क्या महाभारत का युद्ध शैव और वैष्णव संस्कृति के मध्य का युद्ध था : Yogesh Mishra

मुझे यह बात कभी समझ में नहीं आयी कि एक परिवार के आपसी संपत्ति के झगड़े ने कैसे विश्वयुद्ध का स्वरूप ले लिया ! मैंने इस पर बहुत गहराई से अनेक ग्रंथों का अध्ययन किया और यह निष्कर्ष निकाला कि महाभारत का युद्ध वास्तव में एक परिवार के आपसी संपत्ति का संघर्ष नहीं था !

बल्कि यह युद्ध संपूर्ण विश्व में शैव संस्कृति और वैष्णव संस्कृति के मध्य का विश्वव्यापी संघर्ष का परिणाम था ! जिसमें सभी शैव परंपरा को मानने वाले कौरव पक्ष की ओर से खड़े थे और वैष्णव परंपरा को मानने वाले पांडव पक्ष की ओर से खड़े थे ! मात्र भीष्म ही एक ऐसे व्यक्ति थे जो खड़े तो शैवों की ओर से थे लेकिन उनका मन और मस्तिष्क दोनों वैष्णव विचारधारा का पोषक था !

इस बात को धृतराष्ट्र भी जानते थे कि यदि कुरु वंश की सत्ता युधिष्ठिर के हाथ में चली गई तो निश्चित रूप से उस समय पृथ्वी के सबसे सशक्त राजसत्ता के माध्यम से पूरी पृथ्वी पर कृष्ण के मार्गदर्शन में वैष्णव धर्म का विस्तार हो जायेगा और जिससे शैव परंपरा का सर्वनाश हो जायेगा !

इसी चिंता के कारण धृतराष्ट्र कभी भी अपनी सत्ता युधिष्ठिर के हाथ में देने को तैयार नहीं हुये ! जिसको वैष्णव धर्म ग्रंथों ने धृतराष्ट्र का पुत्र मोह बतलाया है !

और जैसे ही महाभारत युद्ध समाप्त हुआ और धृतराष्ट्र को यह जानकारी हुई कि उसका पुत्र दुर्योधन जो परम शिव भक्त था ! उसकी उसके भाईयों सहित हत्या हो गई है ! तो उन्होंने यह समझ लिया कि अब कुरु वंश में शैव जीवन शैली विलुप्त हो गई है और उन्होंने अपनी पत्नी गांधारी के साथ वन की ओर प्रस्थान कर लिया ! जहां पर भीषण अग्निकांड में दोनों की जलकर मृत्यु हो गई या दूसरे शब्दों में कहें कि वैष्णव षड्यंत्रकारियों द्वारा उन्हें जलाकर मार डाला गया !

महर्षि पराशर क्योंकि हिमालय पर निरंतर निवास करते थे ! अत: वह वैष्णव विचारधारा से प्रभावित थे ! उन्होंने वैष्णव देवताओं के आग्रह पर वैष्णव जीवन शैली के प्रचार प्रसार को करने का निर्णय लिया ! इसलिए उन्होंने अपने बेटे वेदव्यास को वैष्णव विचारधारा का समर्थक बनया ! जिसके लिये उन्होंने समय-समय पर वेदव्यास को प्रशिक्षित किया और इसी परंपरा का निर्वहन करते हुये वेदव्यास ने अपने पुत्र शुकदेव को वैष्णव जीवन शैली के प्रचार प्रसार हेतु तैयार किया !

और व्यास जी ने संपूर्ण विश्व में घूम घूम कर क्षेत्रीय ज्ञान को वैष्णव विश्व भाषा “संस्कृति” में अपने सहयोगियों से अनुवादित करवाया और उनकी पांडुलिपि तैयार की ! जिस परंपरा को व्यास के न रहने के उपरांत भी 8 पीढ़ी तक निभाया गया और 18 पुराण, 18 उपपुराण, चार वेद, वेदांत 108 उपनिषद और 18 दर्शनों का संस्कृत भाषा में अनुवाद किया गया !

और इसके उपरांत इनके मूल ज्ञान जो श्रुति और स्मृति के आधार पर वंश परंपरा के तहत चलता था ! उसे पूरी तरह नष्ट करके इस अनुवादित धर्म ग्रंथों को गुरुकुल के माध्यम से पूरी दुनिया में प्रचारित व प्रसारित किया गया और संस्कृत को विश्व की प्राचीनतम राजकीय भाषा घोषित कर दिया गया !

इसीलिये इस युद्ध के दौरान जब कृष्ण ने यह पाया कि उनकी सेना के महान योद्धा पोषण तो उनके संपन्न साम्राज्य से पा रहे हैं किंतु अंतर्मन में वह सभी लोग शैव जीवन शैली के पोषक और अनुयाई हैं ! तो उन्होंने यह भय सताने लगा कि इस महायुद्ध में अपनी सेना उन्हें आखिरी वक्त में धोखा दे सकती है !

जिसे धोखे की संभावना से बचने के लिये कृष्ण ने अपनी नारायणी सेना दुर्योधन को दे दी ! क्योंकि इस नारायणी सेना का नियंत्रण बलराम जी के हांथ में था ! जो कि इस शैव वैष्णव के महायुद्ध में कृष्ण के वैष्णव पक्ष में लड़ने से खुश नहीं थे ! इसीलिये उन्होंने युद्ध मैं हिस्सा नहीं लिया था और इस महा युद्ध के समय तीर्थ यात्रा पर चले गये थे !

इस महाभारत के युद्ध में 39 लाख 40 हजार योद्धा मारे गये थे और शैव संस्कृति का सर्वनाश हो गया ! जिस की वजह से पूरी पृथ्वी पर महाकाल की शिव आराधना बंद हो गयी और मनुष्य के जीवन में कलयुग का प्रवेश हुआ ! जिसके दुष्परिणाम आज तक मानवता भुगत रही है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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मोबाईल : 9453092553

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