भारतीयों को कैसे बौद्धिक विकलांग बनाया गया : Yogesh Mishra

भारत वर्ष जो कभी विश्व गुरु रहा है ! जहां कभी चाणक्य जैसे राजनीतिज्ञ, पुष्यमित्र और विक्रमादित्य जैसे राजा, राणा प्रताप और शिवाजी जैसे योद्धा, महर्षि भरद्वाज और विश्वामित्र जैसे वैज्ञानिक, वराह मिहिर और महर्षि अगस्त्य से ज्योतिषी, चरक और धनवंतरी जैसे आयुर्वेदाचार्य, सुश्रुत जैसे शल्य चिकित्सक, आर्यभट्ट जैसे गणितज्ञ आदि आदि और भी हजारों हजार युग पुरुषों ने जिस भारत भूमि पर जन्म लिया और भारत को विश्व गुरु बना दिया ! उस भारत में आज ऐसा क्या हो गया है कि यहां का आम आदमी अपने व अपने राष्ट्र के निजी हित का भविष्य भी नहीं देख पा रहा है !

इसका सीधा सा जवाब है कि जब भारतीयों ने भारतीय तरीके से सोचना बंद कर दिया है और विदेशी भोजन, विदेशी शिक्षा और विदेशी पोशाक में अपने सम्मान को खोजने लगा है और बस यहीं से भारतीयों का बौद्धिक पतन शुरू हो गया ! अब न तो वह अपनी प्राचीन बौद्धिक परंपरा को जीवित रख पा रहे हैं और न ही वह पश्चिम के उन्मुक्त बौद्धिक दर्शन को ही अपना पा रहे हैं ! इसी को कहते हैं, “दुविधा में दोनों गये, माया मिली न राम”

लेकिन भारतीय समाज में यह दुविधा का वातावरण स्वाभाविक नहीं था ! यह पूरी तरह से प्रायोजित और व्यवस्थित तरीके से पैदा किया गया था ! एक बौद्धिक युद्ध की तरह !

अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति के बाद सबसे पहले भारत में राष्ट्र का बौद्धिक चिन्तक कहे जाने वाले वर्ग “ब्राह्मणों” को प्रभावहीन करने के लिये सर्वप्रथम उनके आय और सम्मान के श्रोत पर विधि द्वारा हमला किया गया ! अंग्रेजों द्वारा एजुकेशन एक्ट लाकर गुरुकुल को अवैध घोषित किया गया और लोकल पुलिस की सहायता से गुरुकुलों को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया और शिक्षा के लिये उसी के समानांतर कॉन्वेंट स्कूल खोले गये !

जिन स्कूलों में गुरुकुलों के व्यावहारिक शिक्षा के स्थान पर चौक-डस्टर की शिक्षा लागू की गई और विधिवत तरीके से बच्चों को बौद्धिक गुलाम बनाये रखने के लिये उनकी बार-बार और निरंतर लिखित परीक्षा ली जाने लगी ! जिसमें उनके बौद्धिक स्तर का आंकलन काल्पनिक नंबरों से किया जाने लगा ! जिसमें सबसे अधिक ध्यान शिक्षा के स्थान पर हस्त लेखन और अक्षर ज्ञान पर दिया गया ! जिससे बच्चों को व्यावहारिक शिक्षा मिलनी बंद हो गई और बच्चे बौद्धिक रूप से गुलाम बनने लगे !

इन बौद्धिक गुलामों को अंक तालिका में प्राप्त काल्पनिक नंबरों के आधार पर सरकारी नौकरियां प्रदान की जाने लगी और उन सरकारी कर्मचारियों को समाज की सामान्य औसत आय से अधिक वेतन दिया जाने लगा ! उन्हें आवास व अन्य सुविधाएं दी जाने लगी ! उनके आत्मविश्वास को तोड़ने के लिये जानबूझकर उन्हें उनके गृह जनपदों से दूर अनजान स्थान पर नौकरी करने के लिये बाध्य किया जाने लगा ! रिटायर होने के बाद एक मोटी रकम तथा आजीवन पेंशन दी जाने लगी !

जिस लालच में समाज में यह अवधारणा पैदा हुई कि सरकारी नौकरी से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है और व्यक्ति ने व्यावहारिक शिक्षा के स्थान पर रटी रटाई शिक्षा को तेजी से अपनाना शुरू कर दिया क्योंकि यह शिक्षा पध्यति ही व्यक्ति को प्रशासनिक अधिकारी, बाबू या उसे अन्य सरकारी नौकरियां दिलवाने में सहायक थीं !

