जानिए क्यों ? भगवान श्रीकृष्ण ही कलयुग में कामधेनु हैं । और उनके मंत्रो की उपयोगिता !

भगवान श्रीकृष्ण ही कलयुग में कामधेनु हैं !
मित्रो आज कल युग का प्रभाव इतना हो चुका है की अब न व्यक्ति में माँ गायत्री की शुद्ध साधना करने का समर्थ बचा है और न ही भगवान शिव की अटूट (सैंकड़ों वर्ष )तपस्या करने का पुरुषार्थ ऐसी स्थिती में भगवान श्रीकृष्ण ही कलयुग में कामधेनु हैं

श्रीकृष्ण हिन्दू धर्म में विष्णु के अवतार हैं और सनातन धर्म के अनुसार भगवान विष्णु सर्वपापहारी पवित्र और समस्त मनुष्यों को भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाले प्रमुख देवता हैं। आर्य जीवन का सर्वांगीण विकास हम श्रीकृष्ण में पाते हैं। राजनीति और धर्म, आध्यात्म और समाज विज्ञान सभी क्षेत्रों में श्रीकृष्ण को हम एक विशेषज्ञ के रूप में देखते हैं।
श्रीमद भगवद गीता में स्वयं श्री कृष्ण द्वारा दिया गया परिचय
मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबकी आत्मा हूँ तथा संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य तथा अंत भी मैं ही हूँ , मैं ही सब प्राणियों के ह्रदय में अंतर्यामी रूप से स्थित हूँ तथा मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और विचार के द्वारा बुद्धि में रहने वाले संशय होते हैं और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ तथा वेद ,वेदों का अंत कर्ता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ
मेरा भक्त मुझको सब यज्ञ और तपों को भोगने वाला, संपूर्ण लोकों के ईश्वरों का भी ईश्वर तथा संपूर्ण भूत प्राणियों का सुह्र्द अर्थात स्वार्थ रहित दयालु और प्रेमी ऐसा मुझे तत्व से जानकर शांति को प्राप्त होता है , मैं इस संपूर्ण जगत को अपनी योग शक्ति के एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ |
जो मनुष्य मेरे इन आदेशों का ईर्ष्या-रहित होकर, श्रद्धा-पूर्वक अपना कर्तव्य समझ कर नियमित रूप से पालन करते हैं, वे इस लोक में सभी सुखों को भोग कर मोक्ष को प्राप्त करते हैं

भगवान श्रीकृष्ण के परिधान
॥ कृष्णःकर्षति आकर्षति सर्वान जीवान्‌ इति कृष्णः॥

॥ ओम्‌ वेदाः वेतं पुरुषः महंतां देवानुजं प्रतिरंत जीव से॥

भगवान श्रीकृष्ण का पूजन त्रिकाल संध्या करना चाहिए। भगवान राधा-कृष्ण को सोमवार- सफेद वस्त्र, मंगलवार को लाल, बुधवार को हरा, गुरुवार को पीला, शुक्रवार को सफेद, शनिवार को नीला एवं रविवार को लाल वस्त्र से भगवान का श्रृंगार किया जाना चाहिए।

सांसारिक सुख प्राप्ति के मंत्र
कलह-क्लेश निवारण हेतु मंत्र

कृष्णाष्टमी का व्रत करने वालों के सब क्लेश दूर हो जाते हैं। दुख-दरिद्रता से उद्धार होता है। जिन परिवारों में कलह-क्लेश के कारण अशांति का वातावरण हो, वहां घर के लोग जन्माष्टमी का व्रत करने के साथ इस मंत्र का विधान से जप करें :

कृष्णायवासुदेवायहरयेपरमात्मने। प्रणतक्लेशनाशायगोविन्दायनमोनम:॥

इस मंत्र का नित्य जप करते हुए श्रीकृष्ण की आराधना करें। इससे परिवार में खुशियां वापस लौट आएंगी।

श्रीकृष्‍ण का तुरंत असरकारी धन प्राप्ति सप्तदशाक्षर महामंत्र करोड़पति बनाता है मंत्र :
‘ऊं श्रीं नमः श्रीकृष्णाय परिपूर्णतमाय स्वाहा’
जो व्यक्ति विधान से इस को मंत्र सिद्ध कर लेता है उसे करोड़पति होने से कोई नहीं रोक सकता।

प्रेम विवाह के इच्छुक लड़के विधान से पढ़ें यह मंत्र
क्लीं कृष्णाय गोविंदाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा।’

जिन कन्याओं का विवाह नहीं हो रहा हो या विवाह में विलंब हो रहा हो,
उन कन्याओं को विधान से यह मंत्र पढना चाहिए
कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरू ते नम:।।

जिन व्यक्तियों के कोई गुरु न हो या किसी पारंपरिक वैदिक संप्रदाय में दीक्षित न हो, उन्हें गुरुभक्ति प्राप्त करने के लिए जन्माष्टमी के शुभ समय में इस मंत्र का जप करना चाहिए-
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरूम्।।

जिन परिवारों में संतान सुख न हो कुंडली में ग्रह संतान प्राप्ति में बाधक हों तब पति-पत्नी दोनों को विधान से निम्न मंत्र का जप करना चाहिए-
देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत:।।

मोक्ष प्राप्ति हेतु इस मंत्र का विधान से जप करें-
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच।।

श्रीकृष्‍ण के वाक सिद्ध हेतु मंत्र

‘ऐं क्लीं कृष्णाय ह्रीं गोविंदाय श्रीं गोपीजनवल्लभाय स्वाहा ह्र्सो।’
जो भी साधक इस मंत्र का विधान से जाप करता है उसे वाक सिद्ध प्राप्ति होती है
हर समस्या का करे अंत, श्रीकृष्ण के विशेष मंत्र
जीवन में आने वाली विपरीत परिस्थितियों में विजय प्राप्त करने के लिए जो श्रीकृष्‍ण के मंत्र का विधान से जाप करता है उसकी हर बाधा दूर हो जाती है

‘ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीकृष्णाय गोविंदाय गोपीजन वल्लभाय श्रीं श्रीं श्री’

इसी तरह और भी अनेक मंत्र हैं जिनसे निश्चित रूप से अभीष्ट की प्राप्ति होती है ।जैसाकि अध्याय नंबर 9 श्लोक 22 में परमात्मा ने स्वयं कहा है :- ” जो मनुष्य अनन्य भाव से मेरा ही चिंतन स्मरण करता है और निष्काम भाव से मेरी उपासना करता है, ऐसे मनुष्यों का योग-क्षेम माने जीवन निर्वाह और रक्षण की जिम्मेदारी मैं स्वयं उठाता हूं ।”
इसके अलावा अध्याय नंबर 18 में, श्लोक 66 में भगवान श्रीकृष्ण ने अद्भभूत वचन दिया है । उन्हेंने कहा है कि – ” तू सर्व धर्मों का त्याग करके सिर्फ मेरी शरण में आ जा । मैं तुझे सभी पापों से बचाउंगा । तू शोक मत कर ।” परमात्मा ने ईतना बडा आश्वासन दिया फिर भी हम उनक शरण में नहीं जाते क्योंकि हम अपने जीवन में उलझे रहेते हैं और उलझे ही रहेना चाहते हैं ।

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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