिए वानर जाति के बारे में !

वानरों की कई प्रजातियं प्राचीनकाल में भारत में रहती थी ! हनुमानजी का जन्म कपि नामक वानर वन नर जाति में हुआ था ! शोधकर्ता कहते हैं कि आज से 9 लाख वर्ष पूर्व एक ऐसी विलक्षण वानर जाति भारतवर्ष में विद्यमान थी, जो आज से 15 से 12 हजार वर्ष पूर्व लुप्त होने लगी थी और अंतत: लुप्त हो गई ! इस जाति का नाम ‘कपि’ था !

कुछ लोग रामायणादि ग्रंथों में लिखे हनुमानजी और उनके सजातीय बांधव सुग्रीव अंगदादि के नाम के साथ ‘वानर, कपि, शाखामृग, प्लवंगम’ आदि विशेषण पढ़कर उनके बंदर प्रजाति का होने का उदाहरण देते हैं ! वे यह भी कहते हैं कि उनकी पुच्छ, लांगूल, बाल्धी और लाम से लंकादहन का प्रत्यक्ष चमत्कार इसका प्रमाण है ! यह ‍भी कि उनकी सभी जगह सपुच्छ प्रतिमाएं देखकर उनके पशु या बंदर जैसा होना सिद्ध होता है ! रामायण में वाल्मीकिजी ने जहां उन्हें विशिष्ट पंडित, राजनीति में धुरंधर और वीर-शिरोमणि प्रकट किया है !

वानर को बंदरों की श्रेणी में नहीं रखा जाता था ! ‘वानर’ का अर्थ होता था- वन में रहने वाला नर ! जीवविज्ञान शास्त्रियों के अनुसार ‘कपि’ मानवनुमा एक ऐसी मुख्‍य जाति है जिसके अंतर्गत छोटे आकार के गिबन, सियामंग आदि आते हैं और बड़े आकार में चिम्पांजी, गोरिल्ला और ओरंगउटान आदि वानर आते हैं ! इस कपि को साइंस में होमिनोइडेया कहा जाता है !

भारत के दंडकारण्य क्षेत्र में वानरों और असुरों का राज था ! हालांकि दक्षिण में मलय पर्वत और ऋष्यमूक पर्वत के आसपास भी वानरों का राज था ! इसके अलावा जावा, सुमात्रा, इंडोनेशिया, मलेशिया, माली, थाईलैंड जैसे द्वीपों के कुछ हिस्सों पर भी वानर जाति का राज था !

ऋष्यमूक पर्वत वाल्मीकि रामायण में वर्णित वानरों की राजधानी किष्किंधा के निकट स्थित था ! इसी पर्वत पर श्रीराम की हनुमान से भेंट हुई थी ! बाद में हनुमान ने राम और सुग्रीव की भेंट करवाई, जो एक अटूट मित्रता बन गई ! जब महाबली बाली अपने भाई सुग्रीव को मारकर किष्किंधा से भागा तो वह ऋष्यमूक पर्वत पर ही आकर छिपकर रहने लगा था !

ऋष्यमूक पर्वत तथा किष्किंधा नगर कर्नाटक के हम्पी, जिला बेल्लारी में स्थित है ! विरुपाक्ष मंदिर के पास से ऋष्यमूक पर्वत तक के लिए मार्ग जाता है ! यहां तुंगभद्रा नदी (पम्पा) धनुष के आकार में बहती है ! तुंगभद्रा नदी में पौराणिक चक्रतीर्थ माना गया है ! पास ही पहाड़ी के नीचे श्रीराम मंदिर है ! पास की पहाड़ी को ‘मतंग पर्वत’ माना जाता है ! इसी पर्वत पर मतंग ऋषि का आश्रम था !

रीछ जाति का रहस्य जानिए!!

रीछ मानव : रामायणकाल में रीछनुमा मानव भी होते थे ! जाम्बवंतजी इसका उदाहरण हैं ! जाम्बवंत भी देवकुल से थे ! भालू या रीछ उरसीडे परिवार का एक स्तनधारी जानवर है ! हालांकि इसकी अब सिर्फ 8 जातियां ही शेष बची हैं ! संस्कृत में भालू को ‘ऋक्ष’ कहते हैं जिससे ‘रीछ’ शब्द उत्पन्न हुआ है ! निश्चित ही अब जाम्बवंत की जाति लुप्त हो गई है ! हालांकि यह शोध का विषय है !

