ओशो की नग्न चिकित्सा : Yogesh Mishra

ओशो मनुष्य की सभी समस्याओं का कारण मनुष्य को वैष्णव द्वारा बनाए गए वस्त्रों को मानते थे ! उनका यह कहना था कि वस्त्र हमें बेईमान बनाते हैं, क्योंकि इस सृष्टि में मनुष्य के अतिरिक्त 84 लाख योनियों में कोई भी ऐसा जीव-जंतु, पशु-पक्षी, वनस्पति आदि नहीं है, जो कृत्रिम रूप से वस्त्र पहनता हो !
ओशो का यह कहना था कि मनुष्य द्वारा वस्त्र पहनने से विचारों में जो कृतज्ञता की उत्पत्ति होती है ! उससे मनुष्य आडंबर में प्रवेश कर जाता है और फिर वह आडंबर ही मनुष्य को अंदर से खोखला बना देता है !
और जब मनुष्य ज्यादा अधिक समय तक आडंबर में रहने का आदी हो जाता है तब मनुष्य आडंबर के कारण भयभीत रहने लगता है क्योंकि उसे सदैव यह भय होता है कि उसका आडंबर कहीं बिखर न जाए और वह संसार के सामने नंगा न हो जाये ! अर्थात उसका सत्य खुल कर सामने न आ जाये !

तब वह व्यक्ति अपने उस कृतिम आडंबर को पोषित करने के लिए तरह-तरह के झूठ बोलने लगता है और इसी झूठ से उसके अन्दर एक अपराधिक मस्तिष्क की उत्पत्ति होती है और जब एक बार मनुष्य का मस्तिष्क अपराधी हो जाता है, तो वह फिर हर क्षेत्र में, हर जगह पर, तरह तरह के अपराध करने लगता है !

अतः ओशो का यह मत था कि मानव प्रजाति के पूर्वजों ने वैष्णव जीवन शैली के प्रभाव में जबरदस्ती जो वस्त्र पहने वह मनुष्य प्रजाति की सबसे बड़ी गलती थी और जब तक उस मूल पर पुनः चोट नहीं की जाएगी, तब तक हम अपने को अंदर से आत्मविश्वास से परिपूर्ण नहीं कर सकेंगे !

क्योंकि ओशो का यह भी मानना था कि इस पृथ्वी पर सबसे कठिन काम है कि किसी भी समाज में व्यक्ति का एकदम सहज अवस्था में रहना !
इसीलिए पश्चिम के लोगों को आडंबर के भय और तनाव से मुक्त करने के लिए ओशो निरंतर उन्हें निर्वस्त्र प्राकृतिक अवस्था में रहने का अभ्यास करवाते थे !

और इसका बहुत बड़ा असर भी दिखाई दिया ! न जाने कितनों ने इस निर्वस्त्र चिकित्सा से प्रभावित होकर अपने नशे की लत को छोड़ दिया ! आत्महत्या के विचार को छोड़ दिया और उनका आत्मविश्वास इतना बढ़ गया कि वह जीवन में पुनः नए सिरे से अपने जीवन को जीने में अत्यंत सफल हुए !

क्योंकि उन्होंने यह जान लिया था कि उनकी असफलता के पीछे उनका आडंबर ही उनकी सबसे बड़ी वजह है और इस आडंबर पर आघात करने के लिए नग्न चिकित्सा अत्यंत प्रभावशाली चिकित्सा पद्धति है !

भारतीय सनातन जीवन शैली में भी संन्यास के एक विशेष प्रकार की नागा दीक्षा होती है ! जिसमें एक से एक पढ़े-लिखे डॉक्टर, इंजीनियर, अधिवक्ता, वैज्ञानिक आदि यह दीक्षा लेते हैं ! फिर वह चाहे जितने भी संपन्न परिवार के क्यों न हों ! उन्हें भी वस्त्र को संपूर्ण रूप से त्याग कर जीने का आध्यात्मिक प्रशिक्षण दिया जाता है ! जिस दीक्षा से समाज में उनका सम्मान भी बढ़ता है !

इसके पीछे भी सनातन विचारकों का यह मत है कि वस्त्र कोई सामान्य कपड़ा नहीं बल्कि यह अनेक तरह के अपराधिक विचारों को उत्पन्न करने वाला कारक तत्व है !

वैष्णव धर्म की उत्पत्ति ठंडे देशों से हुई थी ! वहां उन्हें अपनी जीवन रक्षा के लिए वस्त्र उनकी आवश्यकता थी ! जिसे काल के प्रभाव में उन्होंने फिर अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान के लिये प्रयोग करना शुरू कर दिया और पूरी दुनियां को इन्हीं वस्त्रों की चमक दमक दिखा कर अपराध में झोंक दिया ! परिणामत: मानवता को दो विश्व युद्ध झेलने पड़े ! जिससे और नये-नये तकनीकी की उत्पत्ति हुई ! जिससे और नये तरह के अपराधों की उत्पत्ति हुई !

मनोविज्ञान की दृष्टि से व्यक्ति को अवसाद और तनाव से मुक्त करने के लिए वस्त्र विहीन चिकित्सा पद्धति सबसे महत्वपूर्ण मनोविज्ञान चिकित्सा पद्धति है ! ऐसा अब अवसाद पर काम करने वाले वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं !!

अपने बारे में कुण्डली परामर्श हेतु संपर्क करें !

योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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