क्या वैश्वीकरण की इच्छा ही हमारे विनाश का कारण है : Yogesh Mishra

मेरी बात सुनने में आपको अटपटी लग सकती है लेकिन यह सच है कि आज सदियों से जो हम अपने अस्तित्व को बचा कर रख पाये हैं, इसका मूल कारण हमारी आत्म केन्द्रित जीवन शैली !

भारतीय सनातन संस्कृति में सदैव से छोटे-छोटे गांव के निर्माण की व्यवस्था रही है ! कुछ बड़े-बड़े नगर मात्र बड़े व्यवसाई केंद्र के रूप में जाने जाते थे ! जहां से राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय व्यापार किया जाता था !

किंतु भारत का मूल निवासी छोटे-छोटे स्व केंद्रित गांव में ही निवास करता था ! वहीं पर बच्चों को पढ़ाने के लिये गुरुकुल हुआ करते थे ! चिकित्सा के लिये वैध हुआ करते थे ! स्वरोजगार के लिये परंपरागत पिता अपने पुत्र को या गुरु अपने शिष्य को प्रशिक्षित किया करता था ! जीवन निर्वाह की समस्त सामग्री अन्न, कपड़ा, घर आदि सभी कुछ उसे उसके गांव में ही उपलब्ध होता था ! पक्की सड़कें भी इतनी विकसित नहीं थी कि व्यक्ति दूर-दूर की यात्रा कर सके ! वाहन की सुविधा नहीं थी और संचार तकनीक का भी आधुनिक स्वरूप विकसित नहीं था !

किंतु इतना सब न होने के बाद भी समाज में न तो किसी तरह का कोई आभाव था और न ही कहीं कोई असुरक्षा थी ! वाह्य आक्रमणों के लिये क्षेत्र का राजा सेना रखता था ! जैसे आजकल मिलिट्री देश की रक्षा करती है !

छोटे-छोटे ग्रामों का समूहों का एक मौजा हुआ करता था ! जिसकी अपनी निजी क्षेत्रीय भाषा होती थी ! जिससे एक मौजा का व्यक्ति दूसरी मौजा में घुसकर अपराध नहीं कर पाता था और हर मौजा का हर व्यक्ति एक दूसरे व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से जानता था ! जिससे अपने मौजा के अंदर अपराध होने की संभावना शुन्य हो जाती थी !

इसके बाद भी यदि कोई अपराध कर ही देता था, तो गांव के 5 बड़े लोग बैठकर उस अपराधी का दंड अपराध के अनुरूप निर्धारित कर देते थे ! इसके लिये किसी भी कोर्ट कचहरी जाने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती थी और यदि पंचायत कोई भी गलत निर्णय करता था, तो मौजा के लोग उस पंच का बहिष्कार कर देते थे और पूरा प्रकरण अंतिम अदालत राजा के समक्ष पेश किया जाता था, जहाँ राजा तत्काल उसमें निर्णय देता था !

शादी विवाह भी मौजा के अंदर ही स्थापित गांव में हुआ करती थी ! जिससे हर व्यक्ति को अपने रिश्तेदारों के विषय में पूरी जानकारी होती थी ! चारित्रिक रूप से जो परिवार गड़बड़ होते थे, उनके यहां लोग अपने रोटी और बेटी का संबंध नहीं रखते थे ! जिससे समाज में लोग अपने आपको चरित्रवान बनाये रखने के लिये बाध्य हुआ करते थे !

अलग-अलग मौजा के भाषांतर के कारण एक मौजा का व्यक्ति जब दूसरे मौजा में अपराध करने की नियत से जाता था, तो उस अपरिचित व्यक्ति के मात्र वाणी की शैली से गांव का कोई भी व्यक्ति पहचान जाता था और पूरा गांव मिलकर उसे पकड़ कर पंचायत के सामने पेश कर देता था !