जाम्बवंत को आज रीछ की संज्ञा दी जाती है, लेकिन वे एक राजा होने के साथ-साथ इंजीनियर भी थे ! समुद्र के तटों पर वे एक मचान को निर्मित करने की तकनीक जानते थे, जहां यंत्र लगाकर समुद्री मार्गों और पदार्थों का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता था ! मान्यता है कि उन्होंने एक ऐसे यंत्र का निर्माण किया था, जो सभी तरह के विषैले परमाणुओं को निगल जाता था ! रावण ने इस सभी रीछों के राज्य को अपने अधीन कर लिया था ! जाम्बवंत ने युद्ध में राम की सहायता की थी और उन्होंने ही हनुमानजी को उनकी शक्ति का स्मरण कराया था !

जब युद्ध में राम-लक्ष्मण मेघनाद के ब्रह्मास्त्र से घायल हो गए थे, तब किसी को भी उस संकट से बाहर निकलने का उपाय नहीं सूझ रहा था ! तब विभीषण और हनुमान जाम्बवंतजी के पास गए, तब उन्होंने हनुमानजी से हिमालय जाकर ऋषभ और कैलाश नामक पर्वत से ‘संजीवनी’ नामक औषधि लाने को कहा था !

माना जाता है कि रीछ या भालू इन्हीं के वंशज हैं ! जाम्बवंत की उम्र बहुत लंबी थी ! 5,000 वर्ष बाद उन्होंने श्रीकृष्ण के साथ एक गुफा में स्मयंतक मणि के लिए युद्ध किया था ! भारत में जम्मू-कश्मीर में जाम्बवंत गुफा मंदिर है ! जाम्बवंत की बेटी के साथ कृष्ण ने विवाह किया था !

अब सवाल उठता है कि क्या इंसानों के समान कोई पशु हो सकता है? जैसे रीछ प्रजाति ! रामायण में जाम्बवंत को एक रीछ मानव की तरह दर्शाया गया है ! वैज्ञानिकों के अनुसार यह अर्सिडी कुल का मांसाहारी, स्तनी, झबरे बालों वाला बड़ा जानवर है ! यह लगभग पूरी दुनिया में कई प्रजातियों में पाया जाता है ! मुख्‍यतया इसकी 5 प्रजातियां हैं- काला, श्वेत, ध्रुवीय, भूरा और स्लोथ भालू !

अमेरिका और रशिया में आज भी भालू मानव के किस्से प्रचलित हैं ! वैज्ञानिक मानते हैं कि कभी इस तरह की प्रजाति जरूर अस्तित्व में रही होगी ! कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि भूरे रंग का एक विशेष प्रकार का भालू है जिसे नेपाल में ‘येति’ कहते हैं ! एक ब्रिटिश वैज्ञानिक शोध में पता चला है कि हिमालय के मिथकीय हिम मानव ‘येति’ भूरे भालुओं की ही एक उपप्रजाति हो सकती है ! ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ब्रायन स्काइज द्वारा किए गए बालों के डीएनए परीक्षणों से पता चला है कि ये ध्रुवीय भालुओं से काफी कुछ मिलते-जुलते हैं ! उच्च हिमालयी क्षेत्रों में भूरे भालुओं की उपप्रजातियां हो सकती हैं !

संस्कृत में भालू को ‘ऋक्ष’ कहते हैं ! अग्निपुत्र जाम्बवंत को ऋक्षपति कहा जाता है ! यह ऋक्ष बिगड़कर रीछ हो गया जिसका अर्थ होता है भालू अर्थात भालू के राजा ! लेकिन क्या वे सचमुच भालू मानव थे? रामायण आदि ग्रंथों में तो उनका चित्रण ऐसा ही किया गया है ! ऋक्ष शब्द संस्कृत के अंतरिक्ष शब्द से निकला है ! जामवंतजी को अजर अमर होने का वरदान प्राप्त है !

प्राचीनकाल में इंद्र पुत्र, सूर्य पुत्र, चंद्र पुत्र, पवन पुत्र, वरुण पुत्र, ‍अग्नि पुत्र आदि देवताओं के पुत्रों का अधिक वर्णन मिलता है ! उक्त देवताओं को स्वर्ग का निवासी कहा गया है ! एक ओर जहां हनुमानजी और भीम को पवन पुत्र माना गया है, वहीं जाम्बवंतजी को अग्नि पुत्र कहा गया है ! जाम्बवंत की माता एक गंधर्व कन्या थी ! जब पिता देव और माता गंधर्व थीं, तो वे कैसे रीछ मानव हो सकते हैं ? इस संबंध में अधिक शोध किए जाने की आवश्यकता है !

अपने बारे में कुण्डली परामर्श हेतु संपर्क करें !

योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

 -: सम्पर्क :-
-090 444 14408
-094 530 92553

comments

Check Also

जानिये क्या है ज्योतिष में पौधों का महत्व | Yogesh Mishra

ज्योतिषीय दृष्टिकोण में हरे पौधों का प्रतिनिधित्व “बुध” ग्रह करता है, बुध को हरे पौधों …