भगवान श्री कृष्ण के तेजस्वी व्यक्तित्व को नष्ट करने के लिये अकबर ने शुरू करवाई थी “रासलीला” !

भगवान श्री कृष्ण के जीवन परिचय के संदर्भ में दो ही प्रमाणिक ग्रंथ माने जाते हैं, जो कि उनके समकालीन श्री वेदव्यास द्वारा रचित हैं ! पहला प्रमाणिक ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण है और दूसरा प्रमाणिक ग्रंथ महाभारत है ! इसमें से श्रीमद्भागवत पुराण के अंदर भगवान श्री कृष्ण की बाल अवस्था के सारे कार्यों और कृतियों का वर्णन है !

इसके उपरांत भगवान जब वृंदावन छोड़ कर मथुरा चले गए और मथुरा से द्वारिका धीश बन गए तो उनकी बाल्यावस्था के आगे का समस्त वृतांत महाभारत ग्रंथ के अंदर उपलब्ध है ! इन दोनों ग्रंथों के अतिरिक्त अन्य किसी भी ग्रंथ को सहायक ग्रंथ तो माना जा सकता है किंतु प्रमाणिक ग्रंथ नहीं माना जा सकता है ! अत: इस पूरे लेख को लिखने का उद्देश्य भगवान श्री कृष्ण जैसे व्यक्ति के ऊपर जो अनर्गल ग्रंथ के लेखकों द्वारा तरह तरह के आरोप लगाए गये हैं, उनकी सही स्थिति को आपके समक्ष रखना है !

उपरोक्त प्रमाणिक ग्रन्थों में “राधा” का वर्णन कहीं भी किसी भी स्थान पर भगवान श्री कृष्ण की नायिका के रूप में नहीं आता है और न ही ऐसा कोई वर्णन आता है, जिससे यह सिद्ध होता है कि भगवान श्री कृष्ण ने राधा के साथ कोई रासलीला की थी या राधा उनके वियोग में दर-दर भटकती रही और भगवान श्री कृष्ण संपन्नता और मस्ती का जीवन यापन करते रहे !

उक्त ग्रंथ के अंदर भगवान श्री कृष्ण को एक अत्यंत तेजस्वी योद्धा के रूप में वर्णित किया गया है ! ज्ञान के प्रकांड ज्ञाता, राजनीति के धुरंधर और समाज में अत्यंत प्रतिष्ठित व्यक्तित्व के रूप में उक्त दोनों ग्रंथों में भगवान श्री कृष्ण का वर्णन मिलता है !

किंतु मुगल तथा अंगेजों के काल में हिन्दुओं का भारत के सनातन देवी देवताओं के ऊपर से विश्वास खत्म हो, इसके लिए अनेक प्रकार के षड्यंत्र किये गये उनमें से एक षड्यंत्र यह भी है कि भगवान श्री कृष्ण के तेजस्वी व्यक्तित्व को नष्ट करने के लिए तरह-तरह के अनर्गल साहित्य का लेखन तथा “रासलीला” की शुरुआत अकबर ने तानसेन के गुरु सन्त शिरोमणि हरिदास जी को भ्रमित करके करवाया गया था ! जिन्होंने भगवान श्री कृष्ण के साथ कृतिम काल्पनिक नायिका “राधा” को जोड़ कर “सखी संप्रदाय” की उत्पत्ति की और उन्ही बात को अंग्रजों के शासनकाल में पुराणों का अंश घोषित कर दिया गया !

आज इस पूरे के पूरे लेख के माध्यम से मैं यह बताना चाहता हूं कि भगवान श्री कृष्ण ने कब, किस उम्र में, कहां पर, क्या-क्या कार्य किये, जिसके द्वारा भगवान श्री कृष्ण के व्यक्तित्व पर लगाए जाने वाले अनर्गल आरोपों से लोगों को जागरूक किया जा सके !

आप मेरे इस विस्तृत लेख को धैर्य के साथ पढ़ें तो आप स्वयं इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे, कि समाज में भगवान श्रीकृष्ण को लेकर जो चर्चाएं हैं वह उनके व्यक्तित्व को नष्ट करने के लिए गढ़ी गई हैं क्योंकि भगवान श्री कृष्ण जैसा तेजस्वी व्यक्तित्व हमेशा पैशाची संस्कृति के लिये अनादि काल से समस्या रहा है ! जो धर्म की स्थापना व अधर्म के विनाश की प्रेरणा देता है ! इसी भय के कारण भगवान श्री कृष्ण के तेजस्वी व्यक्तित्व को नष्ट करने के लिए इस तरह का अनर्गल लेखन करवाया गया था !

