बहुत ही महत्वपूर्ण सूचना,दीपावली के दिन अयोध्या नहीं लौटे थे भगवान राम । जरूर पढ़ें । share करें ।

मित्रो यदि आप में थोड़ा सा भी धैर्य हो और सत्य को जानने की वास्तव मे जिज्ञासा हो तभी आप इस लेख को पढ़ें अन्यथा नहीं । क्योंकि ऐसी बाते अगर विस्तार से ही बात जाएँ तो ही उचित होता है ।

अब ध्यान से पढ़ें ।


वाल्मीकि रामायण, रामचरित मानस, कबंध रामायण व अन्य इतर मुद्रित रामायणों के अतिरिक्त भी हमारे पुराणों में श्रीराम की गाथा का वर्णन किया गया है।
शास्त्रों के अनुसार मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष की अष्टमी को उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र और विजय नामक मुहूर्त में दोपहर के समय श्री रघुनाथजी का लंका के लिए प्रस्थान हुआ।

उन्होंने प्रतिज्ञा की कि “मैं समुद्र को लाँघकर राक्षसराज रावण का वध करूँगा”, इसी दिन वे रावण के वध हेतु दक्षिण दिशा की ओर चले थे । सुग्रीव उनके सहायक थे । सात दिनों के बाद समुद्र के तट पर पहुँचकर उन्होंने सेना को ठहराया।

पौष शुक्ल प्रतिपदा से तृतीया तक श्रीराम सेना सहित समुद्र तट पर टिके रहे । चतुर्थी को विभीषण आकर उनसे मिले । फिर पंचमी को समुद्र पार करने के विषय में विचार हुआ । इसके बाद चार दिनों तक राजा समुद्र से वार्ता होने के बाद समुद्र ने उन्हें पार जाने का उपाय बतला दिया। तदंतर दशमी को सेतु बाँधने का कार्य आरंभ होकर त्रयोदशी को समाप्त हुआ। चतुर्दशी को श्रीराम ने सुवेल पर्वत पर अपनी सेना को ठहराया । पूर्णिमा से द्वितीया तक तीन दिनों में सारी सेना समुद्र के पार हुई । यह गणना शुक्लपक्ष से महीने का आरंभ मानकर की गई है।

समुद्र पार करके लक्ष्मण सहित श्रीराम ने सुग्रीव की सेना साथ लेकर तृतीया से दशमी तक आठ दिनों तक लंकापुरी को चारों ओर से घेरे रखा । शास्त्रों के अनुसार एकादशी के दिन शुक और सारण रावण दूत सेना में घुस आए थे । पौष कृष्णा द्वादशी को शार्दूल के द्वारा वानर सेना की गणना हुई । जो आठ पद्म थी, साथ ही उसने प्रधान-प्रधान वानरों की शक्ति का भी वर्णन किया गया ।

शत्रुसेना की संख्या जानकर रावण ने त्रयोदशी से अमावस्या तीन दिनों तक लंकापुरी में अपने सैनिकों को युद्ध के लिए उत्साहित किया । माघ, शुक्ल प्रतिपदा को अंगद दूत बनकर रावण के दरबार में गए । उधर रावण ने माया के द्वारा सीता को उनके पति के कटे हुए मस्तक आदि का दर्शन कराया । माघ की द्वितीया से लेकर अष्टमी पर्यंत सात दिनों तक राक्षसों और वानरों में घमासान युद्ध होता रहा।

माघ शुक्ल नवमी को रात्रि के समय इन्द्रजीत ने युद्ध में श्रीराम और लक्ष्मण को नागपाश से बाँध लिया । इससे प्रधान-प्रधान वानर व्याकुल और उत्साहहीन हो गए, तो दशमी को नागपाश का नाश करने के लिए वायुदेव ने श्रीरामचंद्रजी के कान में गरुड़ के मंत्र का जप और उनके स्वरूप का ध्यान बता दिया । ऐसा करने से एकादशी को गरुड़जी का आगमन हुआ ।श्री राम नागपाश से स्वतंत्र हुये फिर द्वादशी को श्रीराम के हाथों धूम्राक्ष का वध हुआ । त्रयोदशी को भी श्री राम के द्वारा कम्पन नाम का राक्षस युद्ध में मारा गया । माघ शुक्ल चतुर्दशी से कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तक तीन दिन में नील के द्वारा प्रहस्त का वध हुआ ।

