जानिये फलित ज्योतिष के अद्भुत सूत्र | Yogesh Mishra

प्रायः लोग मुझसे पूछते हैं कि आप फलित ज्योतिष के कुछ अद्भुत सूत्र बतलाइये ! आज में अपने प्रिय जनों को वह सूत्र बतला रहा हूँ !जो मेरे स्व अनुभूत हैं और आपके लिये भी अकाट्य लाभकारी हैं !

1.यदि किसी जातक के जन्मलग्न को एक से अधिक शुभ ग्रह एवं केन्द्र-त्रिकोणादि के स्वामी (1, 4, 7, 10, 9, 5) होकर देख रहे हों, तो उसके व्यक्तित्व में सौम्यता, आकर्षण इत्यादि की अभिवृद्धि में सहायक होते हैं ! दूसरी ओर यदि एक से अधिक पापग्रह लग्न भाव को देख रहे हों, तो ऐसी स्थिति में जातक उग्र स्वभाव वाला, तामसिक विचारों वाला तथा दु:खी होता है एवं कुछ न कुछ मानसिक, शारीरिक पीड़ा से भी व्यथित रहता है !

2. नीच राशिगत ग्रह भी अपना विशेष प्रभाव नकारात्मक एवं सकारात्मक रूप से जातक के व्यक्तित्व तथा उसके जीवन पर डालते हैं, जो द्रष्टव्य है ! अनुभव के आधार पर नीच राशिगत मङ्गल व्यक्ति को ठण्डे स्वभाव का बनाता है, तो उसके आत्मविश्‍वास, साहस में न्यूनता की प्रवृत्ति भी दर्शाता है ! दूसरी ओर नीचराशिस्थ गुरु वाला जातक 31वें वर्ष के उपरान्त निजार्थिक, सामाजिक उत्थान का भोक्ता होता है, लेकिन सन्तान, और शिक्षा से जुड़ी जटिल समस्याओं का उसे जीवन में एक बार अवश्य सामना करना पड़ता है !

3. सिंह राशि में गुरु एवं मकर राशि में मङ्गल हो, तो व्यक्ति स्वभाव से दम्भी एवं कट्टर होता है ! सूर्य चन्द्र की युति वाला व्यक्ति अविनयी, हठी, दृढ़ प्रतिज्ञ होता है ! बशर्ते कि इस युति पर मङ्गल की पूर्ण दृष्टि हो !

4. लग्नस्थ बली (स्वगृही, उच्च) मङ्गल अथवा बुध जातक को अपनी वास्तविक उम्र से छोटी उम्र का दर्शाते हैं अर्थात् यदि वह वृद्धावस्था में हो, तो भी नौजवान युवक की भॉंति प्रतीत होगा !

5. लग्नेश छठे भाव में हो, तो जातक को विरोधी प्रवृत्ति वाला एवं दबंग बनाता है और इस भाव में यदि शनि स्थित हो, तो पैरों में दर्द विकार अथवा सूजन का सामना करना पड़ता है !

6. लग्न, सूर्य एवं चन्द्रमा बली होकर केन्द्र त्रिकोणादि भावों में हो साथ ही ये जिन राशियों में स्थित हों, उनके स्वामी भी षड्‌बल में बली होकर उक्त शुभ भावों में ही हो, तो व्यक्ति नि:संदेह प्रभावशाली, दीर्घायु, ख्यातिवान् एवं समाज में पूज्य होता है !

7. यदि किसी राशि में कोई ग्रह उच्च का होकर स्थित हो, लेकिन उस राशि का स्वामी नीच अथवा अस्त होकर छठे, आठवें बारहवें भावों में से कहीं भी स्थित हो, तो ऐसी स्थिति में उच्चराशिस्थ ग्रह अपना पूर्ण प्रभाव दिखाने में असमर्थ होता है, जैसे यदि मेष राशि में सूर्य भले ही अपने परमोच्च अंश (10) में क्यों न हो? इसका राशिश (मेष का स्वामी मङ्गल ) मङ्गल नीच राशि कर्क में हो या अस्त हो, तो निश्‍चित रूप से उच्चस्थ सूर्य अपना भावजन्य एवं राशिजन्य पूर्ण प्रभाव अभिव्यक्त करने में असमर्थ होगा !

8. लग्नस्थ मेष, सिंह, धनु, कर्क राशि मेंे स्थित गुरु व्यक्ति को अहंकारी एवं गंभीर प्रकृति का बनाता है !

9. दशम भाव में स्थित शनि (स्वगृही, उच्च एवं वक्री) 36वें वर्ष से विशेष व्यावसायिक उत्थान देता है एवं आकस्मिक गिरावट भी करता है ! दूसरी ओर इस भाव में स्थित बली मङ्गल जातक को अपने व्यवसाय में कीर्तिवान् बनाते हुए अनायास उसे विवादों के घेरे में भी उलझाता है !

10. जातक के सिंहस्थ सूर्य, मेष राशिस्थ मङ्गल उसके आत्मप्रभाव में वृद्धिकारक होते हैं और वह स्वत: प्रेरणा से समाज में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त करता है !

11. आधुनिक युग में तुला राशिस्थ सूर्य वाले व्यक्ति राजनीति एवं चिकित्सा के क्षेत्र में विशेष सफलता प्राप्त करते हुए देखे जा सकते हैं !

12. किसी जातक के यदि वृषभ राशि में चन्द्रमा केन्द्र त्रिकोणादि भावों में से कहीं भी पक्ष बल से परिपूर्ण होकर पापग्रहों की दृष्टि, युति से मुक्त हो, तो उसे (जातक को) राजपक्ष से पद प्राप्ति के सुअवसर मिलते हैं ! ऐसा जातक उदार एवं व्यावहारिक भी होता है !

13. जन्म लग्न कुण्डली के अन्तर्गत जातक के दाम्पत्य सुख के सन्दर्भ में सप्तम भाव स्थित अकेला शुक्र बाधाएँ एवं रूकावटें पैदा करता है, तो दूसरी ओर इस भाव में स्थित सूर्य जीवनसाथी से मतभेद पैदा करता है ! स्थिति यहॉं तक आ जाती है कि गृहस्थ जीवन में घुटन एवं अलगाव की सम्भावनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं, लेकिन यदि शुक्र या सूर्य स्वगृही, उच्चराशि में स्थित होकर अथवा एक से अधिक शुभ ग्रहों द्वारा दृष्ट होकर सप्तम भाव में स्थित हो, तो इस भाव से उपर्युक्त वर्णित दुष्परिणाम जातक को अत्यल्प मात्रा में ही प्राप्त होंगे !

14. शुभ भावों के स्वामी (1, 4, 7, 10, 5, 9 भावों के) होकर तीन अथवा इसे अधिक अस्त ग्रह जातक के राजयोग एवं उत्तम स्वास्थ्य में क्षीणता को दर्शाते हैं, ऐसा जातक साधारण व्यक्तित्व का एवं कोई न कोई आधि-व्याधि से ग्रसित रहता है !

15. जातक की कुण्डली में एक से अधिक नीच राशिस्थ ग्रहों का नीचभङ्ग राजयोग उसे सामान्य स्थिति से काफी उच्च स्तर का बनाता है और अपने कार्य व्यवसाय में विशिष्ट मुकाम पर पहुँचाता है !

16. जातक की जन्म कुण्डली में लग्न भाव छठे भाव की अपेक्षा पूर्ण बली हो और एकादश भाव द्वादश भाव की अपेक्षा पूर्ण बली हो, तब वह जीवन में मनवांछित यश, धन, उत्थान, उच्च सफलता की सहज प्राप्ति करता है !

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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