भगवान् श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था जो 5 मास, 4 दिन और पीछे पड़ता है; इसलिए अंग्रेज़ी महीने के हिसाब से यह समय 21 जुलाई निकलता है। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण का जन्मदिवस श्रीमुख संवत्सर, भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र, तदनुसार 21 जुलाई, बुधवार और वर्ष 3228 ई.पू. निश्चित होता है। भगवान् श्रीकृष्ण के जन्म से ही ‘श्रीकृष्ण संवत्’ प्रचलित है जिसका आजकल 3228+2018 = 5246वाँ वर्ष चल रहा है !

और भगवान् श्रीकृष्ण 125 वर्षों से अधिक समय तक जीवित रहे थे ! 28वें कलियुग के प्रारम्भ होने की तिथि माघ शुक्ल पूर्णिमा, तदनुसार 18 फरवरी, शुक्रवार और वर्ष 3102 ई.पू. (युधिष्ठिर संवत् 37) ही भगवान् श्रीकृष्ण के स्वर्गारोहण की भी तिथि है।

सटीक कालगणना-
• 3228 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् 1, आयु : 0 दिन : श्रीमुख संवत्सर, भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, 21 जुलाई, बुधवार : मथुरा में कंस के कारागार में देवकी के गर्भ से जन्म, पिता-वसुदेव; उसी दिन वसुदेव के द्वारा में नन्द-यशोदा के गोकुल स्थानांतरण; आयु : 6 दिन : भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी, 27 जुलाई, मंगलवार, षष्ठी-स्नान, कंस की सेविका पूतना का वध; आयु : 3 माह : मार्गशीर्ष : शकट-भंजन।

• 3227 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् 1, आयु : 5 माह, 20 दिन : माघ शुक्ल चतुर्दशी, अन्नप्राशन-संस्कार; श्रीकृष्ण संवत् 2, आयु : 1 वर्ष : त्रिणिवर्त का वध।

• 3226 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् 3, आयु : 2 वर्ष : महर्षि गर्गाचार्य द्वारा नामकरण-संस्कार।

• 3225 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् 3, आयु : 2 वर्ष 6 माह : चैत्र, यमलार्जुन (नलकूबर और मणिग्रीव) उद्धार; आयु : 2 वर्ष, 10 माह : आषाढ़, गोकुल से वृन्दावन जाना।

• 3224 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् 5, आयु : 4 वर्ष : वत्सासुर और बकासुर का वध।

• 3223 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् 6, आयु : 5 वर्ष : अघासुर का वध; आयु : 5 वर्ष : ब्रह्माजी का गर्व-भंग; भाद्रपद कृष्ण एकादशी : कालिय मर्दन और दावाग्नि-पान; आयु : 5 वर्ष, 3 माह : मार्गशीर्ष : गोपियों का चीर-हरण।

• 3222 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 6, आयु : 5 वर्ष, 8 माह : ज्येष्ठ-आषाढ़ : यज्ञ-पत्नियों पर कृपा।

• 3221 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 8, आयु : 7 वर्ष, 2 माह, 7 दिन : कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा : गोवर्धन पूजा; कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से सप्तमी : गोवर्धन धरणकर इन्द्र का गर्व भंग; आयु : 7 वर्ष, 2 माह, 14 दिन : कार्तिक शुक्ल अष्मी : कामधेनु द्वारा अभिषेक, भगवान् का नाम ‘गोविन्द’ पड़ा; आयु : 7 वर्ष, 2 माह, 18 दिन : कार्तिक शुक्ल द्वादशी : नन्दजी को वरुणलोक से छुड़ाकर लाना।

• 3220 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 9, आयु : 8 वर्ष, 1 माह, 21 दिन : आश्विन शुक्ल पूर्णिमा : गोपियों के साथ रासलीला।

• 3219 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 9, आयु : 8 वर्ष, 6 माह, 5 दिन : फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी : सुदर्शन गन्धर्व का उद्धार; आयु : 8 वर्ष, 6 माह, 21 दिन : फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा : शंखचूड़ दैत्य का वध; श्रीकृष्ण संवत् : 10, आयु : 9 वर्ष : अरिष्टासुर (वृषभासुर) और केशी दैत्य का वध, भगवान् का नाम ‘केशव’ पड़ा।

