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हमें अपने जीवन का संविधान स्वयं बनाना चाहिये

संविधान की प्रस्तावना और उसके आदर्श कागजों पर बहुत सुंदर और त्रुटिहीन लगते हैं, लेकिन यथार्थ की खुरदरी जमीन पर उतरते ही ये अक्सर खोखले और निरर्थक साबित होते हैं। समानता, न्याय और सार्वभौमिकता के यह सिद्धांत जब सत्ता, स्वार्थ…

स्वयं को बदलने का आमंत्रण

मैं कोई धर्म गुरु नहीं, एक विचारक हूँ परंपरागत रूप से धर्म गुरु अनुयायियों को चमत्कारों, कर्मकांडों और मान्यताओं के जाल में उलझाते हैं। वह प्रायः अनुयायियों को अपने ऊपर निर्भर बनाते हैं। इसके विपरीत, एक विचारक का कार्य व्यक्ति…

सुरक्षित भविष्य के लिये परंपरागत पढ़ाई आज ही छोड़ दो

वर्तमान विद्यालयों की नींव 18 वीं और 19 वीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति के दौरान रखी गई थी। उस समय समाज को विचारशील मनुष्यों की नहीं, बल्कि कारखानों में काम करने वाले आज्ञाकारी मजदूरों की आवश्यकता थी। एक जैसी वेशभूषा…

शैवों को तर्पण की आवश्यकता क्यों नहीं है

सभी समाज में जीने के दो तरीके हैं, एक वैष्णव और दूसरा शैव जीवन शैली ! समाज को एक सुव्यवस्थित तरीके से चलाने के लिए वैष्णव ने संचय, गृहस्थ और पितृ तर्पण को नितांत आवश्यक कर्म कहा है, क्योंकि यह…

शैव ग्राम : ईश्वर का घर

कंक्रीट के दमघोंटू जंगल से दूर, मानवता की आत्मिक शांति और मुक्ति के लिए निर्मित ‘शैव ग्राम’ 12 एकड़ में विस्तृत एक दिव्य तपोवन है। इसे साक्षात ‘ईश्वर के घर’ के रूप में गढ़ा गया है, जहाँ प्रकृति और मौन…

शेष सभी गुरु ठग हैं

सद्गुरु का मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं है, क्योंकि सत्य बाजार में बिकने वाली वस्तु नहीं है। यह आध्यात्मिक ऊर्जा का एक ‘अदृश्य’ जगत है, जहाँ कोई भी सहजता से गुरु का चोला पहनकर दुकान खोल सकता है। इसीलिये…

मोटिवेशनल स्पीकर के चक्कर में आत्महत्या मत करो

बाजारवाद से प्रेरित वर्तमान ‘मोटिवेशनल उद्योग’ आज भारतीय युवाओं में ऊर्जा के बजाय गहरा अवसाद पैदा कर रहा है। रातों-रात सफलता के जो झूठे सपने मंच से बेचे जा रहे हैं, वह युवाओं को हताशा के ऐसे अंधेरे में धकेल…

मैं शिष्य क्यों नहीं बनाता हूँ

मानवीय चेतना और मनोविज्ञान की गहराइयों में उतरने पर मैंने किसी को भी बिना तैय्यारी के शिष्य नहीं बनाने का निर्णय लिया है, यह शिष्य न बनाने का निर्णय किसी अहंकार का नहीं, बल्कि मानव मन की जटिलताओं और उसकी…

मुक्ति की कामना से बड़ी मुर्खता कोई नहीं है

केवल अपने दुखों और संघर्षों से घबराकर आत्म सुधार की जगह जन्म-मरण से मुक्ति की चाह रखना एक प्रकार का मानसिक पलायन ही है। ईश्वर का आदर्श और अवतार का मर्म समझे बिना इस तरह की कामना करना मानसिक रोग…

हमें अपने जीवन का संविधान स्वयं बनाना चाहिये

संविधान की प्रस्तावना और उसके आदर्श कागजों पर बहुत सुंदर और त्रुटिहीन लगते हैं, लेकिन यथार्थ की खुरदरी जमीन पर उतरते ही ये अक्सर खोखले और निरर्थक साबित होते हैं। समानता, न्याय और सार्वभौमिकता के यह सिद्धांत जब सत्ता, स्वार्थ…