अकबर के “दीन ए इलाही” धर्म के विरोध में शुरू हुई थी “रामलीला” : Yogesh Mishra

इस समय भारत की कुल आबादी लगभग 15 करोड़ थी ! लोग छोटे-छोटे गांवों में रहकर खेती किसानी करके अपना जिनको जीवकोपार्जन करते थे ! अकबर का शासन काल था और अकबर ने “दीन ए इलाही” धर्म की ओट में बहुत बड़े पैमाने पर हिंदुओं का धर्मांतरण करवाना शुरू कर दिया था !

यह बात गोस्वामी तुलसीदास जी को पसंद नहीं आई ! उन्होंने अकबर के “दीन ए इलाही” धर्म का विरोध करने के लिए एक अभियान छेड़ा ! उन्होंने पूरे भारत में भ्रमण किया ! सभी महत्वपूर्ण धार्मिक लोगों से मिले किंतु कोई भी साधु, संत, मठाधीश, महात्मा आदि कोई भी व्यक्ति अकबर जैसे सशक्त शासक के विरुद्ध तुलसीदास जी का साथ देने को तैयार नहीं हुआ !

 तब उन्होंने अकेले ही इस कार्य को संपादित करने का निर्णय लिया और लोगों में भय समाप्त करने के लिए बाल्मीकि रामायण जो संस्कृत भाषा में थी ! उसका संस्कृत के विद्वान होते हुये भी अवधी भाषा में रूपांतरण करना शुरू किया ! जिसमें भगवान राम द्वारा वनों में रहने वाले वन नर और आदिवासियों के सहयोग से महा प्रतापी रावण के वध की दास्तां लिखी हुई थी !

 इसी बीच उन्होंने भारत के युवाओं को संगठित करने के लिए पूरे देश में जगह-जगह व्यायामशालों का निर्माण करवाया और भगवान श्री राम के परम सेवक श्री हनुमान जी के पराक्रम, समर्पण और निष्ठा का व्याख्यान किया ! गोस्वामी तुलसीदासजी ने हनुमान चालीसा, हनुमानाष्टक, बजरंग बाण, हनुमानबहुक जैसे ग्रंथों का निर्माण किया ! जिसका पाठ पूरे देश में किया जाने लगा ! जिससे पूरे देश के युवा संगठित होने लगे ! जिस कार्य में काशी के नरेश इनके बहुत बड़े सहयोगी थे !

जब इस बात की खबर अकबर को मिली तो अकबर ने गोस्वामी तुलसीदास को रामचरितमानस सहित गिरफ्तार करवा लिया और उन्हें कारावास में बंद करवा दिया !

तब तुलसीदास जी ने हनुमान जी का आवाहन किया और हनुमान जी के रूप में बंदरों ने दिल्ली पर हमला कर दिया ! जिससे अकबर घबरा गया और वह तत्काल दिल्ली छोड़कर फतेहपुर सीकरी भाग गया और उसने गोस्वामी तुलसीदास को रिहा करने का आदेश दिया ! किंतु इस गिरफ्तारी के दौरान गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस ग्रंथ तुलसीदास जी से छीन कर अपने नवरत्न ब्राह्मण दरबारी टोडरमल को दे दिया !

 तुलसीदास जी कारावास से छूटने के बाद वापस बनारस हो आ गए लेकिन उनका ग्रंथ टोडरमल के ही पास रह गया था ! तब काशी नरेश ने पुनः उनसे नया ग्रंथ लिखने का आग्रह किया ! जिस पर उन्होंने जन चेतना के लिए ग्रंथ लिखने के स्थान पर हिंदुओं को संगठित करने के लिए राम लीला का नाट्य संस्करण प्रस्तुत करने का निर्णय लिया ! जो सबसे पहले काशी के अस्सी घाट पर 40 दिन तक खेली गयी थी ! उसी रामलीला आज भी संक्षिप्त संस्करण पूरे विश्व में प्रचलित है !

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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