माघ कृष्ण द्वितीया से चतुर्थी तीन दिनों तक तुमुल युद्ध करके श्रीराम ने रावण को रणभूमि से भगा दिया । पंचमी से अष्टमी तक चार दिनों में रावण ने कुंभकर्ण को जगाया और जागने पर उसने आहार ग्रहण किया । फिर नवमी से चतुर्दशी पर्यंत छः दिनों तक युद्ध करके श्रीराम ने कुंभकर्ण का वध किया । अमावस्या के दिन कुंभकर्ण की मृत्यु के शोक से रावण ने युद्ध को बंद रखा । उसने अपनी सेना पीछे हटा ली ।

फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा से चतुर्थी तक चार दिनों के भीतर विषतंतु आदि पाँच राक्षस मारे गए । पंचमी से सप्तमी तक के युद्ध में अतिकाय का वध हुआ । अष्टमी से द्वादशी, इन पाँच दिनों में निकुंभ और कुंभ मौत के घाट उतारे गए । उसके बाद तीन दिनों में मकराक्ष का वध हुआ । फाल्गुन कृष्ण द्वितीया के दिन इन्द्रजीत ने लक्ष्मण पर विजय शक्ति चलाई । फिर हनुमानजी लक्ष्मण की चिकित्सा के लिए द्रोण पर्वत उठा लाए। फिर तृतीया से सप्तमी तक पाँच दिन लक्ष्मण के लिए दवा आदि के प्रबंध हेतु श्रीराम ने युद्ध को बंद रखा ।

तदंतर त्रयोदशीपर्यंत पाँच दिनों तक युद्ध करके लक्ष्मण ने विख्यात बलशाली इंद्रजीत को युद्ध में मार गिराया । चतुर्दशी को रावण ने युद्ध को स्थगित रखा और यज्ञ की दीक्षा ली। फिर अमावस्या के दिन वह युद्ध के लिए प्रस्तुत हुआ। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से लेकर पंचमी तक रावण युद्ध करता रहा । इन पाँच दिनों के भीतर बहुत से राक्षसों का विनाश हुआ । षष्ठी से अष्टमी तक महापार्श्व आदि राक्षस मारे गए । चैत्र शुक्ल नवमी के दिन लक्ष्मणजी को रावण की अमोघ शक्ति लगी तब श्रीराम ने क्रोध में भरकर रावण को मार भगाया । दशमी के दिन श्रीरामचंद्रजी ने भयंकर युद्ध किया जिसमें असंख्य राक्षसों का संहार हुआ।

एकादशी के दिन इन्द्र के भेजे हुए मातलि नामक सारथी श्रीराम के लिए रथ ले आए और उसे युद्धक्षेत्र में श्री रघुनाथजी को अर्पण किया। तदनंतर श्रीरामचंद्रजी चैत्र शुक्ल द्वादशी से कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तक अठारह दिन तक रावण के साथ रोषपूर्वक युद्ध करते रहे । अंततोगत्वा राम ने चैत्र कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को रावण का वध किया । उस तुमुल संग्राम में श्री राम की विजय हुई । माघ शुक्ल द्वितीया से लेकर चैत्र कृष्ण चतुर्दशी तक सतासी (87) दिन होते हैं, इनके भीतर केवल पन्द्रह दिन युद्ध बंद रहा । शेष बहत्तर (72) दिनों तक राम-रावण संग्राम चलता रहा । रावण आदि राक्षसों का दाह संस्कार अमावस्या के दिन हुआ ।

