नाग कुल का तात्पर्य सर्प नहीं मनुष्य है : Yogesh Mishra

लोग नाग का तात्पर्य किसी बड़े आकर के सांप से लगते हैं ! जबकि ऐसा नहीं है ! नाग जाति का इतिहास भारत में प्राचीन गौरव का प्रतीक है ! नागों का नाम उसकी नाग पूजा के कारण नही, अपितु नाग को अपना कुल देवता तथा रक्षक मानने के कारण हुआ है ! बैदिक युग से ही नाग पूजा का प्रारम्भं माना जाता है ! गृह यसूपा की नाग पूजा तथा प्रचीन कोल मील आदि जातियों की नाग पूजा के स्वरूप में महा अन्तर है ! एक नाग देवताओं की पूजा है, जबकि दूसरे यथार्थ में सर्पो की पूजा है ! प्राचीन नाग जाति भारतीय आर्यों की ही एक शाखा थी !

पौराणिक आधार पर कश्यप ऋषि नागो के देवता थे ! बाद में नाग जाति एक बहुत बढ़ा समुदाय बन गया ! पुराणों एवं नागवंशीय शिलालेखों के अनुसार भोगवती नागो की राजधानी है ! प्राचीन मगध में राजगृह के निकट भी नागों का केन्द्र था ! जरासंध पर्व के अन्तरगत उस स्थानो का भी उल्लेख मिलता है, जहा लोग रहते थे ! महाभारत काल में श्रीकृष्ण ने अर्जुन तथा भीम को नागो का जो केन्द्र दिखाया था, उन स्थानो के नाम अबुर्द शत्त्रवादी, स्वास्तिक तथा मणि नाग थें ! नाग राज कपिल मुनि का आश्रम गंगा के डेल्टा के निकट था !

नागकन्या उपली के पिता नागराज कौरव्य की राजधानी गंगाद्वार या हरद्वार थी ! भाद्रवाह, जम्मु, कांगड़ा आदि पहाड़ो देशो में जो नाग राजाओं की मूर्तिया पायी जाती है ! वह बहुदा प्राचीन है ! यद्यपि यह बताना आज भी कठिन है कि वासुकी, तक्षक नाग या तरंगनाग, शेषनाग आदि नागराजाओं की यह मूर्तिया वास्तविक प्रतीक है या स्थानीय व्यक्तियों ने इन्हे देवता मानकर इनकी मूर्तियों की स्थापना की ! कितनी शताब्दियों से इनकी पूजा होती चली आ रही है, यह बता पाना भी प्रायः कठिन है ! यद्यपि प्राचीन भारत की नाग जातियों का इतिहास अभी पूर्णतः स्पष्ट नही है, फिर भी इतना तो कहा जा सकता है कि उनके वंश में आर्यों की भाति ऋषि, मुनि, ब्राहमण, क्षत्रिय आदि का समावेश था !

कुछ शिलालेखो के माध्यम से उनका कश्यप गोत्रीय होना भी स्पष्ट होता है ! नागो के आवास स्थल पर के सम्बन्ध में ‘खण्डव दहन पर्व‘ महाभारत से जानकारी प्राप्त होती है ! नाब जाति अत्यंत प्रभुता सुपन्न थी ! भारत के विभिन्न स्थानो में उनके आवासीय ध्वंसावशेष इस बात का प्रमाण है ! वह शक्तिशाली होने के साथ साथ कुशल नाविक भी थे ! इनकी सहायता से देवों ने समुद्र पार किया था ! आज भी नाग पंचमी के त्योहार में श्रद्धा भाव के साथ उनकी पूजा करते है !

हमारे धर्म ग्रंथो में शेषनाग, वासुकि नाग, तक्षक नाग, कर्कोटक नाग, धृतराष्ट्र नाग, कालिया नाग आदि नागो का वर्णन मिलता है ! आज हम आपको इस लेख में इन सभी नागो के बारे में विस्तार से बताएंगे ! लेकिन सबसे पहले हम आपको इन पराकर्मी नागों के पृथ्वी पर जन्म लेने से सम्बंधित पौराणिक कहानी सुनाते है !

इन नागो से सम्बंधित यह कथा पृथ्वी के आदि काल से सम्बंधित है ! इसका वर्णन वहदव्यास जी ने भी महाभारत के आदि पर्व में किया है ! महाभारत के आदि पर्व में इसका वर्णन होने के कारण लोग इसे महाभारत काल की घटना समझते है, लेकिन ऐसा नहीं है ! महाभारत के आदि काल में कई ऐसी घटनाओं का वर्णन है जो की महाभारत काल से बहुत पहले घटी थी लेकिन उन घटनाओ का संबंध किसी न किसी तरीके से महाभारत से जुड़ता है, इसलिये उनका वर्णन महाभारत के आदि पर्व में किया गया है !

