राष्ट्र में जल संकट की वजह जल पर करारोपण है ! : Yogesh Mishra

जल पर कर लगा कर सरकार ने जनता को यह बतला दिया है कि जल स्रोतों की सुरक्षा और समृद्धि का दायित्व जल का उपयोग और उपभोग करने वालों का न होकर शासन-प्रशासन का है ? जबकि हकीकत यह है कि कोई भी शासन-प्रशासन कितने ही बड़े बजट और कितने ही बड़े लाव-लश्कर के साथ जल सुरक्षा सुनिश्चित करने में लगे जन दायित्व के आभाव में जल सुरक्षा संभव नहीं है !

यह गंभीर चूक व्यैक्तिक और सामुदायिक दोनों स्तर पर हुई है ! हालांकि लोगों के जनदायित्व पूर्ति से हट जाने की वजह निजी जीवन में राजनैतिक, प्रशासनिक, संवैधानिक, हस्तक्षेप माना है जबकि यह सामाजिक, सांस्कृतिेक, नैतिक, विषय है ! मसलन विभिन्न प्रदेश का मछली कानून कहता है कि नदी की सभी मछलियों पर मछली विभाग का अधिकार है !

नदियां सरकार की हैं ! कानूनन, नदियां राज्य का विषय हैं ! संविधान की एंट्री संख्या 56 के मुताबिक, अंतरराज्यीय नदियों के मामले में दखल का पूरा अधिकार केन्द्र के पास है ! लोगों को दखल का कोई कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं है ! अतः लोगों इनके रखरखाव को अपनी जिम्मेदारी नहीं मानते ! यह ठीक नहीं है !

प्राकृतिक संसाधनों के मामले में संविधान, सरकार को महज ट्रस्टी मानता है ! ट्रस्टी सौंपी गई संपत्ति की ठीक से देखभाल न करे, तो उसे हटाने और हटाकर संपत्ति को किसे सौंपा जाए, इस बारे में संवैधानिक स्तर पर स्पष्टता का न होना भी नदियों के समक्ष पेश चुनौंतियों के समाधान में बाधक है ! जनजुड़ाव के रास्ते में मालिकी की अस्पष्टता, अपने आप में एक बड़ी बाधा है ! इसके दुष्परिणाम हमें चौतरफा दिखाई दे रहे हैं !

मनरेगा के तहत बने तालाब को ही लीजिए ! वे सिर्फ इसलिए फेल हुए, चूंकि जगह के चयन और डिजायन ठीक नहीं थे ! भारत जैसे भू सांस्कृतिक विविधता वाले देश में जलसंचयन ढांचों के डिजाजन में एकरूपता की कल्पना करना ही तकनीकी तौर पर गलत है; बावजूद इसके मनरेगा के तहत् पानी के ढांचे कमोबेश हर जगह एक से ही बने !

लोगों से न राय ली गई और न ही ग्रामसभाओं ने इसे अपना दायित्व समझकर राय दी ! राजनेता मतदाताओं से कहते हैं – “तुम मुझे वोट दो, मैं तुम्हे पानी दूंगा !’’

ऐसे कई उद्धहरणों का जिक्र किया जा सकता है ! किंतु सिर्फ नेता, कानून अथवा नीति नियंताओं को दोष देकर मसले का हल ढूंढा नहीं जा सकता ! हकीकत यह है कि अपने पारंपरिक ज्ञान और लोक संसाधनों के प्रति हम भारतीय के संस्कृति, संस्कार में कमी आई है !

पानी के संकट के रूप में दिखता संकट, वास्तव में हम भारतीयों की नैतिकता में गिरावट का संकट है ! अपने बाप-दादाओं द्वारा संजोकर रखे गए संसाधनों को बेचकर ऐश करने की नीयत का संकट है !

भारतीय जल संस्कृति में पानी को वरूण, इन्द्र और मां कहा जाता है ! भारत सरकार की जल नीति ने पानी को वस्तु कहा ! हमने भी पानी को इसी रूप में स्वीकार लिया है !

पानी-नदी के साथ रिश्ते की बात झूठी है ! हर हर गंगे की तान में अब कोई दम नहीं है ! जहां समाज आज भी पानी-नदी के साथ रिश्ता रखता है. वहां आज भी कोई जल संकट नहीं है ! राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड समेत आज भी देश में कई इलाके इसकी मिसाल के रूप में विद्यमान है ! स्पष्ट है कि जलसुरक्षा के लिए कानून से ज्यादा समग्र नीति और नीयत की जरूरत है !

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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