भगवानवाद से बड़ा धोखा कोई नहीं है

भगवान और अवतारवाद की अवधारणा ने भारतीय समाज को विकलांग कर दिया ! विकृत आस्था से भविष्य का भटकाव और अकर्मण्यता की उत्पत्ति हुई है ! प्रत्येक देश की आत्मा उस देश के दर्शन में बसती है, लेकिन क्या हमारा…

भगवान और अवतारवाद की अवधारणा ने भारतीय समाज को विकलांग कर दिया ! विकृत आस्था से भविष्य का भटकाव और अकर्मण्यता की उत्पत्ति हुई है ! प्रत्येक देश की आत्मा उस देश के दर्शन में बसती है, लेकिन क्या हमारा…

भारतीय दर्शन का एक मूलभूत और शाश्वत सिद्धांत है, “शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्”। अर्थात्, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन जीवन के सभी सर्वोच्च लक्ष्यों की प्राप्ति का प्रथम साधन यह मानव शरीर ही है। इसलिए, इस शरीर की रक्षा और…

भारतीय दर्शन में भी महर्षि कालिदास ने कहा है कि “शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्”, अर्थात शरीर ही सभी कर्तव्यों और धर्मों को पूरा करने का प्रथम साधन है। बिना स्वस्थ शरीर के न तो संसार का आनंद लिया जा सकता है,…

भगवान कबीले से साम्राज्य तक मानव सभ्यता के क्रमिक विकास में ‘ईश्वर’ या ‘देवता’ की अवधारणा कभी स्थिर नहीं रही। धर्म का वह स्वरूप जिसे आज हम देखते हैं, वह एक लंबी और बेहद रोचक ऐतिहासिक यात्रा का परिणाम है।…

मानव का ईश्वर या परमात्मा से संबंध हमेशा से ही आस्था और विश्वास की नींव पर टिका रहा है। लेकिन आधुनिक दौर में यह संबंध ज्ञान, आत्म-शुद्धि या ‘मुक्ति’ की बजाय काफी हद तक ‘आध्यात्मिक उपभोक्तावाद’ में बदल गया है।…

जब आप किसी भूखे व्यक्ति को भोजन कराते हैं, तो वह कृत्य प्रायः करुणा और अंतरात्मा की पुकार से उत्पन्न होता है। वहाँ कोई योजना, दिखावा या भविष्य की आकांक्षा नहीं होती। यह ‘निष्काम कर्म’ के निकट है, जो आत्मा…

प्रकृति की अपनी एक स्वचालित और संतुलित व्यवस्था है, जहाँ प्रत्येक कार्य का एक निश्चित कारण और परिणाम होता है। जब कोई व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के प्रदर्शन के लिए भंडारे का आयोजन करता है, तो वह अनजाने में प्रकृति के…

आध्यात्मिक पवित्रता, मोक्ष या उच्च चेतना के नाम पर शिष्यों के गुप्तांग काटने या नपुंसक बनाने की परंपरा विश्वव्यापी है ! 18वीं से 20वीं शताब्दी के मध्य रूसी चरमपंथी संप्रदाय में समय-समय पर हजारों अनुयायियों ने इस प्रथा को अपनाया…

आज हम जिस पारंपरिक शिक्षा प्रणाली को बच्चों के सुरक्षित भविष्य की गारंटी मानते हैं, वह अगले कुछ ही वर्षों में अप्रासंगिक हो जाएगी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल क्रांति के इस दौर में, स्कूलों और कॉलेजों की महंगी फीस पर…

शैवों के लिये तर्पण कर्म व्यर्थ है ! वैष्णव संचय से शैव वैराग्य की दार्शनिक यात्रा भारतीय सनातन दर्शन में जीवन को समग्रता से समझने के लिए दो समानांतर धाराएं प्रवाहित होती हैं, प्रवृत्ति (संसार से जुड़ना) और निवृत्ति (संसार…