राजनीति में मूल समस्याओं से ध्यान भटकाने के लिये कृत्रिम समस्यायें पैदा की जाती हैं : Yogesh Mishra

रामदेव और आई.एम.ए. के महासचिव के बीच का विवाद अब बहुत जल्दी ही समाप्त हो जायेगा क्योंकि इस विवाद के पीछे जो उद्देश्य था, उसकी पूर्ति लगभग हो चुकी है ! यह विवाद पैदा ही इसी उद्देश्य से किया गया था कि बंगाल चुनाव रैलियों में व्यस्त होने के कारण इस देश के कर्णधार नेता जो करो ना के आपातकालीन स्थिति को नियंत्रित नहीं कर पाये थे, जिसके कारण इस देश में हजारों की संख्या में लोगों की जानें चली गई ! परिवार उजड़ गये और इस संकट की घड़ी में न जाने कितनी माताओं ने अपने बेटे खो दिये और पत्नियों ने अपने पति खो दिये !
न जाने कितने बच्चे अनाथ हो गये और लोग मात्र ऑक्सीजन जैसी सामान्य चीज के लिए दर-दर ठोकरें खाते रहे और मुंह मांगे कीमतों पर भी व्यक्ति को जीवन को बचाने वाला ऑक्सीजन उपलब्ध न हो सका !

जीवन रक्षक औषधियां अपने मूल्य से कई गुना ज्यादा मूल्यों पर खुले आम धड़ल्ले से बाजारों में बिकती रही और प्रशासन मूकदर्शक बना देखता रहा ! श्मशान में चिताओं को जलाने के लिए लकड़ी नहीं थी ! तो कहीं कब्र को खोदने के लिए मजदूर नहीं मिल रहे थे !

घर की माताएं, बहने, अपने परिवार के भाइयों और पिता के लाशों को कंधों पर ढो रहे थे ! तो दूसरी तरफ कोई व्यक्ति अकेले ही लाश को साइकिल पर घसीटता चला जा रहा था ! वहीं कुछ लोग चुपचाप संसाधनों के अभाव में अपने प्रियजनों को बिना अंतिम संस्कार के गंगा जैसी पवित्र नदियों में बहा दे रहे थे ! इसका प्रमाण गंगा में हजारों की संख्या में उतरती हुई लाशें थी !

लोगों में एक बड़ा जनाक्रोश था और दूसरी तरफ बंगाल का चुनाव हार जाने के कारण देश के तथाकथित कर्णधार नेताओं को अब अपनी छवि बचाने के लाले पड़ गये थे ! ऐसी स्थिति में आम जनमानस का इन सभी विषयों से तत्काल ध्यान हटाया जाना यथा शीघ्र आवश्यक हो गया था !

मात्र 6 महीने बाद देश के कई महत्वपूर्ण राज्यों में चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है ! जिसमें यदि तत्काल जनता का ध्यान किसी अन्य बिंदु पर न लगाया गया तो बड़ी राजनीतिक क्षति होने की संभावना है !

इसी के मद्देनजर एक भगवा व्यवसायी और दूसरा एक एनजीओ के महासचिव के मध्य एलोपैथी बनाम आयुर्वेद को लेकर विवाद शुरू करवाया गया ! इस विवाद के शुरू होते ही मैंने तत्काल अपने पूर्व के लेख में यह बात कही थी कि यह विवाद पूरी तरह प्रायोजित है और इसका उद्देश्य मात्र करो ना काल की असफलताओं से लोगों का ध्यान हटाना है और वास्तव में हुआ भी यही !

आज न तो कोई ऑक्सीजन की कमी पर चर्चा कर रहा है और न ही गंगा में बहती हुई लाशों की ! न तो कोई डॉक्टरों के लूट पर चर्चा कर रहा है और न ही जीवन रक्षक औषधियों के कई गुना अधिक मूल्य पर प्रशासन के मौन की !

यही लोकतंत्र का खेल है ! जिसमें हर एक खिलाड़ी अपना साधा हुआ रोल राजनीतिज्ञों के इशारे पर अदा करता है और जनता का उसकी मूल समस्याओं से ध्यान भटका देता है ! अगले साल फिर करो ना आयेगा ! फिर दवाइयों की कमी होगी ! फिर अस्पताल लूटेंगे ! फिर लोग ऑक्सीजन के सिलेंडर के लिए जगह-जगह ठोकर खाएंगे और फिर लोगों की जमा पूंजी चिकित्सा के नाम पर लूट ली जाएगी !

जबकि इन मूल समस्याओं का स्थाई समाधान होना चाहिये ! वह अब नहीं होगा क्योंकि हमारे राजनेता राज्यों के आगामी चुनाव की तैयारी में अब व्यस्त हो जाएंगे !

जैसे प्रतिवर्ष बाढ़ आती है ! सरकारी विभाग के अधिकारी लूट खसोट मचाते हैं ! लोगों के घर बह जाते हैं ! मकान टूट जाते हैं और बाढ़ के जाने के बाद सब कुछ वैसे ही सामान्य हो जाता है ! जैसे कभी कुछ हुआ ही नहीं था और आम जनमानस हर वर्ष के इस यातना को सहने का आदी हो जाता है ! फिर भी इसका कोई स्थाई समाधान नहीं निकला जाता है !

कमोबेश यही स्थिति अब प्रतिवर्ष के करो ना की भी है ! चीजें इसी तरह हर वर्ष बिगड़ती रहेंगी और राजनीतिज्ञों के सुनियोजित षड्यंत्र के द्वारा आम जनमानस को बार-बार भुला दी जाएंगी और आम जनमानस यूं ही भटकता रहेगा ! उसे कभी कोई स्थाई समाधान नहीं मिलेगा !

क्योंकि बड़ी आपदाओं के बाद प्रायोजित राजनीतिक विवाद आपदाओं के दुखों को भुलाने के लिए ही पैदा किए जाते हैं और वक्त के साथ वह स्वत: ही शांत हो जाते हैं ! यही लोकतंत्र का घिनौना खेल है ! खास तौर से जब पूर्ण बहुमत की सरकार हो !!

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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