• 3218 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 11, आयु : 10 वर्ष, 2 माह, 20-21 दिन : कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी : मथुरा में धनुर्भंग; कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा : मथुरा में कंस का वध, कंस के पिता उग्रसेन का मथुरा के सिंहासन पर राज्याभिषेक।

• 3217 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 12 : आयु : 11 वर्ष : अवन्तिका में सांदीपनि मुनि के गरुकुल में 126 दिनों में छः अंगों सहित संपूर्ण वेदों, गजशिक्षा, अश्वशिक्षा और धनुर्वेद (कुल 64 कलाओं) का ज्ञान प्राप्त किया, पञ्चजन दैत्य का वध एवं पाञ्चजन्य शंख-धरण, सांदीपनि मुनि को गुरु-दक्षिणा।

• 3216 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 13, आयु : 12 वर्ष : उपनयन (यज्ञोपवीत)-संस्कार।

• 3216-3200 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 13-19, आयु : 12-28 वर्ष : मथुरा में जरासन्ध को 17 बार पराजित किया; श्रीकृष्ण संवत् : 29 , आयु : 28 वर्ष : रत्नाकर (सिंधुसागर) पर द्वारका नगरी की स्थापना, मथुरा में कालयवन की सेना का संहार।

• 3199-3191 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 30-38, आयु : रुक्मिणी-हरण, द्वारका में रुक्मिणी से विवाह, स्यमन्तक मणि-प्रकरण, जाम्बवती, सत्यभामा एवं कालिन्दी से विवाह, केकय देश की कन्या भद्रा से विवाह, मद्र देश की कन्या लक्ष्मणा से विवाह; कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी : प्राग्ज्योतिषपुर में नरकासुर का वध, नरकासुर की कैद से 16,100 कन्याओं को मुक्तकर द्वारका भेजा, अमरावती में इन्द्र से अदिति के कुंडल प्राप्त किए, इन्द्रादि देवताओं को जीतकर पारिजात वृक्ष (कल्पवृक्ष) द्वारका लाए, नरकासुर से छुड़ायी गयी 16,100 कन्याओं से द्वारका में विवाह, शोणितपुर में बाणासुर से युद्ध, उषा और अनिरुद्ध के साथ द्वारका लौटे; पौण्ड्रक, काशीराज, उसके पुत्र सुदक्षिण और कृत्या का वध तथा काशी-दहन।

• 3190 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 39, आयु : 38 वर्ष 4 माह 17 दिन : पौष शुक्ल एकादशी : द्रौपदी-स्वयंवर में पांचाल राज्य में उपस्थित।

• 3189-3183 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 40-46, आयु : 39-45 वर्ष : विश्वकर्मा से कहकर पाण्डवों के लिए इन्द्रप्रस्थ का निर्माण।

• 3157 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 72, आयु : 71 वर्ष : सुभद्रा-हरण में अर्जुन की सहायता।

• 3155 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 74, आयु : 73 वर्ष : श्रावण, इन्द्रप्रस्थ में खाण्डव वन-दाह में अग्नि और अर्जुन की सहायता, मय दानव को सभाभवन-निर्माण के लिए आदेश।

• 3153 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 76, आयु : 75 वर्ष : धर्मराज युधिष्ठिर के राजसूय-यज्ञ के निमित्त इन्द्रप्रस्थ-आगमन; आयु : 75 वर्ष 2 माह 20 दिन : कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी : जरासन्ध-वध में भीम की सहायता; आयु : 75 वर्ष 3 माह : जरासन्ध के कारागार से 20,800 राजाओं को मुक्त किया, मगध के सिंहासन पर जरासन्ध-पुत्र सहदेव का राज्याभिषेक।

• 3152 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 76, आयु : 75 वर्ष 6 माह 9 दिन : फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा : राजसूय-यज्ञ में अग्रपूजित, शिशुपाल का वध; आयु : 75 वर्ष 7 माह : द्वारका में शिशुपाल के भाई शाल्व का वध; आयु : 75 वर्ष 10 माह 24 दिन : श्रावण कृष्ण तृतीया : प्रथम द्यूत-क्रीड़ा में द्रौपदी की लाज-रक्षा; आयु : 75 वर्ष 11 माह : श्रावण : वन में पाण्डवों से भेंट, सुभद्रा और अभिमन्यु को साथ ले द्वारका-प्रस्थान।

