एकलव्य का सत्य : Yogesh Mishra

प्राय: सुनने में आता है कि द्रोणाचार्य ने एक गरीब आदिवासी बालक एकलव्य का अंगूठा कटवा लिया था ! इस कथा का प्रयोग फिलहाल राजनीतिक वोट बैंक के लिए ब्राह्मणों के विरुद्ध सर्वाधिक किया जाता है !

 अब यहां पर दो प्रश्न है पहला एकलव्य कौन थे ? दूसरा क्या द्रोणाचार्य ने वास्तव में एकलव्य का अंगूठा कटवा लिया था !

 आज इस विषय पर समीक्षा करते हैं ! पहले प्रश्न का उत्तर यह है कि एकलव्य कोई गरीब आदिवासी बालक नहीं था बल्कि यह कंस के ससुर और कृष्ण के जानी दुश्मन मगध के राजा जरासंध के मगध साम्रराज्य की चतुरंगिणी सेना के मुख्य निषाद सेनापति हिरण्यधनु का पुत्र था ! जिसकी माता का नाम सुलेखा था ! एकलव्य के बचपन का नाम अभिद्युम्न था !

हिरण्यधनु प्रयाग के तटवर्ती प्रदेश श्रृंगवेरपुर के निषादराज के पुत्र थे ! यह वही निषादराज कुल था, जिसने भगवान श्री राम को सीता व लक्ष्मण सहित गंगा पर करवाई थी ! निषादराज का साम्राज्य गंगा के किनारे बहुत दूर दूर तक फैला था ! जिसमें अब यादव वंशी योद्धा अनुशासनहीनता करने लगे थे ! वह निषादों को बहू बेटियों का अपहरण कर उनसे बलात्कार करते थे और विरोध करने पर उनकी हत्या कर देते थे !

जिनकी रक्षा के लिये एकलव्य को अनेकों युद्ध लड़ने पड़े ! एकलव्य अकेले ही सैकड़ों यादव वंशी योद्धाओं को रोकने में सक्षम था ! जिसकी सूचना कृष्ण को दी गयी ! तब कृष्ण द्वारिका से निषादराज एकलव्य से युद्ध करने आये !

इसी युद्ध में कृष्ण ने छल से एकलव्य को मार डाला और उसके पुत्र केतुमान को महाभारत युद्ध में भीम के हाथ से मारा दिया ! इस तरह निषादराज वंश ख़त्म हो गया ! यह बात महाभारत युद्ध के बाद कृष्ण ने अपने अर्जुन के प्रेम में कबूली थी !

एकलव्य के छद्म प्रशिक्षण लेते समय जरासंध का मगध साम्राज्य उत्तर भारत में कुरु वंश के बाद सबसे सशक्त साम्राज्य था ! इसी जरासंध के भय से कंस की कृष्ण द्वारा हत्या के बाद कृष्ण को मथुरा छोड़ कर द्वारिका गुजरात भागना पड़ा !

और द्रोणाचार्य उस समय के सबसे बड़े धनुर्धर विद्या के आचार्य थे ! जिनका जन्म उस समय के सबसे बड़े वायुयान के विशेषज्ञ प्रयागराज के महर्षि भरद्वाज और स्वर्ग की अप्सरा घृताची के संयोग से हुआ था ! जो सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर विद्या के आचार्य थे !

 एकलव्य यह जानता था कि जरासंध के मुख्य सेनापति हिरण्यधनु का पुत्र होने के कारण द्रोणाचार्य कभी भी उसे धनुर्विद्या नहीं सिखाएंगे ! अतः उसने द्रोणाचार्य से धनुर्विद्या सीखने के लिए छल का सहारा लिया !

द्रोणाचार्य के आश्रम के निकट आदिवासी बालक के रूप में छिप जीवन यापन करते हुये संपूर्ण धनुर्विद्या जो द्रोणाचार्य कौरव और पांडव को सिखा रहे थे, उसे छल पूर्वक सीख लिया !

इसी धनुर्विद्या विद्या को प्राप्त करने के दौरान द्रोणाचार्य के आश्रम का कुत्ता एकलव्य के आश्रम में घुसने पर भोंक भोंक कर एकलव्य के मनोरथ को असफल कर देता था !

अतः एक दिन एकलव्य द्वारा इस तरह से तीर चलाया गया कि तीर से कुत्ते का मुंह तो भर कर बंद हो गया किंतु मुंह के अंदर एक भी खरोच नहीं आई ! जिसे देख कर स्वयं द्रोणाचार्य भी आश्चर्य चकित हो गये !

 जिस कला से प्रभावित होकर द्रोणाचार्य ने एकलव्य को बुलाया और आशीर्वाद दिया तथा उससे उसका परिचय भी जानना चाहा कि वह कौन है ?

जब द्रोणाचार्य को यह पता लगा कि वह मगध साम्राज्य के राजा जरासंध के मुख्य सेनापति हिरण्यधनु का पुत्र है ! जिसने छल पूर्वक द्रोणाचार्य से धनुर्विद्या विद्या सीख ली !

तब क्योंकि द्रोणाचार्य को यह मालूम था कि जरासंध की कृष्ण से शत्रुता है और भविष्य में निश्चित रूप से एक महायुद्ध होगा !

अतः द्रोणाचार्य ने एकलव्य से कहा कि मैं तुम्हारा गुरु हूं और तुम्हें गुरु दक्षिणा में मुझे एक वचन देना होगा ! कि तुम मेरे द्वारा सिखाई गयी धनुर्विद्या का प्रयोग किसी भी स्थिति में किसी भी युद्ध में नहीं करोगे !

तब एकलव्य ने भावुक होकर द्रोणाचार्य से कहा कि गुरुदेव आपने धनुर्विद्या का प्रयोग न करें का वचन लेकर मेरे साथ ऐसा ही व्यवहार किया है कि जैसे किसी धनुर्धर का अंगूठा काट लिया गया हो !

 मात्र इसी एक लाइन के भावुक संवाद को लेकर भारत में वैमनस्य फैलाने के लिये विदेशों से पैसे प्राप्त करके भारत के बुद्धिजीवी वर्ग ब्राह्मणों के खिलाफ राजनीतिक लाभ के लिये हवा दी जानी शुरू कर दी गई और उसका यह प्रणाम हुआ इतिहास को तथ्य से अलग हटाकर असत्य को इतनी बार दोहराया गया कि यह असत्य ही सत्य नजर आने लगा !

 राजनीतिक लाभ के लिए ऐसे ही बहुत से उदाहरण हमारे इतिहास में मिलते हैं ! जिन पर राष्ट्र रक्षा के लिये अब  चिंतनशील व्यक्तियों को गंभीरता से विचार करना चाहिये, नहीं तो भारत का सर्वनाश सुनिश्चित है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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