राम के वनवास की असली वजह : Yogesh Mishra

कश्यप ऋषि और उनकी पत्नी दिति के पुत्र असुर राजा मय की पत्नी हेमा का इंद्र द्वारा अपहरण कर लेने के बाद असुर राजा मय के अपने बेटी मंदोदरी की इंद्र की वासना से रक्षा के लिये उसका विवाह महान पराक्रमी शिव भक्त रावण के साथ कर दिया था !

कुछ समय बाद जब रावण विश्व विजय करके लौटा तो लंका में राजकीय उत्सव के अवसर पर रावण ने मंदोदरी को खुश नहीं देखा ! रावण द्वारा इसका कारण पूंछने पर मंदोदरी ने अपनी माता के इंद्र के कब्जे में होने का कारण बतलाया !

तब रावण ने अपने बड़े बेटे के नेतृत्व में एक सेना भेज कर इंद्र को गिरफ्तार करावा लिया और अपनी सास हेमा को आजाद करावा कर लंका बुलावा और अपने ससुर असुर राजा मय को सौंप दिया ! बाद में माफ़ी मांगने पर इंद्र को भी कुछ प्रतिबन्धों की शर्तों के साथ छोड़ दिया !

जिस कारण इन्द्र ने अपने को बड़ा अपमानित महसूस किया और रावण की हत्या का षडयंत्र रचा ! जिसमें विश्वामित्र, भरद्वाज, वशिष्ठ और अगस्त ऋषि जैसे प्रभावशाली लोगों का साथ लिया और एक षडयंत्र रचा कि रावण के परम मित्र दशरथ के पुत्र राम द्वारा रावण की हत्या करावा दी जाये !

क्योंकि इंद्र यह जानता था कि रावण ने मित्रता में दशरथ को यह अभय दान दिया था कि वह कभी भी अपनी ओर से दशरथ या उनके वंश पर आक्रमण नहीं करेगा ! इसी अवसर का लाभ उठा कर विश्वामित्र ने दशरथ पुत्र राम के हाथों रावण की नानी सुकेतु यक्ष की पुत्री जिसका कि अयोध्या के समीप स्थित ताड़ के वन पर स्वामित्व था ! अत: इसका नाम वैष्णव ने तड़का रख दिया ! उसका तथा उसके पुत्र तथा रावण के मामा सुबाहु का वध करावा दिया !

और इस घटना के बाद राजा जनक के यहाँ रखा हुआ भगवान शिव का महर्षि दाधीच की हड्डियों से बना हुआ ब्रह्मास्त्र शस्त्र पिनाक को नष्ट करावा दिया और जबरजस्ती राजा जनक के बेटी का विवाह राम से करावा दिया ! जिससे भविष्य में शिव भक्त परशुराम के क्रोध से राम को जनक का दामाद होने का हवाला देकर बचाया जा सके ! 

किन्तु जब इंद्र का सारा षड्यंत्र दशरथ के समझ में आया, तब सुरक्षा कारणों से दशरथ ने भरत और शत्रुघन को ननिहाल भेज कर चुपचाप राम के राज्याभिषेक की तैय्यारी करावा डाली ! किन्तु इसकी सूचना अपने जासूसों से इंद्र को हो गयी ! तब जब इंद्र को अपने भविष्य की सारी योजना फेल होते देख इंद्र ने अपने सबसे विश्वसनीय शिष्य भरद्वाज से दशरथ की हत्या और राम के वनवास का षडयंत्र रचवाया !

तब भरद्वाज ऋषि ने वशिष्ठ के शिष्य अभ्रेतु मुनि के माध्यम से आनव प्रजाति की रानी कैकयी जो अवध की रक्षा मंत्री और कुशल योद्धा भी थीं ! जिनसे दशरथ ने इस शर्त पर विवाह किया था कि उनका पुत्र ही अयोध्या का राजा बनेगा ! तब इंद्र द्वारा दशरथ द्वारा राम के गुप्त राज्याभिषेक की सूचना रानी कैकयी को उसके महिला विशेष सचिव मंथरा द्वारा एक गुप्त पत्र के जरिये से महर्षि वशिष्ठ के शिष्य अभ्रेतु मुनि के माध्यम से दी !