गांव में वस्तु विनिमय का चलन था ! जिस वजह से कोई भी व्यक्ति अति संग्रह की प्रवृत्ति नहीं रखता था ! जिसके पास जो कुछ होता था, वह दूसरों को देकर अपने आवश्यकता की वस्तु ले लेता था और यदि आभाव है तब भी समाज के जिम्मेदार लोग मिलकर उस अभावग्रस्त व्यक्ति की बेसिक आवश्यकता की वस्तुयें उसे उपलब्ध करवा दिया करते थे ! यही सामाजिक सहयोग था ! जिससे हर व्यक्ति समाज के नियमों का पालन करता था !

पहले तो सभी बच्चे गांव के गुरुकुल में ही पढ़ा करते थे, लेकिन यदि कोई बच्चा अति मेधावी होता था, तो उसे तक्षशिला या नालंदा जैसे महाविद्यालय में राजकीय खर्चे पर पढ़ने के लिये भेजा जाता था ! जिसका पूरा दायित्व राजा का होता था ! अतः माता-पिता के ऊपर यह दबाव नहीं होता था कि वह अपने बच्चे को कैसे शिक्षित करेंगे !

परंपरागत स्वरोजगार के कारण समाज में शत-प्रतिशत रोजगार उपलब्ध था ! व्यक्ति अपना कृषि कार्य करता था और बचे हुये समय में अपने हुनर के अनुसार अपना स्वरोजगार करता था ! स्वरोजगार में उत्पादित वस्तुओं का विक्रय अपने गांव या मौजा में ही हो जाया करता था लेकिन यदि उससे अधिक वस्तु का उत्पादन हो गया तो वह निकट के नगर के व्यवसाय केंद्र पर बिक जाता था और व्यक्ति को आवश्यकता का धन प्राप्त हो जाता था !

किंतु अंग्रेजों के आने के साथ-साथ भारत में वैश्वीकरण का भी दौर आरंभ हो गया ! लोग कहते हैं कि विश्व में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद वैश्वीकरण का दौर शुरू हुआ लेकिन यह सूचना गलत है ! भारत में वैश्वीकरण का दौर ईस्ट इंडिया कंपनी के निर्माण के साथ ही शुरू हो गया था ! जब अंग्रेज व्यापार करने के बहाने भारत आये थे !

इस वैश्वीकरण के दौर ने अपने लाभ के लिये अलग-अलग चरणों में अलग-अलग तरीके से हमारी सामाजिक संरचना को तोड़ा और आधुनिकता शिक्षा और संपन्नता के नाम पर हमारी सामाजिक संरचना को पूरी तरह से नष्ट कर दिया ! हमें प्रतिस्पर्धा के नाम पर आपस में लड़वाया और बिखेर कर रख दिया ! इसीलिये आज इस वैश्वीकरण के दौर में अब हम संवेदनशील समाज में नहीं बल्कि एक संवेदनाविहीन भीड़ में रहते हैं !

और यह वैश्वीकरण के दौर का ही प्रभाव है कि हम नित्य प्रति अपनी संस्कृति से दूर होते चले जा रहे हैं और अपने सर्वनाश को आमंत्रित कर रहे हैं ! तरह-तरह के महायुद्ध, छद्म युद्ध, अर्थ युद्ध, जैविक युद्ध हो रहे हैं ! जो सब इसी वैश्वीकरण की संस्कृति का ही परिणाम हैं !

इस वैश्वीकरण के प्रभाव में आज न तो हम सुरक्षित हैं, न ही हमारा समाज सुरक्षित है और न ही हमारी प्राकृतिक संपदा सुरक्षित है और न ही राष्ट्र ही सुरक्षित है ! इसलिये इस वैश्वीकरण के दृष्टिकोण से वापस अपने सनातन जीवन शैली की ओर मुड़ना होगा ! वरना न यह विश्व बचेगा और न हम बचेंगे !!

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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