वैशाख शुक्ल प्रतिपदा को श्रीराम युद्ध भूमि मे ही ठहरे रहे । द्वितीया को लंका के राजा के रूप में विभीषण का अभिषेक किया गया। तृतीया को सीता की अग्नि परीक्षा हुई । वैशाख शुक्ल चतुर्थी को पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर आकाश मार्ग से अयोध्यापुरी की ओर चले । वैशाख शुक्ल पंचमी को श्रीराम दल-बल के साथ भारद्वाज मुनि के साथ आए और चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होने पर षष्टि को नन्दीग्राम जाकर भरत से मिले । फिर सप्तमी को बयालीसवे वर्ष की उम्र में श्री रघुनाथजी का राज्याभिषेक हुआ, उस समय सीताजी के उम्र तैंतीस वर्ष की थी।

इस प्रकार राम-रावण युद्ध ७२ दिनों तक चला था | इस प्रकार रावण का वध भगवान श्रीराम ने दशहरा के दिन (अक्टूबर महीने में )नहीं किया था बल्कि चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (वर्तमान में वैसाख कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी अर्थात अप्रेल महीने ) के दिन किया था

अब प्रश्न यह खड़ा होता है कि लोगों को यह भ्रम कैसे हो गया कि विजयदशमी के दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया, इसलिए हम लोग दशहरा मनाते हैं |

इसके लिए थोड़ा मध्यकालीन इतिहास को देखना पड़ेगा अकबर की कूटनीति और औरंगजेब की क्रूरता से भयाक्रांत होकर जब बहुत बड़े संख्या में हिंदू अपना धर्म परिवर्तन कर मुसलमान होने लगे तत्कालीन संत एवं विचारक गोस्वामी तुलसीदास जी ने हिंदुओं को संगठित करने के उद्देश्य से रामचरितमानस का लेखन किया इसके द्वारा उन्होंने संदेश दिया कि जब रावण जैसा सर्व शक्ति संपन्न आताताई राक्षस का वध वनवासी श्री राम द्वारा संभव है तो यदि हम सभी हिंदू संगठित हो जाए तो हम लोग अकबर और औरंगजेब जैसे क्रूर शासकों के अत्याचारों से बच सकते हैं |

हिंदुओं को संगठित करने के उद्देश्य से ही शरद नवरात्रि में रामलीला पाठ का चलन समाज में प्रारंभ गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा किया गया और नवरात्रि के समाप्ति के दिन दशमी तिथि को विजय तिथि घोषित कर उस दिन रावण मेघनाथ और कुंभकरण के पुतले को जला कर रामलीला पाठ का समापन करने की व्यवस्था लागू की गई |

आप ऐसे समझिये अगर हमे पूरी रामायण को 10 दिन के नाटकीय रूप मे दिखाना है तो हमे दसवें दिन रावणवध पर रामायण समाप्त करनी पड़ेगी,
इसी प्रकार तुलसीदास जी द्वारा शरद नवरात्रि में रामलीला पाठ जो हिन्दुओ को संघठित करने के लिए आरंभ हुआ उसे दसवें दिन विजय दशमी के दिन रावण वध पर समाप्त कर दिया गया ।

इस प्रकार दशहरा की तिथि का रावण की मृत्यु से कोई संबंध नहीं है |रावण का वध भगवान श्रीराम ने दशहरा के दिन (अक्टूबर महीने में )नहीं किया था बल्कि चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (वर्तमान में वैसाख कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी अर्थात अप्रेल महीने ) के दिन किया था ,

अब अगर भगवान राम ने रावण का वध चैत्र मास में किया था
तो आप अनुमान लगा सकते है कि भगवान राम चैत्र मास के छ;
महीने बाद कार्तिक मास जब दीपावली होती है तब घर नहीं आए होंगे ।

 