नागो के उत्पत्ति के पौराणिक इतिहास में वर्णन आता है कि कद्रू और विनता दक्ष प्रजापति की पुत्रियाँ थीं और दोनों कश्यप ऋषि को ब्याही थीं ! एक बार कश्यप मुनि ने प्रसन्न होकर अपनी दोनों पत्नियों से वरदान माँगने को कहा ! कद्रू ने एक सहस्र पराक्रमी सर्पों की माँ बनने की प्रार्थना की और विनता ने केवल दो पुत्रों की किन्तु दोनों पुत्र कद्रू के पुत्रों से अधिक शक्तिशाली पराक्रमी और सुन्दर हों ! कद्रू ने 1000 अंडे दिये और विनता ने दो ! समय आने पर कद्रू के अंडों से 1000 सर्पों का जन्म हुआ !

पुराणों में कई नागो खासकर वासुकी, शेष, पद्म, कंबल, कार कोटक, नागेश्वर, धृतराष्ट्र, शंख पाल, कालाख्य, तक्षक, पिंगल, महा नाग आदि का काफी वर्णन मिलता है !

किन्तु यथार्थ घटना के अनुसार कद्रू के बेटों में सबसे पराक्रमी शेषनाग थे ! इनका एक नाम अनन्त भी है ! शेषनाग ने जब देखा कि उनकी माता व भाइयों ने मिलकर विनता के साथ छल किया है तो उन्होंने अपनी मां और भाइयों का साथ छोड़कर गंधमादन पर्वत पर तपस्या करनी आरंभ की ! उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उन्हें वरदान दिया कि तुम्हारी बुद्धि कभी धर्म से विचलित नहीं होगी !

ब्रह्मा ने शेषनाग को यह भी कहा कि यह पृथ्वी निरंतर हिलती-डुलती रहती है, अत: तुम इसे अपने फन पर इस प्रकार धारण करो जिससे कि यह स्थिर हो जाये ! इस प्रकार शेषनाग ने संपूर्ण पृथ्वी को अपने फन पर धारण कर लिया ! क्षीरसागर में भगवान विष्णु शेषनाग के आसन पर ही विराजित होते हैं ! धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण व श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम शेषनाग के ही अवतार थे !

धर्म ग्रंथों में वासुकि को नागों का राजा बताया गया है ! यह भी महर्षि कश्यप व कद्रू की संतान थे ! इनकी पत्नी का नाम शतशीर्षा है ! इनकी बुद्धि भी भगवान भक्ति में लगी रहती है ! जब माता कद्रू ने नागों को सर्प यज्ञ में भस्म होने का श्राप दिया तब नाग जाति को बचाने के लिए वासुकि बहुत चिंतित हुए ! तब एलापत्र नामक नाग ने इन्हें बताया कि आपकी बहन जरत्कारु से उत्पन्न पुत्र ही सर्प यज्ञ रोक पायेगा !

तब नागराज वासुकि ने अपनी बहन जरत्कारु का विवाह ऋषि जरत्कारु से करवा दिया ! समय आने पर जरत्कारु ने आस्तीक नामक विद्वान पुत्र को जन्म दिया ! आस्तीक ने ही प्रिय वचन कह कर राजा जनमेजय के सर्प यज्ञ को बंद करवाया था ! धर्म ग्रंथों के अनुसार समुद्रमंथन के समय नागराज वासुकी की नेती बनाई गई थी ! त्रिपुरदाह के समय वासुकि शिव धनुष की डोर बने थे !

धर्म ग्रंथों के अनुसार तक्षक पातालवासी आठ नागों में से एक है ! तक्षक के संदर्भ में महाभारत में वर्णन मिलता है ! उसके अनुसार श्रृंगी ऋषि के शाप के कारण तक्षक ने राजा परीक्षित को डसा था, जिससे उनकी मृत्यु हो गयी थी ! तक्षक से बदला लेने के उद्देश्य से राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने सर्प यज्ञ किया था ! इस यज्ञ में अनेक सर्प आ-आकर गिरने लगे ! यह देखकर तक्षक देवराज इंद्र की शरण में गया !

