गाय की उत्पत्ति गोपाष्ठामी पर विशेष लेख अवश्य पढ़ें !

ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार सतयुग में गाय की उत्पत्ति भगवान ब्रह्मा के मुख से हुई है ! गाय के गुणों से प्रभावित होकर भगवान ब्रह्मा ने इसे देवताओं को भेंट कर दिया !
किंतु उस काल में निरंतर देवासुर संग्राम होने के कारण देवताओं ने यह महसूस किया कि गोवंश उनके पास सुरक्षित नहीं है ! अत: ऐसी स्थिति में गुणों की खदान गोवंश कहीं असुरों के हाथ न पड़ जाये, इस भय से देवताओं ने गौ माता को समुद्र की बेटी लक्ष्मी के पास सागर की गहराइयों में ले जाकर छिपा दिया !

कालांतर में हुये समुद्र मंथन के दौरान माता लक्ष्मी के साथ-साथ कामधेनु गोवंश भी समुद्र की गहराइयों से प्राप्त हुआ ! कामधेनु हिन्दू धर्म में एक देवी है जिनका स्वरूप गाय का है ! इन्हें ‘सुरभि’ भी कहते हैं ! कामधेनु जिसके पास होती हैं वह जो कुछ कामना करता है (माँगता है) उसे वह मिल जाता है ! (काम = इच्छा , धेनु=गाय) ! राजस्थान की कामधेनु राठी गाय को कहते हैं !

जिसका देव वैध धन्वन्तरी द्वारा पंचगव्य निर्मित अमृत का प्रयोग करके देवता निरंतर शक्तिशाली होने लगे !

त्रेता में इसी गोवंश को देवताओं ने वशिष्ठ मुनि को सेवा हेतु उनके आश्रम में दान कर दिया ! उसी समय कन्नौज के राजा विश्वामित्र जिनका की मूल नाम विश्वरथ था ! वह अचानक एक दिन जंगल में भटकते हुए अपनी सेना के साथ वशिष्ठ ऋषि के आश्रम पहुंचे ! वशिष्ठ ऋषि ने विश्वामित्र और उनकी सेना का बहुत ही आनंदमय स्वागत किया ! जिससे विश्वामित्र अत्यंत प्रभावित हुये !

लेकिन उन्हें यह सुखद आश्चर्य हुआ कि जंगल में एक सुनसान कुटिया में रहने वाले वशिष्ठ ऋषि के पास यह संसाधन कहां से आया कि वह मुझे और मेरी सेना का इतना दिव्य स्वागत कर सके ! रहस्य जानने की उत्सुकता से उन्होंने वशिष्ठ ऋषि से अपनी जिज्ञासा बतलाई ! तब वशिष्ठ ऋषि ने अपनी गौशाला में ले जाकर गौ माता कामधेनु का दर्शन कराया और उसके गुणों की चर्चा की !

जिससे प्रभावित होकर विश्वामित्र ने वशिष्ठ से उस गोवंश की मांग की किंतु कामधेनु देवताओं की धरोहर है बतला कर वशिष्ठ ने विश्वामित्र को कामधेनु देने से इंकार कर दिया ! जिससे विश्वामित्र का अहंकार जागा और उन्होंने अपनी सेना को आदेशित किया कि वह वशिष्ठ से इस गोवंश को छीन लिया लें !

भयंकर युद्ध हुआ जिसमें वशिष्ठ के 1000 पुत्र इस युद्ध में मारे गये ! तब देवताओं से प्राप्त कामधेनु गोवंश ने वशिष्ठ की आज्ञा लेकर के बाद अपनी गौ सेना को प्रगट किया और विश्वामित्र पर आक्रमण कर दिया ! विश्वामित्र को युद्ध में परास्त हुये !

जिससे हताश और निराश विश्वामित्र ने समस्त राजपाट त्याग कर स्वयं देव आराधना कर वशिष्ठ के समान देव संपदा से संपन्न होने का निर्णय लिया और उन्होंने ऋषि से राज ऋषि का पद प्राप्त किया ! तदुपरांत देव ऋषि और फिर महर्षि का पद प्राप्त किया !

गायत्री मंत्र की उत्पत्ति का श्रेय विश्वामित्र को ही जाता है और विश्वामित्र ने गायत्री मंत्र के तपोबल से वशिष्ठ के समानांतर अपने अंदर आध्यात्मिक ऊर्जा जागृत की ! कालांतर में इन्हीं विश्वामित्र ने गोवंश रक्षक रघुकुल के राजकुमार रूप में भगवान श्रीराम को युद्ध कौशल का प्रशिक्षण दिया और रावण जैसे आतताई से इस पृथ्वी को मुक्त करवाया ! यह गोवंश की शक्ति का ऐतिहासिक पौराणिक प्रमाण है ! द्वापर में भगवान श्री कृष्ण ने इसी दिन से गौ सेवा आरम्भ की थी !

भविष्‍य पुराण में बताया गया है कि कलयुग में जो गोभक्‍त मनुष्‍य जिस भी वस्‍तु की इच्‍छा करता है, उसकी मनोकामना गौ सेवा से पूरी होती है ! महिलाओं द्वारा गोवंश की पूजा करने से पति को दीर्घायु की प्राप्ति होती है ! संतान की कामना करने वाले दंपत्ति के लिए भी गोमाता की सेवा से संतान प्राप्त होती है ! धन चाहने वाले को धन और धर्म की चाह रखने वाले को धर्म की प्राप्ति होती है !

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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