वर्तमान भाषा विज्ञान का संघर्ष ही तो हमारे सर्वनाश का कारण नहीं : Yogesh Mishra

रावण एक ऐसा ज्ञानी व्यक्तित्व था ! जिसने स्वयं साक्षात भगवान शिव को प्रसन्न करके उनसे शैव तंत्र विज्ञान की दीक्षा ली थी ! उसी दीक्षा के प्रभाव के कारण उसने अपनी नाभि में अमृत स्थापित कर लिया था और अजेय हो गया था ! उसने सभी ग्रहों और नक्षत्रों के नकारात्मक प्रभाव को खत्म करने के लिये उसने तरह-तरह के तांत्रिक विधान विकसित किये थे !

 उस के शासनकाल में इस तरह के तांत्रिक विधान उसके रक्ष राष्ट्र की राष्ट्रीय भाषा “तमिल” में लोकगीतों के माध्यम से जन-जन तक प्रचारित और प्रसारित करने के लिये उसने एक गायकों की टीम बना रखी थी ! जो गांव गांव जाकर शैव तंत्र का प्रचार प्रसार किया करते थे !

 इसके लिए उसने ऑस्ट्रेलिया अफ्रीका और श्रीलंका सहित उसके मध्य के भूभाग पर जहां आज वर्तमान में हिंद महासागर है ! वहां पर अनेकों ज्योतिष और तंत्र के अनुसंधान केंद्र स्थापित कर रखे थे ! जिसे राम ने  इंद्र के बहकाने पर परमाणु हमलों के द्वारा नष्ट करके समुद्र में डुबो दिया था !

रावण ने अपने “रक्ष राष्ट्र” में विज्ञान को इतना अधिक विकसित कर लिया था कि उस समय का महान वैज्ञानिक कुंभकर्ण द्वारा छोड़ा गया सेटेलाइट उस समय अन्य ग्रहों पर रहने वाले एलियन से संपर्क स्थापित करता था और रावण के सहयोग से कुंभकर्ण ने अपने विज्ञान को इतना विकसित कर लिया था कि रावण समय-समय पर इन एलियन्स से मदद मांगा करता था तथा उनकी मदद किया करता था ! जो सेटेलाइट आज नासा को प्राप्त हो गई है ! जिसके अंदर के डाटा को डिकोड करने का कार्य चल रहा है !

इसी वजह से रक्ष संस्कृति की राष्ट्रीय भाषा “तमिल” को जानबूझकर पिछले 200 सालों में विकृत किया जा रहा है जिससे कि लोकगीत के माध्यम से परंपरागत जो रावण के समय का विज्ञान जो लोगों की जानकारी में है उसे आज पूरी तरह से शब्दों के हेरफेर द्वारा नष्ट किया जा सके ! जिसे तत्काल रोकने की आवश्यकता है !

 इसमें बहुत बड़ी भूमिका वैष्णव लेखकों की भी रही है ! उन्होंने झूठ बोलकर संस्कृत को विश्व की प्राचीनतम भाषा घोषित करके समाज में तमिल भाषा के महत्व को कम किया और विश्व के सभी ग्रंथ जो विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में विकसित हुए थे ! उनका संस्कृत भाषा में अनुवाद करके उन्हें वैष्णव “धर्म ग्रंथ” घोषित कर दिया ! और आचार्य परम्परा से उसका प्रचार प्रसार शुरू किया ! इस कार्य में सबसे ज्यादा योगदान त्रेता में नैमिषारण्य के शौनक ऋषि तथा द्वापर में वेदव्यास का था !

तभी से इस छद्म भाषा युद्ध के कारण मानवता को तरह-तरह के खतरों का सामना करना पड़ रहा है ! जो आज भी जारी है !

 आप देखिये जो कार्य वैष्णव ने संस्कृत भाषा के माध्यम से किया था वही कार्य आज पश्चिम के देश अंग्रेजी भाषा के माध्यम से कर रहे हैं ! उन्होंने हर वर्ग के शब्द समूह अलग-अलग बना रखा है अर्थात वकीलों के लिए अलग भाषा का शब्द समूह है, डॉक्टरों के लिए अलग, इंजीनियर के लिए अलग, तो चार्टर्ड अकाउंटेंट जैसे व्यवसाय करने वालों के शब्द समूह अलग-अलग हैं ! यह इतने उलझे हुए हैं कि अंग्रेजी भाषा की सामान्य जानकारी रखने वाला व्यक्ति भी इन  भाषाओं के तकनीकी शब्दों के सही अर्थ आसानी से नहीं समझ सकता है !

किन्तु आज 200 सालों में बहुत से लोग अब इस पश्चिम की धूर्त अंग्रेजी भाषा को काफी हद तक समझने लगे हैं ! इसलिये अब अंग्रेजी के स्थान पर संगणकीय तकनीकी भाषा और कृतिम बुद्धिमत्ता के प्रयोग पर सबसे अधिक जोर दिया जा है !

 मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि मानवता को बचाने के लिए सर्व सुलभ सामान्य भाषा में सभी तरह का ज्ञान उपलब्ध होना चाहिए ! जिसे सभी समझ सकें ! तभी मानवता बच सकती है ! यदि भाषाओं के शब्द समूह का संघर्ष या उससे उत्पन्न अज्ञानता समाज में चलती रहेगी तो निश्चित रूप से यही शब्द समूह का भाषायी विज्ञान मानवता के सर्वनाश का कारण बनेगा !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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मोबाईल : 9453092553

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