जैसे ही ऋत्विजों (यज्ञ करने वाले ब्राह्मण) ने तक्षक का नाम लेकर यज्ञ में आहुति डाली, तक्षक देवलोक से यज्ञ कुंड में गिरने लगा ! तभी आस्तीक ऋषि ने अपने मंत्रों से उन्हें आकाश में ही स्थिर कर दिया ! उसी समय आस्तीक मुनि के कहने पर जनमेजय ने सर्प यज्ञ रोक दिया और तक्षक के प्राण बच गये ! ग्रंथों के अनुसार तक्षक ही भगवान शिव के गले में लिपटा रहता है !

कर्कोटक शिव के एक गण हैं ! पौराणिक कथाओं के अनुसार सर्पों की मां कद्रू ने जब नागों को सर्प यज्ञ में भस्म होने का श्राप दिया तब भयभीत होकर कंबल नाग ब्रह्माजी के लोक में, शंखचूड़ मणिपुर राज्य में, कालिया नाग यमुना में, धृतराष्ट्र नाग प्रयाग में, एलापत्र ब्रह्मलोक में और अन्य कुरुक्षेत्र में तप करने चले गये !

ब्रह्माजी के कहने पर कर्कोटक नाग ने महाकाल वन में महामाया के सामने स्थित लिंग की स्तुति की ! शिव ने प्रसन्न होकर कहा कि- जो नाग धर्म का आचरण करते हैं, उनका विनाश नहीं होगा ! इसके उपरांत कर्कोटक नाग उसी शिवलिंग में प्रविष्ट हो गया ! तब से उस लिंग को कर्कोटेश्वर कहते हैं ! मान्यता है कि जो लोग पंचमी, चतुर्दशी और रविवार के दिन कर्कोटेश्वर शिवलिंग की पूजा करते हैं उन्हें सर्प पीड़ा नहीं होती !

धर्म ग्रंथों के अनुसार धृतराष्ट्र नाग को वासुकि का पुत्र बताया गया है ! महाभारत के युद्ध के बाद जब युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ किया तब अर्जुन व उसके पुत्र ब्रभुवाहन (चित्रांगदा नामक पत्नी से उत्पन्न) के बीच भयंकर युद्ध हुआ ! इस युद्ध में ब्रभुवाहन ने अर्जुन का वध कर दिया ! ब्रभुवाहन को जब पता चला कि संजीवन मणि से उसके पिता पुन: जीवित हो जाएंगे तो वह उस मणि के खोज में निकला !

वह मणि शेषनाग के पास थी ! उसकी रक्षा का भार उन्होंने धृतराष्ट्र नाग को सौंप था ! ब्रभुवाहन ने जब धृतराष्ट्र से वह मणि मागी तो उसने देने से इंकार कर दिया ! तब धृतराष्ट्र एवं ब्रभुवाहन के बीच भयंकर युद्ध हुआ और ब्रभुवाहन ने धृतराष्ट्र से वह मणि छीन ली ! इस मणि के उपयोग से अर्जुन पुनर्जीवित हो गये !

श्रीमद्भागवत के अनुसार कालिया नाग यमुना नदी में अपनी पत्नियों के साथ निवास करता था ! उसके जहर से यमुना नदी का पानी भी जहरीला हो गया था ! श्रीकृष्ण ने जब यह देखा तो वह लीलावश यमुना नदी में कूद गये ! यहां कालिया नाग व भगवान श्रीकृष्ण के बीच भयंकर युद्ध हुआ ! अंत में श्रीकृष्ण ने कालिया नाग को पराजित कर दिया ! तब कालिया नाग की पत्नियों ने श्रीकृष्ण से कालिया नाग को छोडऩे के लिए प्रार्थना की ! तब श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि तुम सब यमुना नदी को छोड़कर कहीं ओर निवास करो ! श्रीकृष्ण के कहने पर कालिया नाग परिवार सहित यमुना नदी छोड़कर कहीं ओर चला गया !

इस तरह सिद्ध होता है कि नाग कुल का तात्पर्य सर्प नहीं मनुष्य है ! जिसे वैष्णव साहित्यकारों और कथावाचकों ने रोचक बनाने के लिये सांप बना दिया ! इस तरह नाग से संबंधित कई बातें आज भारतीय संस्कृति, धर्म और परम्परा का हिस्सा बन गई हैं ! जैसे नाग देवता, नागलोक, नागराजा-नागरानी, नाग मंदिर, नागवंश, नाग कथा, नाग पूजा, नागोत्सव, नाग नृत्य-नाटय, नाग मंत्र, नाग व्रत और अब नाग कॉमिक्स आदि आदि !

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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