जानिए । रत्नो के धारण करने के पीछे का पूर्ण वैज्ञानिक कार्यप्रणाली Yogesh Mishra

रत्नों की वैज्ञानिक कार्यप्रणाली

आइए अब इस कुंडली की वैज्ञानिक आधार पर व्याख्या करते हैं। कुंडली में दिखाए जाने वाले बारह भाव वास्तव में कुंडली धारक के शरीर में विद्यमान बारह उर्जा केंद्र होते हैं जो भिन्न-भिन्न ग्रहों की उर्जा का पंजीकरण, भंडारण तथा प्रसारण करते हैं। किसी व्यक्ति के जन्म के समय इनमें से कुछ उर्जा केंद्र उस समय की ग्रहों तथा नक्षत्रों की स्थिति के अनुसार सकारात्मक अथवा शुभ फलदायी उर्जा का पंजीकरण करते हैं, कुछ भाव नकारात्मक अथवा अशुभ फलदायी उर्जा का पंजीकरण करते हैं, कुछ भाव सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनों प्रकार की उर्जा का पंजीकरण करते हैं तथा कुछ भाव किसी भी प्रकार की उर्जा का पंजीकरण नहीं करते।

अंतिम प्रकार के भावों को कुंडली में खाली दिखाया जाता है तथा इनमें कोइ भी ग्रह स्थित नहीं होता। इस प्रकार प्रत्येक ग्रह अपनी किसी राशि विशेष में स्थिति, किसी भाव विशेष में स्थिति तथा कुछ अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों के आधार पर विभिन्न उर्जा केंद्रों अथवा भावों में अपने बल तथा स्वभाव का पंजीकरण करवाते हैं। किसी व्यक्ति के जन्म के समय प्रत्येक ग्रह का उसके शरीर के ईन उर्जा केंद्रों में अपने बल तथा स्वभाव का यह पंजीकरण ही उस व्यक्ति के लिए जीवन भर इन ग्रहों के बल तथा स्वभाव को निर्धारित करता है।

लगभग प्रत्येक कुंडली में ही एक या एक से अधिक ग्रह सकारात्मक स्वभाव के होने के बावजूद भी कुंडली के किसी भाव विशेष मे अपनी उपस्थिति के कारण, कुंडली में किसी राशि विशेष में अपनी उपस्थिति के कारण अथवा एक या एक से अधिक नकारात्मक ग्रहों के बुरे प्रभाव के कारण बलहीन हो जाते हैं तथा कुंडली धारक को पूर्ण रूप से अपनी सकारात्मकता का लाभ देने में सक्षम नही रह जाते। यही वह परिस्थिति है जहां पर ऐसे ग्रहों के रत्नों का प्रयोग इन ग्रहों को अतिरिक्त बल प्रदान करने का उत्तम उपाय है।

नवग्रहों के रत्नों में से प्रत्येक रत्न अपने से संबंधित ग्रह की उर्जा को सोखने और फिर उसे धारक के शरीर के किसी विशेष उर्जा केंद्र में स्थानांतरित करने का कार्य वैज्ञानिक रूप से करता है। इस प्रकार जिस भी ग्रह विशेष का रत्न कोई व्यक्ति धारण करेगा, उसी ग्रह विशेष की अतिरिक्त उर्जा उस रत्न के माध्यम से उस व्यक्ति के शरीर में स्थानांतरित होनी शुरू हो जाएगी तथा वह ग्रह विशेष उस व्यक्ति को प्रदान करने वाले अच्छे या बुरे फलों में वृद्धि कर देगा।

उदाहरण के तौर पर यदि कोई ऐसा व्यक्ति सूर्य का रत्न माणिक्य धारण करता है जिसकी जन्म कुंडली में सूर्य स्वभाव से शुभ होने पर भी किन्हीं विशेष कारणों के चलते बलहीन हैं, तो इस व्यक्ति द्वारा पहना गया माणिक्य सूर्य से उर्जा सोख कर इस उर्जा को उसके शरीर के किसी विशेष उर्जा केंद्र में स्थानांतरित करना शुरू कर देगा। जैसे जैसे सूर्य की उर्जा इस व्यक्ति के शरीर में बढ़ती जाएगी, वैसे वैसे सूर्य बलवान होकर इस व्यक्ति को प्रदान करने वाले शुभ फलों में वृद्दि कर देंगे। इसी प्रकार से बाकी सब ग्रहों के रत्न भी अपने अपने ग्रह विशेष से उर्जा सोख कर धारक के शरीर में स्थानांतरित करते हैं।

इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति अपनी जन्म कुंडली में स्थित शुभ ग्रहों के रत्न धारण करके लाभ प्राप्त कर सकता है। किन्तु यहां पर इस बात का ध्यान रखना अति आवश्यक है कि किसी भी ग्रह का रत्न केवल वैज्ञानिक तकनीक से आपके शरीर में उस ग्रह की उर्जा ही बढ़ा सकता है जिससे उस ग्रह विशेष के बल मे वृद्धि हो जाती है, लेकिन किसी भी ग्रह का रत्न आपकी कुंडली तथा जीवन में उस ग्रह का स्वभाव नहीं बदल सकता। इसलिए रत्न सदा अपने लिए शुभ फलदायी ग्रहों के ही धारण करने चाहिएं, क्योंकि अशुभ फलदायी ग्रह का रत्न धारण करने से उस ग्रह को अतिरिक्त उर्जा तथा बल प्राप्त हो जाएगा तथा वह आपको और भी अधिक नुकसान पहुंचाने में सक्षम हो जाएगा।

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नोट ( ज्योतिष के माध्यम से जुटाया गया धन सनातन ज्ञान पीठ संस्था के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए खर्च किया जाता है ! जिसमे गौ रक्षा भी शामिल है )

 

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