• 3139 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 90, आयु : 89 वर्ष 1 माह 17 दिन : आश्विन शुक्ल एकादशी : अभिमन्यु और उत्तरा के विवाह में बारात लेकर विराटनगर पहुँचे; आयु : 89 वर्ष 2 माह : कार्तिक : विराट की राजसभा में कौरवों के अत्याचारों और पाण्डवों के धर्म-व्यवहार का वर्णन करते हुए किसी सुयोग्य दूत को हस्तिनापुर भेजने का प्रस्ताव, द्रुपद को सौंपकर द्वारका-प्रस्थान, द्वारका में दुर्योधन और अर्जुन— दोनों की सहायता की स्वीकृति, अर्जुन का सारथ्य-कर्म स्वीकार करना; आयु : 89 वर्ष 2 माह 8 दिन : कार्तिक शुक्ल द्वितीया, रेवती नक्षत्र, मैत्र मुहूर्त : पाण्डवों का सन्धि-प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर प्रस्थान; आयु : 89 वर्ष 2 माह 19 दिन : कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी : सन्धि-प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर पहुँचे; आयु : 89 वर्ष 3 माह : मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी : राजसभा में अपने विश्वरूप का प्रदर्शन; मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी से चतुर्दशी : कर्ण को पाण्डवों के पक्ष में आने के लिए समझाना; आयु : 89 वर्ष 3 माह 17 दिन : मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी : कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को ‘भगवद्गीता’ का उपदेश; आयु : 89 वर्ष 4 माह : मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी से पौष कृष्ण अमावस्या : महाभारत-युद्ध में अर्जुन के सारथी, युद्ध में पाण्डवों की अनेक प्रकार से सहायता।

• 3138 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 90, आयु : 89 वर्ष 4 माह 7-8 दिन : पौष शुक्ल प्रतिपदा : अश्वत्थामा को 3,000 वर्षों तक जंगल में भटकने का शाप; पौष शुक्ल द्वितीया : गान्धारी द्वारा शाप-प्राप्ति; आयु : 89 वर्ष 7 माह 7 दिन : चैत्र शुक्ल प्रतिपदा : धर्मराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक।

• 3137-3136 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 91-92, युधिष्ठिर संवत् 2-3, आयु : 91-92 वर्ष : धर्मराज युधिष्ठिर के अश्वमेध-यज्ञ में सम्मिलित।

• 3102 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् : 126, युधिष्ठिर संवत् 37, आयु : 125 वर्ष 4 माह : द्वारका में यदुवंश का विनाश; आयु : 125 वर्ष 5 माह : माघ : उद्धव मुनि को उपदेश; आयु : 125 वर्ष 5 माह 21 दिन : बहुधान्य संवत्सर, माघ शुक्ल पूर्णिमा, 18 फरवरी, शुक्रवार, दोपहर 2:27:30 बजे : प्रभास क्षेत्र में स्वर्गारोहण, 28वें कलियुग का प्रारम्भ।

इस तरह भगवान श्री कृष्ण के संपूर्ण जीवन परिचय को देखने के बाद यह निष्कर्ष निकलता है कि वह व्यक्तित्व जीवन भर अन्याय और अधर्म के खिलाफ लड़ता रहा ! असहाय और निर्बल व्यक्ति की मदद करता रहा और कभी भी अपने निजी लाभ के लिए उसने न तो किसी व्यक्ति का शोषण किया और न ही समाज का शोषण किया !

अर्थात ऐसा व्यक्तित्व जिसका संपूर्ण जीवन धर्म और न्याय की स्थापना के लिए समर्पित हो ! वह व्यक्तित्व भगवान श्री कृष्ण के चरित्र में दिखाई देता है ! उपरोक्त संपूर्ण जीवन परिचय को देखने के बाद आप स्वयं इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि भगवान श्री कृष्ण के चरित्र और व्यक्तित्व को लेकर जो उनके ऊपर झूठा, धूर्त, मक्कार, कूटनीतिक, महिला पसंद, भोगी विलासी होने का आरोप लगाया जाता है, वह सभी के सभी आरोप निराधार हैं और न ही उनके जीवन में कहीं राधा का वर्णन मिलता है !

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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