जिस पत्र को पढ़ते ही कैकयी कोप भवन में चली गयी ! जहाँ कैकयी के निर्देश पर राम को 14 वर्ष का वनवास और भरत का राज्याभिषेक की घोषणा दशरथ द्वारा करवाई गयी और राजा दशरथ अति क्रोध और अवसाद में वापस अपने श्वेत भवन आ गये !

जहाँ पर पहले से राज दशरथ को जहर देने के लिये पानी में इंद्र द्वारा धीमा जहर घुलवा दिया कर रखवा दिया गया था ! फिर इंद्र द्वारा रखवाये गये धीमे जहर को धोके से पीकर छ: दिन बाद राजा दशरथ की अकस्मात मृत्यु हो गयी ! जिसे कहा गया कि श्रीराम के वियोग में राजा दशरथ ने अपने पुत्र वियोग में दम तोड़ दिया ।

क्योंकि इंद्र यह जानता था कि दशरथ के जिन्दा रहते राम कभी भी रावण की हत्या नहीं कर पाएंगे ! शेष फिर कभी ……

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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महर्षि #श्रृंगी कहते हैं कि आधी रात हुए #मंथरा का द्वार खटखटाया किसी ने,,मंथरा सुरक्षा सलाहकार थी अयोध्या की जैसे अजित #डोभाल या अन्य एजेंसियों के लोग आज भी रहते ही हैं,,

सामने खड़े थे #अभ्रेतु मुनि,, ये महर्षि वशिष्ठ के शिष्य थे,, मुनि ने हाथ बढ़ाकर कहा कि यह पत्र ऋषि ने पहुंचवाया है महारानी कैकयी के लिए,,

अयोध्या में राम के राजा बनने की धूम मची थी और उधर वह मंथरा महारानी #कैकयी के महल पहुंची,, कैकयी ने पत्र को आत्मसात किया,,

तुंरत कोपभवन पहुंची,, महाराज दशरथ को सूचना भिजवा जी,,

कैकयी जो सुरक्षा मुद्दों पर राष्ट्रीय दृष्टि रखती थी और अनेकों #युद्धों में महाराज दशरथ के साथ लड़ाई लड़ी थी,, जो सदा दशरथ पर प्रसन्न रहती थी,, दशरथ वहां पहुंचे तो कैकयी ने कहा कि राम भयंकर वनों में प्रवेश करें,,

महाराज दशरथ ने कहा–आप तो कौशल्या से भी ज्यादा #ममता रखती हैं राम पर फिर यह निष्ठुरता क्यों??चारो वेदों की मर्मज्ञ उस तपस्विनी कैकयी ने एक ही वाक उच्चारित किया–जहां #कर्तव्य की बात आती है वहां ममता समाप्त हो जाती है महाराज,,

जब राम माता से मिलने आए तो कैकयी ने फिर से कहा–हे राम तुम भयंकर #वनों में प्रवेश करो,, पिता की मृत्यु आज नहीं तो कल होनी ही है,, लेकिन ये जो अयोध्या के लाखों प्राणी दुःख से त्राहि त्राहि करेंगे यह होने से पहले रोकना होगा,, राम ने मुस्कुराते हुए माता के पैर छुए और कहा–#तथास्तु,,

आज कैकयी को कितने उलाहने न झेलने पड़ रहे लाखों वर्षों तक,, लेकिन उसने वह किया जो उसका कर्तव्य था,, नमन है उस वेदनिष्ठ,, ब्रह्मनिष्ठ,, #राष्ट्रनिष्ठ माता को,, उसके साहस को,, उसकी दूरदर्शिता को,,

महर्षि श्रृंगी जी महाराज कहते हैं कि #राम वन गमन कर रहे थे,, कैकयी की चारों और #नासमझों द्वारा भर्त्सना हो रही थी,, #ऋषिगण आनंदित थे,,ऋषि भारद्वाज का पत्र लिए जो महर्षि वशिष्ठ के द्वारा उन्हें मिला,,महान माता कैकयी उस पत्र को हाथ में लिए एक भव्य राष्ट्र को स्थापित होते हुए देख रही थी,,

चित्र–माता के साथ जब सन्यास दीक्षा ली,,😊

अपनी संस्कृति अपना गौरव।       *सूर्यदेव*

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