सुकून की कीमत

सुकून हमेशा ही सस्ता होता है, लेकिन हमारे दिखावे की आदत उसे महंगा बना देती है ! अर्थात मानसिक शांति को किसी तामझाम की जरूरत नहीं होती है। वह बहुत छोटी और सहज चीजों में मिल जाती है ! जैसे…

सुकून हमेशा ही सस्ता होता है, लेकिन हमारे दिखावे की आदत उसे महंगा बना देती है ! अर्थात मानसिक शांति को किसी तामझाम की जरूरत नहीं होती है। वह बहुत छोटी और सहज चीजों में मिल जाती है ! जैसे…

जीवन में आगे बढ़ने के लिए सही योजना, गहरे अनुभव, उत्साह और स्फूर्ति की जरुरत है ! जो प्राय: हर व्यक्ति में नहीं होता है ! किसी भी बड़े लक्ष्य में ऐसे लोग साथ हो तो लेते हैं, लेकिन उनकी…

शैव दर्शन में शरीर को हेय या तुच्छ नहीं माना गया है, बल्कि इसे शिव की एक पवित्र अभिव्यक्ति और ईश्वरीय वरदान माना गया है। शरीर अपने आप में अंतिम साध्य नहीं है, बल्कि सर्वोच्च लक्ष्य अर्थात् मोक्ष तक पहुँचने…

शैव जीवन दर्शन का पूर्ण स्वरूप :– पहला कदम :– दिखावा छोड़कर अपने सहज समर्थ को स्वीकारिये ! आपको सुकून मिलेगा। दूसरा कदम :– दूसरों को अपनी स्वतंत्रता से जीने दीजिये ! किसी को अपने तरीके से चलाने की जिद्द…

शैव ग्राम एक ऐसा जीवंत और ऊर्जावान केंद्र बन सकता है जहाँ शिक्षा बोझ न होकर आत्म-विकास का माध्यम हो। इस संस्थागत परियोजना का उद्देश्य बच्चों को एक सुरक्षित, प्राकृतिक और समग्र विकास वाला वातावरण प्रदान करना है। आधुनिक ज्ञान…

आज मानवता कंक्रीट की दीवारों और कृत्रिम जीवन की घुटन में सिसक रही है। तनाव, अवसाद और बाज़ारवाद की अंधी दौड़ ने मनुष्य को मानसिक और शारीरिक रूप से खोखला कर दिया है। प्रकृति लहूलुहान है, बेज़ुबान जीव उजड़ रहे…

एक वैचारिक क्रांति और सनातन चेतना का पुनर्जागरण केंद्र शैव ग्राम केवल ईंट-पत्थरों से निर्मित कोई पारंपरिक आश्रम या भौगोलिक स्थान नहीं है, बल्कि यह एक युगांतरकारी वैचारिक क्रांति का जीवंत केंद्र है। जहाँ एक ओर आधुनिकता की अंधी दौड़…

शैव जीवन दर्शन मानता है कि “हर रोग अवचेतन का प्रगट स्वरूप है” ! अर्थात हमारे मन और शरीर के मध्य एक गहरा और अविभाज्य संबंध है। अब आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी इस अवधारणा को ‘मनोदैहिक रोग’ के रूप में…

वर्तमान शिक्षा प्रणाली और कोचिंग का बढ़ता व्यवसायीकरण बच्चों को एक अंधी दौड़ में धकेल रहा है, जहां सफलता का पैमाना सिर्फ अच्छे अंक रह गए हैं। इस दमघोंटू और तनावपूर्ण माहौल में “शैव ग्राम” की संकल्पना निश्चित रूप से…

आज कल बहुत से ध्यान गुरु मौन को बहुत अधिक महत्व देते हैं लेकिन मेरा यह मानना है कि जब तक वैचारिक कुंठायें समाप्त न हो तब तक मौन व्यर्थ का विषय है । जब मन के भीतर वैचारिक कुंठाएं,…