जानिये आध्यात्मिक ऊर्जा क्या है, कैसे कार्य करती है ? और मनुष्य इसे कैसे प्राप्त कर सकता है ?

ऊर्जा अर्थात कार्य सम्पादन की क्षमता | भौतिक विज्ञान के अनुसार पदार्थ का एक गुण है जिसका हस्तांतरण पारस्परिक क्रियाओं द्वारा संभव है, किसी अन्य स्वरुप में रूपांतरण संभव है किन्तु उत्पत्ति और विनाश नहीं किया जा सकता है |

जैसे कि हम सभी जानते है इस ब्रह्माण्ड में जिसका भी अस्तित्व है उसका निर्माण ऊर्जा के एक निश्चित स्रोत से हुआ है | हिन्दू शास्त्रों के अनुसार ग्रह, सौर मंडल इत्यादि सभी की उत्पत्ति माँ आदिशक्ति से हुई है जो कि सर्वोच्च और अनंत ऊर्जा का प्रथम कारण है | प्रत्येक दृश्य और अदृश्य में भगवती की ऊर्जा की विभिन्न मात्रा विद्यमान है |

ऊर्जा का मुख्य रूप से प्रत्यक्षीकरण पञ्च महाभूतों – आकाश, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु के रूप में है | इन्ही के द्वारा प्रत्येक निर्माण हुआ है  |जब यह महाभूत एक दुसरे से विभिन्न मात्राओं में मिलते है तो विभिन्न प्रकार के परिमाण और गुणों वाली ऊर्जा का निर्माण होता है | ऊर्जा के विभिन्न रूपों की  एक दुसरे पर निर्भरता और निरंतर संलग्नता के कारण ऊर्जा के निर्माण, अनुरक्षण और रूपांतरण का चक्र निरंतर चलता रहता है | ऊर्जा का एक रूप जब दुसरे रूप के संपर्क में आता है तो अपना स्वभाव , स्वरुप और दिशा परिवर्तित कर लेता है | उदाहरण के लिए पौधों के विकास के लिए जल अनिवार्य है जिसको ग्रहण कर पौधा सूर्य के प्रकाश के साथ अपनी वृद्धि कर पुष्पित और पल्लवित होता है | ऑक्सीजन की उत्पत्ति होती है जिसका प्रयोग मनुष्य अपने जीवन के लिए करता है |

 

ऊर्जा के दो स्वरुप है – सकारात्मक और नकारात्मक | ऊर्जा की गति के लिए दिशाए भी दो है – उर्ध्व गति और अधोगति  | ऊर्जा के सकारात्मक  अभिलाभ, उर्ध्व्गति और उपयोग के लिए उपयुक्त प्रयासों, कुशलता, ज्ञान, संसाधन, मार्गदर्शन और दैवीय कृपा की आवश्यकता होती है |

 

ऊर्जा का हस्तांतरण एक माध्यम से दूसरे माध्यम में पंचमहाभूतों के द्वारा होता है | प्रत्येक महाभूत के जागराण अथवा प्रतिकिया के लिए एक विशेष उद्दीपन होता है, जो इस प्रकार है –

 

आकाश – शब्द

पृथ्वी – स्पर्श, गंध

जल – स्पर्श, स्वाद

अग्नि – दृष्टि

वायु – स्पर्श

 

यही कारण है सृष्टि की सभी जीव आत्माओं का ऊर्जा का क्षय और लाभ पञ्च महाभूतों के कारक स्थान नेत्र (दृष्टि), कर्ण (शब्द), जिव्हा (स्वाद), त्वचा (स्पर्श), और नासिका (महक) के द्वारा होता है | ऊर्जा की इसी प्रवृत्ति के कारण अच्छे दृश्य, देव दर्शन, मन्त्र, अगरबत्ती का धुआं सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि कर सुखद अनुभूति कराते है | इसके विपरीत वाद-विवाद, नकारात्मक व्यक्तियों का स्पर्श और उनके द्वारा दी गयी वस्तुएं ऊर्जा का क्षय करा हम को विचलित और सुस्त कर देती है |

 

कोई भी शारीरिक और मानसिक क्रिया भी ऊर्जा का ही एक रूप होती है क्योकि वह भी कम से कम दो महाभूतों के संयोग से ही संपन्न होती है | इसलिए प्रत्येक विचार, शब्द और क्रिया में एक निश्चित गुण प्रकार और मात्रा में ऊर्जा अन्तर्निहित होती है | मनुष्यों और अन्य प्राणियों जिनमे विचार की क्षमता होती है, विचार, शब्द और कार्य  के पीछे निहित धारणा ऊर्जा को गति प्रदान करती है  | अन्य कारक जैसे कि कर्म का प्रकार और उस कर्म की समयावधि, वाह्य और आन्तरिक परिस्थितियों की अनुकूलता और प्रतिकूलता और मनोबल, ऊर्जा को प्रभावित करते है |

इसी ऊर्जा का विज्ञान पूरी तरह समझने के लिए हमें गुरु की आवश्यकता होती है |

अपने बारे में कुण्डली परामर्श हेतु संपर्क करें !

योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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