नर्मदा अनादि शैव नदी है : Yogesh Mishra

जब पृथ्वी पर गंगा नहीं थी, तब भी अनादि काल से शैव नर्मदा नदी भारत के संस्कृति को सजो रही थी ! यह हिमालय से नहीं बल्कि अमरकंटक के तप स्थली से निकली थी !
शुरू में मामूली दिखने वाली यह नदी समुद्र तक पहुँचते पहुँचते 20 किलोमीटर चौड़ा पाट की स्वामिनी हो जाती है ! जहाँ यह तय करना कठिन हो जाता है कि कहां तक नर्मदा का पाट है और कहां से समुद्र आरंभ होता है ! यह सरस्वती की तरह ही अरब सागर को समर्पित नदी है !

नर्मदा ने हजारों वर्ष तक वैष्णव आक्रान्ताओं से दक्षिण भारत के शैव जीवन शैली की रक्षा की थी ! इसके किनारों पर वैष्णव नागर सभ्यता लम्बे समय तक विकसित नहीं हो पायी ! इसके दोनों किनारों दंडकारण्य के घने जंगल थे ! जिन्होंने वैष्णव आक्रान्ताओं को सनातन शैव संस्कृति तक पहुंचने नहीं दिया !

नर्मदा अनेक वर्षों तक वैष्णव आक्रान्ताओं की सीमा रेखा बनी रही ! रावण भी अनेक बार इसके तट पर तपस्या के लिये आया था ! जिसे पहली बार रावण का फूफा वशिष्ठ ऋषि के भाई अगस्त ऋषि ने रावण की सहमति से नर्मदा को पार किया था ! फिर विश्वामित्र ने और फिर इंद्र के उकसाने पर राम ने इस शैव नदी की मर्यादा को पार किया था ! इनके पूर्व नर्मदा के तट पर वैष्णव का उत्तरापथ समाप्त हो जाता था और शैवों का दक्षिणा पथ यही से शुरू होता था !

नर्मदा तट पर मोहन जोदड़ो, हड़प्पा, अवध, प्रतिष्ठान पुर (प्रयाग राज), मधु पुरी (मथुरा) जैसी वैष्णव नागर संस्कृति कभी नहीं रही, लेकिन शैव जीवन शैली और आरण्यक संस्कृति अवश्य रही !

नर्मदा तटवर्ती वनों में सदैव से मार्कंडेय, कपिल, भृगु, जमदग्नि आदि जैसे अनेक शान्ति प्रिय ज्ञानी ऋषियों के आश्रम रहे । यहाँ सदैव भगवान शिव के रुद्राभिषेक हुआ करता था ! ऋषियों का कहना था कि तपस्या तो बस कैलाश पर्वत के बाद नर्मदा के तट पर ही हो सकती है !
इसीलिये इसे ऋषियों ” रेवा” नाम भी दिया है अर्थात आत्म उत्थान करने वाला दिव्य स्थल ! स्कंद पुराण में “रेवाखंड” के रूप में एक पूरा खण्ड ही नर्मदा के महात्म को अर्पित है।
“पुराण कहते हैं कि जो पुण्य , गंगा में स्नान करने से मिलता है, वह नर्मदा के दर्शन मात्र से मिल जाता है।”
नर्मदा प्रपात बाहुल्या नदी है ! कपिलधारा, दूधधारा, धावड़ीकुंड, सहस्त्रधारा आदि अनेकों मुख्य प्रपात इसी के जल से संचालित हैं ! यह निरंतर पूर्व से पश्चिम को बहने वाली दिव्य जल धारा है !
ओंकारेश्वर इस का प्रमुख तीर्थ है ! महेश्वर की प्राचीन माहिष्मती नगरी यहीं स्थित है ! यहाँ के घाट देश के सर्वोत्तम घाटों में से है । जिनमे आज भी पारदर्शी स्वच्छ जल मिलता है !
पर अब विकास की काली छाया नर्मदा के तटवर्ती प्रदेशों पर कई बांधों के रूप में पड़ने लगी है ! जो नर्मदा के प्रवाह की बांधती है ! जिससे मुझे काफी मानसिक कष्ट होता है !

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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