तंत्रोक्त गणेश बुद्धिज्म की शुरुआत कैसे हुई : Yogesh Mishra

जापान के टोक्यो में लकड़ी के बहुत सारे बौद्ध मंदिरों के बीच कई मंदिर कई हजार-हजार साल भी हैं ! इन्हीं में से एक मंदिर में उसमें जिस देवता की मूर्ति रखी हुई है, वह हमारे गणेश देवता से काफी मिलती-जुलती है ! “मात्सुचियामा शोटेन” नामक इस मंदिर में रखी मूर्ति असल में गणेश जी का ही जापानी वर्जन है, जिसे तंत्र को मानने वाले बौद्ध संत ही पूजते हैं ! आठवीं सदी में बने इस मंदिर के देवता के बारे में माना जाता है कि यह भारत के उड़ीसा आये थे ! यहीं से बौद्ध भिक्षुकों से यह जागृत तंत्र मूर्ति अपने साथ ले गये थे !

धर्म पर रिसर्च करने वालों का मानना है कि जापान में पहली बार आठवीं सदी के दौरान गणेश को माना जाने लगा ! यह मानने वाले बौद्ध लोग ही थे ! जो मंत्र बुद्धिज्म पर यकीन करते थे ! यह बौद्ध धर्म की ही ऐसी शाखा है, जिसके अनुयायी आज भी मात्र तांत्रिक शक्तियों की ही पूजा करते हैं !

उड़ीसा में बुद्ध को मानने वाले कुछ तांत्रिकों की चीनी व्यापारियों और सैलानियों से मुलाकात के बाद तंत्र आश्रित बुद्धिज्म चीन पहुंचा और वहां से कुछ सालों बाद एक जापानी रिसर्चर “कुकई” के द्वारा यह तंत्र बुद्धिज्म जापान पहुंचा और फिर शोधार्थी बौद्ध भिक्षुकों के सहयोग से नये शोधों के साथ वहीँ तत्रोंक्त गणेश बुद्धिज्म की एक नई शाखा बौद्ध धर्म में विकसित की जाने लगी ! क्योंकि यह तंत्र विद्या अत्यंत प्रभावशाली थी इसलिये यह पूरे जापान में बहुत जल्द ही लोकप्रिय हो गई ! इस तरह से जापान में तांत्रिक गणेश बुद्धिज्म की नींव पड़ी !

इस तांत्रिक गणेश बुद्धिज्म में गणेश जी को एक स्त्री से लिपटा हुआ दिखाया गया है ! संभवत यह गणेश जी की “रति” अवस्था की मूर्ति है ! इसे मुद्रा को वहां के विकसित समाज ने अश्लील मानते हुये इसे एक लकड़ी के डब्बे में सुरक्षित रख दिया है !

किन्तु वह लोग इसे “शक्ति मुद्रा” बतलाते हैं ! यह पुरुष और स्त्री के मेल से पैदा हुई ऊर्जा का प्रतीक है ! हालांकि कुछ लोग इसे कामुक मुद्रा भी कहते हैं ! शायद इसीलिये गणेश जी की इस मूर्ति या तस्वीर मंदिरों में सामने नहीं रखा जाता है ! यह नित्य पूजन के उपरांत लकड़ी के सजे हुये बक्से में रखी जाती है ! केवल कुछ खास मौके पर ही इस मूर्ति को बाहर निकाला जाता है और उसकी पूजा सबके सामने की जाती है !

जापान में गणेश (केंगिटेन) को मानने वालों की संख्या बहुत बड़ी है ! उनका मानना है कि इस मूर्ति के स्वरूप को स्थापित करने से व्यापार-व्यवसाय में आने वाली समस्त बाधाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं और व्यापारी का निरंतर विकास होता चला जाता है ! इसी आशा और विश्वास के साथ प्राय: जापान के सभी व्यापारी इस प्रति मूर्ति को अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के पूजा स्थल पर रखते हैं !

इन्हें वहां एक शक्तिशाली भगवान के तौर पर देखा जाता था और इनकी पूजा भी खास तरीके से शुद्ध रहते हुये तंत्रोक्त विधि से की जाती है ! इसका जिक्र क्लासिकल गोल्डन एज (794-1185 CE) के दौरान भी मिलता है !

जापान का सबसे बड़ा गणेश मंदिर माउंट इकोमा पर Hōzan-ji नाम से है ! ये दक्षिणी हिस्से में ओसाका शहर के बाहर बसा हुआ है ! 17वीं सदी में बने इस मंदिर के बारे में काफी कहानियां कही जाती हैं और स्थानीय लोगों से लेकर पूरे जापान में इसकी काफी मान्यता है ! खासकर यहां के व्यापारी इसे काफी मानते हैं ! इच्छा पूरी होने पर यहां काफी दान-दक्षिणा भी की जाती है, जिसमें मुख्य तौर पर जापानी मुद्रा होती है ! इसके अलावा आभूषण भी दिये जाते हैं ! यही वजह है कि ये मंदिर जापान से सबसे अमीर मंदिरों में से एक है ! दुकानों में भी भारत की तर्ज पर दो हाथियों की आपस में गुंथी हुई मूर्ति मिलती है, ताकि लोग घर में मूर्ति पूजा कर सकें !

अब बौद्ध धर्म को मानने वाले जापान में इन गणेश जी की मूर्तियां वहां के कई मंदिर मिलती हैं ! लाइव हिस्ट्री के मुताबिक यहां कुल 250 गणेश मंदिर हैं ! लेकिन इन्हें जापान में अलग-अलग नामों से बुलाया जाता है ! जैसे केंगिटेन, शोटेन, गनबाची (गणपति) और बिनायकातेन (विनायक) आदि आदि !

मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि विश्व के नक्शे में जापान ही एक ऐसा देश है ! जहां पर सूर्य की सबसे पहली किरण पड़ती है ! जो समस्त पृथ्वी मंडल की ऊर्जा के मूल स्रोत हैं ! वहां के मुख्य अधिष्ठाता देवता गणेश जी हैं ! इसीलिये पुराणों में गणेश जी को प्रथम पूजनीय अधिष्ठाता देवता के रूप में मान्यता दी गई है और इसके समर्थन में कालांतर में धर्म कथाओं का निर्माण किया गया !

क्योंकि महाभारत काल तक के किसी भी ग्रंथ में कहीं भी भगवान शिव के साथ गणेश जी के पूजन का विधान नहीं है और न ही महाभारत काल के किसी भी मंदिर में शिवलिंग के साथ गणेश जी के मूर्ति की स्थापना की गई हुआ बताया जाता है !

अर्थात यह सिद्ध होता है कि गणेश जी के मूर्ति का विधान बौद्ध काल से शुरू हुआ और बाद को समाज ने इसे ठीक उसी तरह धार्मिक स्वीकृति दे दी जैसे “जय संतोषी माँ” पिक्चर आने के बाद संतोषी माता के मंदिर बनाये जाने लगे और मनोज कुमार की “साईं बाबा” पर आश्रित पिक्चर आने के बाद भारत के मंदिरों में साईं बाबा की मूर्ति स्थापित की जाने लगी !

अब तो जय शनिदेव टी.वी. सीरियल आने के बाद जगह-जगह शनिदेव के मंदिरों की भी स्थापना की परंपरा प्रारंभ हो गई है ! जबकि शनिदेव एक अदृश्य देवा हैं ! इसीलिये “शिंगणापुर” शनिधाम महाराष्ट्र में शनि देव के नाम पर प्रतीक रूप में मात्र एक काले पत्थर की स्थापित की गयी है, न कि शनि देव के किसी मूर्ति की !

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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