वैष्णव की शिवरात्री : Yogesh Mishra

इतिहास से अनजान डोलक मजीरा बजाने वाले वैष्णव लोग आज शिवरात्री का भी व्रत उपवास आदि रख रहे हैं ! जबकि इन्हीं के तथाकथित भगवानों ने बहुत बड़ी मात्रा में शिव भक्तों को योजना बद्ध तरीके से हत्या करवा कर उनका राज्य व सम्पत्ति लूट ली थी !

जिसके प्रमाण आज भी सनातन पंचांग में देखने को मिलते हैं ! जहाँ वैष्णव शैवों के साथ कोई भी त्यौहार मनाने को तैय्यार नहीं हैं ! प्राचीन समाज में शैव वैष्णव की स्थिती कुछ वैसी ही थी जैसी आज हिन्दू मुसलमान या हिन्दू ईसाईयों की है !

मुसलमान, इसाई तो कोई हिन्दू त्यौहार मानते नहीं मिलेंगे पर हिन्दू जरुर रोजा अफ्तर और जीजस का जन्म दिन मानते जरुर मिल जायेंगे !

यह हमारे अज्ञानता और मानसिक दिवालिया पान की पराकाष्ठा है कि हम बिना कुछ भी सोचे समझे कुछ करते रहने में विश्वास रखते हैं ! बस कुछ मजा आना चाहिये !

प्राचीनकाल में देव, नाग, किन्नर, असुर, गंधर्व, भल्ल, वराह, दानव, राक्षस, यक्ष, किरात, वानर, कूर्म, कमठ, कोल, यातुधान, पिशाच, बेताल, चारण आदि जातियां हुआ करती थीं ! जिनमें अधिकांश शिव भक्त शैव जीवन शैली का अनुकरण करती थी ! वैष्णव और शैवों के हिंसक झगड़े के चलते धरती के अधिकतर मानव समूह दो भागों में बंट गये ! शैव अनुयायी और वैष्णव अनुयायी !

पहले वैष्णव द्वारा लुटेरों की टोली बना कर पूरी दुनियां के शैवों को लूटा गया फिर कालांतर में बृहस्पति लुटेरे वैष्णव के आचार्य हो गये और शुक्राचार्य पीड़ित व असंगठित समाज शैवों के आचार्य होगये ! फिर इन दोनों के नेतृत्व में सैकड़ों वर्ष तक लड़ाई चलती रही !

फिर त्रेता में शुक्राचार्य और आचार्य वृहस्पति के स्थान पर गुरु वशिष्ठ और विश्‍वामित्र की लड़ाई चली ! जिसमें गुरु वशिष्ठ के शान्त स्वभाव के कारण उनके कमजोर पड़ते ही विश्‍वामित्र ने इंद्र के इशारे पर शिव भक्त रावण की हत्या करावा दी ! जिसमें दक्षिण भारत के महान विद्वान् महर्षि अगस्त भी शामिल थे और वशिष्ठ अयोध्या छोड़ कर मनाली चले गये ! जिन्हें मनाने के लिये अश्वमेध यज्ञ के समय राम ने लक्ष्मण को भेजा था !

इन हजारों साल की लड़ाइयों के चलते समाज दो भागों में बंटता चला गया ! हजारों वर्षों तक इनके झगड़े के चलते ही पहले सुर और असुर नाम की दो विचार धाराओं का जीवन शैलियों पर आधारित धर्म प्रकट हुआ ! यही आगे चलकर यही वैष्णव और शैव में बदल गए !

शैव और वैष्णव दोनों संप्रदायों के झगड़े के चलते शाक्त धर्म की उत्पत्ति हुई ! जिसने दोनों ही संप्रदायों से अलग हट कर शैव परम्परा के ही तंत्र, साधना, उपासना आदि पर ध्यान दिया ! लेकिन साथ ही वैष्णव के कर्मकाण्ड को भी अपना लिया !

फिर अत्रि पुत्र दत्तात्रेय हुये जिन्होंने तीनों संप्रदाय के अनुयायियों को जोड़ने की कोशिश की और ब्रह्मा, विष्णु और शिव के जीवन शैली के मध्य समन्वय स्थापित करने का कार्य किया ! इन्होंने सभी को संतुष्ट करने के लिये अनेक गुरु परम्परा की शुरुआत की और स्वयं भी चौबीस गुरु किये !

बाद में पुराणों और स्मृतियों के आधार पर जीवन-यापन करने वाले “स्मार्त संप्रदाय” का उदय हुआ ! यह किताबी कीड़े बन कर रह गये और इन्हीं किताबी कीड़ों ने ढोलक मजीरा बजा बजा कर भक्ति मार्ग की शुरुआत की ! आज यही भक्ति मार्गी स्मार्त संप्रदाय के लोग इतिहास को जाने बिना ब्रह्म संस्कृति से लेकर वैष्णव, शैव, शाक्त, आदि सभी संस्कृतियों के त्यौहार मानते हुये नज़र आते हैं और पूर्वजों के प्राचीन ऐतिहासिक संघर्ष के मूल कारणों को इतिहास के पन्नों से विलुप्त करने में लगे हुये हैं !

अब देखना यह है कि यह लोग बौद्ध, जैन, इस्लाम, ईसाईयों के त्यौहार कब से मनाना शुरू करेंगे ! वैसे आपकी जानकारी के लिये बतला दूँ कि तथाकथित कई वैष्णव संगठनों ने जीजस के जन्म दिन पर भगवान को सेंटा क्लाज की ड्रेस पहनना और रोजा अफतार की पार्टियाँ मनाना शुरू कर दिया है !
फिर शिवरात्री पर विशुद्ध वैष्णव भगवान कृष्ण को पीतांबरी उतार कर, मृग छाल पहना कर, उनसे बांसुरी की जगह डमरू बजवाने में इन वैष्णव को क्यों शर्म आयेगी !!

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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