ग्रंथों में सत्य कहाँ है : Yogesh Mishra

सत्य और सिद्धांत सदैव सापेक्ष होते हैं ! इनका कोई निश्चित स्वरूप नहीं होता है ! एक काल में कहा गया वाक्य सत्य हो सकता है किंतु दूसरे काल में वही वाक्य असत्य हो जाता है !

इसी तरह कर्म में कोई निश्चित सिद्धांत स्थापित नहीं किया जा सकता है ! एक काल में किसी कार्य को जिस सिद्धांत से किया जाता है और वह उचित प्रतीत होता है और दूसरे काल में उसी सिद्धांत से किया गया कार्य धर्म विरुद्ध प्रतीत होता है !

इसलिए सत्य और सिद्धांत देश, काल, परिस्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं ! जिसे भगवान राम और भगवान श्री कृष्ण दोनों ने अपने अपने अवतारों में विरोधाभासी जीवन जी कर स्वत: सिद्ध और प्रमाणित किया है !

इसलिए शास्त्रों के माया जाल में उलझ कर सत्य और सिद्धांत को नहीं जाना जा सकता है, क्योंकि जिस देश काल परिस्थिति में किसी शास्त्र का निर्माण हुआ है और जिस देश काल परिस्थिति में उस शास्त्र का परीक्षण हो रहा है ! दोनों ही अलग-अलग हैं !

इसलिए शास्त्र कभी भी, किसी भी देश, काल, परिस्थिति में प्रमाण नहीं बन सकते हैं !
अब प्रश्न यह खड़ा होता है कि फिर प्रमाण क्या है ? यह व्यवस्था कैसे चलेगी ? धर्म क्या है और अधर्म क्या है ?

इसका सीधा सा उत्तर है कि जो व्यक्ति सांसारिक लिप्तता से हटकर जब तक दृष्टा भाव से विवेकपूर्वक जागृत अवस्था में जीवन नहीं जीता, तब तक वह व्यक्ति कभी भी धर्म का अनुकरण नहीं कर सकता है और न ही समाज का मार्गदर्शन कर सकता है !

ऐसे महापुरुष मिलेंगे कहाँ ? इनकी पहचान कैसे होगी ? यह दिखाते कैसे हैं ? इनका आचरण कैसा है ? यह कैसे लोक व्यवहार करते हैं ?

उत्तर : ऐसे महापुरुष हमारे आस पास ही हैं ! बस हममें अपने अन्दर इन्हें पहचानने की सम्यक दृष्टि पैदा करनी है !

इनकी पहचान के लिये हमें इनके निकट रह कर बिना किसी संशय के विवेक पूर्वक समय देना होगा !

यह तत्व ज्ञानी एकदम आडम्बर रहित, सामान्य, सामाजिक और संतोषी व्यक्ति की तरह दिखाते हैं !

इनका आचरण अपेक्षा रहित और कुछ वैराग्य पूर्ण होता है !

इनका लोक व्यवहार एकांतवासी तथा कुछ क्रोधी होता है ! क्रोधी इसलिये कि अनावश्यक लोग इन्हें घेरें नहीं !
यह लोग लोक कल्याण हेतु शास्त्रार्थ के लिये सदैव आतुर रहते हैं !

इनके लिये किसी भी महापुरुष का जीवन मात्र एक मार्गदर्शक है ! यह किसी भी महापुरुष के प्रति अंधभक्त नहीं होते हैं !

यह किसी महापुरुष का जीवन ही सत्य है ऐसा मान कर अपने को भ्रमित नहीं करते हैं ! यह आत्म विवेक और आत्म ज्ञान को ही श्रेष्ठ मानते हैं !

क्योंकि इसकी निगाह में कोई भी महापुरुष सर्वकालीन सिद्धान्त स्थापित नहीं कर सकता है ! जैसे –
जब भगवान श्रीराम का जन्म दिन में हुआ, तो समाज में यह अवधारणा विकसित हुई कि रात्रि में असुरों का अर्थात राक्षसों का जन्म होता है किंतु भगवान श्री कृष्ण ने रात्रि में जन्म लेकर यह भ्रान्ति सदैव के लिये मिटा दी !

भगवान श्री राम के जन्म के समय उनके माता-पिता सहित समस्त अयोध्यावासी प्रसन्न हो गये थे और यह अवधारणा विकसित हुई कि असुरों के जन्म के समय माता-पिता दुखी और भयभीत होते हैं ! किन्तु भगवान श्री कृष्ण के जन्म के समय उनके माता-पिता दुखी और भयभीत थे ! इससे इस भ्रान्ति का भी शमन हुआ !

भगवान श्रीराम का एक विवाह हुआ था और समाज में यह धारणा थी कि आदर्श पुरुष को एक ही विवाह करना चाहिए ! अनेक विवाह तो कुल वृद्धि के लिये असुर किया करते हैं ! किन्तु भगवान श्रीकृष्ण ने तो अनेकों विवाह किये और उनके अनेकों संतान थी ! जिसमें से अधिकतम विवाह तो पुराणों के अनुसार असुर पध्यति से युद्ध, हत्या और अपराहण करके किये गये थे !

भगवान श्री राम के वन गमन के कारण यह अवधारणा थी कि जो पुरुष समस्त सांसारिक सुखों को त्याग देता है, वही आदर्श पुरुष है ! भोग विलास तो असुरों की जीवन शैली है !
किन्तु भगवान श्री कृष्ण स्वयं सोने की द्वारिका में रहते थे और उनका संपूर्ण जीवन सभी तरह के सुख सुविधा से संपन्न, भोग विलासिता से परिपूर्ण था ! उनका ही नहीं उन पर आश्रित सभी व्यक्तियों का जीवन भोग विलासिता से परिपूर्ण था ! तो क्या वह सब असुर थे, नहीं यह युग की आवश्यकता और प्रभाव था !

त्रेता युग में रावण द्वारा सीता का हरण किये जाने पर यह मान लिया गया कि रावण असुर प्रवृत्ति का है और उसने राम की पत्नी का हरण कर बहुत बड़ा पाप किया है ! जिसकी सजा आज तक उसका पुतला जला कर उसे दी जा रही है किंतु कृष्ण अवतार में तो भगवान श्री कृष्ण ने अपने जन्मजात शत्रु शिशुपाल के होने वाली पत्नी रुकमणी का हरण उसके पिता तथा भाई की इच्छा के विरुद्ध छल द्वारा किया था ! तो वह दोषी क्यों नहीं !

भगवान राम के रूप में भगवान ने अनेक कष्टों को स्वीकार करते हुए कभी भी अपने परिवार में गृह कलह नहीं होने दी और वह मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाये ! वही भगवान राम जब कृष्ण अवतार में आये, तो उन्होंने अपने बुआ अर्थात पिता की सगी बहन के परिवार में गृह कलह के कारण इतना बड़ा युद्ध करवा दिया कि उसमें पृथ्वी की 60% पुरुष आबादी लड़कर खत्म हो गई ! जिसे महाभारत का युद्ध कहा गया !

अर्थात कहने का तात्पर्य है कि सत्य और सिद्धांत सदैव सापेक्ष होते हैं ! इसलिए कभी भी सत्य और सिद्धांत ग्रंथों में नहीं मिलते बल्कि सत्य और सिद्धांत अनुभूति का विषय है ! जिसे एक तटस्त विवेकशील योगी ही जान सकता है ! यह विषय किसी ग्रन्थ के ज्ञाता तथाकथित विद्वान् या सामान्य व्यक्ति के विश्लेषण के बाहर का है !!

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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