तैरने वाले पत्थरों से बना रहस्यमयी रामप्पा शिव मंदिर : Yogesh Mishra

सन 1213 में वारंगल, आंध्र प्रदेश के काकतिया वंश के महाराजा गणपति देव को एक शिव मंदिर बनाने का विचार आया ! उन्होनें अपने शिल्पकार रामप्पा को ऐसा मंदिर बनाने को कहा जो वर्षों तक टिका रहे ! रामप्पा ने की अथक मेहनत और शिल्प कौशल ने आखिरकार मंदिर तैयार कर दिया !

जो दिखने में बहुत ही खूबसूरत था, राजा बहुत प्रसन्न हुये और मंदिर का नाम उन्होने उसी शिल्पी के ही नाम पर रख दिया ” रामप्पा मंदिर” यह शायद विश्व का एक मात्र मंदिर हे जिसका नाम भगवान के नाम न होकर उसके शिल्पी के नाम पर है ! यह “राम लिंगेश्वर मंदिर” आन्ध्र प्रदेश के वरंगल से 70कि. मी दूर पालम पेट में स्थित है !

कुछ वर्षों पहले लोगो को ध्यान में आया कि यह मंदिर इतना पुराना है फ़िर भी यह टूटता क्यों नहीं जब कि इस के बाद में बने मंदिर खंडहर हो चुके है ! यह बात पुरातत्व वैज्ञानिकों के कान में पड़ी तो उन्होने पालमपेट जा कर मंदिर कि जाँच की तो पाया कि मंदिर वाकई अपनी उम्र के हिसाब से बहुत मजबूत है !

काफ़ी कोशिशों के बाद भी विशेषज्ञ यह पता नहीं लगा सके कि उसकी मज़बूती का रहस्य क्या है, फ़िर उन्होनें मंदिर के पत्थर के एक टुकड़े को काटा तो पाया कि पत्थर वजन में बहुत हल्का हे, उन्होने पत्थर के उस टुकड़े को पानी में डाला तो वह टुकड़ा पानी में तैरने लगा यानि यहाँ आर्किमिडिज का सिद्धांत गलत साबित हो गया !

तब जाकर मंदिर की मज़बूती का रहस्य पता लगा कि और सारे मंदिर तो अपने पत्थरों के वजन की वजह से टूट गये थे, पर रामप्पा मंदिर के पत्थरों में तो वजन बहुत कम हे इस वजह से मंदिर टूटता नहीं !

भारत वर्ष के हिन्दू मंदिर की भव्यता देखो !मन्दिर का हर एक चित्र ध्यान से देखिए आपको इसकी भव्यता साफ साफ दिखाई देगी !

इस मंदिर की मूर्तियों और छत के अंदर जो पत्थर उपयोग किया गया है वह है बेसाल्ट जो कि पृथ्वी पर सबसे मुश्किल पत्थरों में से एक है इसे आज की आधुनिक डायमंड इलेक्टोन मशीन ही काट सकती है ! वह भी केवल 1 इंच प्रति घंटे की दर से मात्र !

अब आप सोचिये कैसे इन्होंने 900 साल पहले इस पत्थर पर इतनी बारीक कारीगरी की है ! यहां पर एक नृत्यांगना की मूर्ति भी है ! जिसने हाई हील पहनी हुई है ! सबसे ज्यादा अगर कुछ आश्चर्यजनक है वह है इस मंदिर की छत यहां पर इतनी बारीक कारीगरी की गई है जिसकी सुंदरता देखते ही बनती है !

मंदिर की बाहर की तरफ जो पिलर लगे हुये हैं ! उन पर कारीगरी देखिये ! दूसरा उन की चमक और लेवल में कटाई कितनी बारीकी से की गयी है ! मंदिर के प्रांगण में एक नंदी भी है जो भी इसी पत्थर से बना हुआ है और जिसकी ऊंचाई नौ फीट है ! उस पर जो कारीगरी की हुई है वह भी अपने आप में बहुत अद्भुत है !

जब पुरातात्विक टीम जब यहां पहुंची तो वह इस मंदिर की शिल्प कला और कारीगिरी से बहुत ज्यादा प्रभावित हुई लेकिन वह एक बात समझ नहीं पा रहे थे कि यह पत्थर क्या है और इतने लंबे समय से कैसे टिका हुआ है ! पत्थर इतना सख्त होने के बाद भी बहुत ज्यादा हल्का है और वह पानी में तैर सकता है ! इसी वजह से आज इतने लंबे समय के बाद भी मंदिर को किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुंची है !

यह सब आज के समय में करना असंभव है ! इतनी अच्छी टेक्नोलॉजी होने के बाद भी तो 900 साल पहले क्या इनके पास क्या मशीनरी रही होगी ! क्या उस समय की टेक्नोलॉजी आज से भी ज्यादा आगे थी !

यह सब इस वजह से संभव था कि उस समय वास्तु शास्त्र और शिल्पशास्त्र से जुड़ा हुआ बहुत सा व्यावहारिक ज्ञान उपलब्धि था ! जिनके माध्यम से ही यह निर्माण संभव हो पाया होगा ! उस समय के जो इंजीनियर थे ! उनको इस बारे में लंबा व्यावहारिक अनुभव था क्योंकि सनातन संस्कृति के अंदर यह सब लंबे समय से किया जाता रहा है !

मंदिर का नाम इसके शिल्पी “रामप्पा” के नाम पर रखा हुआ है ! क्योंकि उस समय के राजा शिल्पी के काम से बहुत ज्यादा खुश हुये और उन्होंने इस मंदिर का नाम शिल्पी के नाम पर ही रख दिया !

यह मंदिर भीषण आपदाओं को झेलने के बाद भी आज तक सुरक्षित है ! छह फीट ऊंचे प्लैटफॉर्म पर बने इस मंदिर की दीवारों पर महाभारत और रामायण के दृश्य उकेरे हुये हैं ! यह रामायण और महाभारत के दृश्य एक ही पत्थर पर उकेरे गये हैं, वह भी मात्र छीनी हथोड़े से ! आप बनाते समय की कल्पना कीजिये कि एक हथौड़ा गलत पड़ा और महीनों-वर्षों का श्रम नष्ट ही जाती होगी !

आज तक इस मंदिर में कोई क्षति नही हुई है ! मंदिर के न टूटने की बात जब पुरातत्व विज्ञानियों को पता चली तो उन्होंने मंदिर की जांच की ! पुरातत्व विज्ञानी अपनी जांच के दौरान काफी प्रयत्नों के बाद भी मंदिर के इस रहस्य का पता लगाने में सफल नहीं हुये !

बाद में जब पुरातत्व विज्ञानियों ने मंदिर के पत्थर को काटा तब पता चला कि यह पत्थर वजन में काफी हल्के हैं ! उन्होंने पत्थर के टुकड़े को पानी में डाला तो वह टुकड़ा पानी में तैरने लगा ! तब पानी में तैरते पत्थर को देखकर मंदिर के रहस्य पता चला !

इस मंदिर का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि इस मंदिर में जो पत्थर लगे हैं ! वह पत्थर विश्व के किसी कोने में नही मिलते हैं ! यह पत्थर कहाँ से लाये गये होंगे यह आज तक पता नही चल सका है !

हम सबको मिलकर अपने भारत के इस अमूल्य धरोहरों का प्रचार जन-जन तक करना चाहिये ! इसका जितना प्रचार होगा ! पूरे विश्व में भारत का गौरव उतना ही बढ़ेगा ! याद रखिये कि हमारी सनातन संस्कृति महान है ! उस पर गर्व कीजिये !!

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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