दूसरी तरफ व्यावहारिक ज्ञान के द्वारा जो लोग उद्योग धंधा करते थे ! उन उद्योग धंधों को हतोत्साहित करने के लिये समय-समय पर कानून बनाए गये और इन्सपेक्टर राज्य कायम किया गया ! जिससे उद्योग धंधा वाले व्यवसायी परेशान होकर अपना उद्योग धंधा बंद करने लगे और उसका परिणाम यह हुआ कि व्यावहारिक ज्ञान रखने वाला व्यक्ति बेरोजगार होने लगे !

आधुनिक शिक्षा में भी इतने वर्गीकरण कर दिये गये कि एक क्षेत्र का ज्ञान रखने वाला व्यक्ति दूसरे क्षेत्र से पूरी तरह अनभिज्ञ हो गया ! जैसे कॉमर्स जानने वाला व्यक्ति साइंस के विषयों की जानकारी नहीं रखता है और साइंस जानने वाला व्यक्ति सनातन प्राचीन कला संगीत का अध्ययन नहीं करता है ! जिससे शिक्षा के द्वारा व्यक्ति का जो समग्र विकास होना चाहिये, वह अवधारणा ही धीरे-धीरे विलुप्त हो गयी और समग्र विकसित व्यक्ति की जगह व्यक्ति विशेष विधा का विशेषज्ञ बनने लगा !

जिसने व्यक्ति के मौलिक चिंतन और दर्शन दोनों को ही बदल दिया ! अब उसने विशेष विधा का विशेषज्ञ होने के नाते किसी अन्य विधा के व्यक्तियों से मिलना जुलना ही बंद कर दिया ! जैसे कि डॉक्टर, डॉक्टर के साथ बैठने लगा ! वकील, वकील के साथ बैठने लगा ! व्यापारी, व्यापारी के साथ बैठने लगा ! प्रशासनिक अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारियों के साथ बैठने लगा ! जिससे समाज बिखर गया और व्यक्ति में नया कुछ सीखने की संभावना ख़त्म हो गयी ! उनके अंदर बौद्धिक अपंगता पैदा हो गई क्योंकि वह अपने विधा की जानकार तो रखता है लेकिन अन्य विधाओं की जानकारी न होने के कारण यदि किसी अन्य क्षेत्र में कोई कार्य करना पड़े तो वहां पर उनका आत्मविश्वास उनका साथ नहीं देता है !

इस तरह हमें शिक्षित करने के नाम पर केवल अक्षर ज्ञानी तो बनाया गया लेकिन हमारा समग्र बौद्धिक विकास पूरी तरह से खत्म कर दिया गया ! जिससे व्यावहारिक ज्ञान के अभाव में हमारा जीवन दर्शन विकलांग हो गया और हम विशेषज्ञों की राय पर आश्रित हो गये फिर विशेषज्ञ भी अपनी राय अपने आर्थिक हितों को देखते हुये देने लगे !

इस सब का दूरगामी परिणाम यह हुआ कि अब हमारे अंदर समग्र ज्ञान के आभाव में आत्मविश्वास की अत्यंत कमी हो गई ! हमें किसी भी क्षेत्र का व्यावहारिक ज्ञान नहीं रह गया ! तब हम पूरी तरह से सूचना के लिये इंटरनेट, किताब, समाचार पत्र या अन्य विभिन्न पत्रिकाओं पर आश्रित हो गये ! वहां भी जो ज्ञान था वह भी आधा अधूरा और भ्रमित करने वाला था !

और इस तरह हम बौद्धिक विकलांग होने के साथ-साथ पुरुषार्थ विहीन भी होकर एक अहंकारी व्यक्ति के रूप में बदल गये ! जिसे आता जाता तो कुछ नहीं लेकिन विशेष विधा का विशेषज्ञ होने के नाते वह समाज से बहुत तरह के सम्मान और धन की अपेक्षा करता है ! ऐसा सम्मान और धन की अपेक्षा करने वाला पुरुषार्थ हीन व्यक्ति सदैव से समाज के लिये घातक रहे हैं ! शायद इसीलिये भारत जो कभी विश्व गुरु था, वह अब आत्मविनाश गुरु हो गया है !!

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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