आप विचार करें कि श्रीराम के वन गमन पर भरत जब उन्हें लौटाने हेतु उनके पास गये और श्रीराम ने भरत के सब प्रकार के अनुनय विनय को सविनय अस्वीकार कर दिया तो भरत को रामचंद्रजी की खड़ाऊं लेकर ही संतोष करना पड़ा। इस समय रामचंद्रजी और अयोध्या के बहुत से लोगों के समक्ष भरत ने कहा था-

चर्तुर्दशे ही संपूर्ण वर्षेदद्व निरघुतम।
नद्रक्ष्यामि यदि त्वां तु प्रवेक्ष्यामि हुताशन।।

अर्थात हे रघुकुल श्रेष्ठ। जिस दिन चौदह वर्ष पूरे होंगे उस दिन यदि आपको अयोध्या में नही देखूंगा तो अग्नि में प्रवेश कर जाऊंगा, अर्थात आत्मदाह द्वारा प्राण त्याग दूंगा। भरत के मुख से ऐसे प्रतिज्ञापूर्ण शब्द सुनकर रामचंद्र जी ने अपनी आत्मा की प्रतिमूर्ति भरत को आश्वस्त करते हुए कहा था-तथेति प्रतिज्ञाय-अर्थात ऐसा ही होगा। उनका आशय स्पष्ट था कि जिस दिन 14 वर्ष का वनवास पूर्ण हो जाएगा मेरे अनुज भरत मैं उसी दिन अयोध्या पहुंच जाऊंगा। रामचंद्रजी अपने दिये वचनों को कभी विस्मृत नही करते थे। इसलिए भाई भरत को दिये ये वचन उन्हें पूरे वनवास काल में भली प्रकार स्मरण रहे। यहां पर हम यह भी देखें कि रामचंद्र जी जब बनवास के लिए चले थे अथवा जब उनका राज्याभिषेक निश्चित हुआ था तो उस समय कौन सा मास था? महर्षि वशिष्ठ ने महाराजा दशरथ से राम के राज्याभिषेक के संदर्भ में कहा था-

चैत्र:श्रीमानय मास:पुण्य पुष्पितकानन:।
यौव राज्याय रामस्य सर्व मेवोयकल्प्यताम्।।

अर्थात-जिसमें वन पुष्पित हो गये। ऐसी शोभा कांति से युक्त यह पवित्र चैत्र मास है। रामचंद्र जी का राज्याभिषेक पुष्प नक्षत्र चैत्र शुक्ल पक्ष में करने का विचार निश्चित किया गया है।षष्ठी तिथि को ज्योतिष के अनुसार पुष्य नक्षत्र था। रामचंद्र जी लंका विजय के पश्चात अपने 14 वर्ष पूर्ण करके पंचमी तिथि को भारद्वाज ऋषि के आश्रम में उपस्थित हुए थे। ऋषि के आग्रह को स्वीकार करके वहां एक दिन ठहरे और अगले दिन उन्होंने अयोध्या के लिए प्रस्थान किया उन्होंने अपने कुल श्रेष्ठ भाई भरत से पंचमी के दिन हनुमान जी के द्वारा कहलवाया-

अविघ्न पुष्यो गेन श्वों राम दृष्टिमर्हसि।
अर्थात हे भरत! कल पुष्य नक्षत्र में आप राम को यहां देखेंगे।

इस प्रकार राम चैत्र के माह में षष्ठी के दिन (अप्रैल माह में) ही ठीक समय पर अयोध्या में पुन: लौटकर आए थे ।

विचारणीय प्रश्न ! 

और मित्रो यदि इतना जानने के बाद भी आपके मन में कोई संदेह हो तो आप एक और बात पर विचार करें कि भगवान राम अगर सच में दीपावली को अयोध्या लौटे थे  तो फिर हम सब दीपावली पर भगवान राम की पूजा  क्यों नहीं करते? लक्ष्मी जी और गणेश भगवान की पूजा  क्यों करते है?

योगेश मिश्र
ज्योतिषाचार्य,संवैधानिक शोधकर्ता एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)
संपर्क – 9044414408

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