ईसाईयों का छद्म धर्मांतरण वैष्णव की देन है : Yogesh Mishra

 आजकल विशेष रुप से आये दिन यह सूचना प्राप्त होती है कि ईसाई समाज लोगों को मूर्ख बना कर धर्मांतरण करवा रहा है ! कई उदाहरण तो ऐसे भी मिलते हैं कि जिस क्षेत्र में व्यक्तियों की शारीरिक बनावट जिस तरह की है, वहां पर ईसाई समाज ईसा मसीह की मूर्तियां भी उसी क्षेत्रीय व्यक्ति की शारीरिक बनावट के अनुरूप बना देते हैं !

 यह कोई नया कार्य नहीं है ! इंद्र के बहकाने पर जब राम द्वारा रावण की कुल वंश सहित हत्या कर दी गयी ! तब उस के बाद राम को अयोध्या के आम आवाम ने राजा के रूप में ब्राह्मण हत्या के दोष होने के कारण अस्वीकार कर दिया था ! तब उस समय राम ने लक्ष्मण और सीता सहित नैमिषारण्य के निकट “हत्याहरणी” नामक स्थान पर जाकर प्रायश्चित किया था !

 इसके बाद वशिष्ठ और विश्वामित्र के दबाव में राम को राजा तो बना दिया गया ! किंतु इनका सामाजिक सम्मान एक ब्राह्मण की हत्या के कारण शून्य हो गया था ! जिसका मूल कारण समाज माता सीता को मानता था ! इसी से उबरने के लिए राम ने गर्भवती माता सीता का परित्याग भी किया था !

फिर शुरू हुआ राजनैतिक षडयंत्र का दौर ! तब राजा राम को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम सिद्ध करने के लिए बहुत से हथकंडे विश्वामित्र के देख-रेख में अपनाये गये ! जिससे महर्षि वशिष्ठ सहमत नहीं थे ! अत: उन्होंने अयोध्या का त्याग करके मनाली में निवास का निर्णय लिया

और इसी षडयंत्र का अंतिम परिणाम था “अश्वमेघ यज्ञ” अर्थात जो राम की अधीनता स्वीकार नहीं करेगा, उसका बल पूर्वक राज्य हड़प कर उसकी हत्या कर दी जाएगी ! जिसे राम के ही दोनों पुत्रों ने अन्तः विश्व रक्षा के लिये महर्षि बाल्मीकि के निर्देश पर विफल किया !

 ठीक इसी तरह महाभारत युद्ध के बाद जब कृष्ण को उनके ही परिवार के लोगों ने अस्वीकार कर दिया और वह राज महल छोड़कर दर-दर भटकने के लिए बाध्य हो गये और उनका पूरा परिवार उनके नियंत्रण के बाहर चला गया तथा अंततः जंगल में अज्ञात अवस्था में एक बहेलिया द्वारा उनकी हत्या कर दी गई !

तब इसके बाद कृष्ण के छल नीति के कारण प्राप्त कुरु साम्राज्य के राजा युधिष्ठिर का भी उस समय के समाज में खुलकर विरोध हुआ और उन्हें भी अपने ही कुल वंश का हत्यारा घोषित कर दिया गया !

 जिस अपयश से बचने के लिए युधिष्ठिर ने पूरे महाभारत युद्ध का कारण कृष्ण पर थोप दिया और इसके बाद कृष्ण को युग दृष्टा भगवान सिद्ध करने का प्रयास शुरू किया गया !

 इसके लिए उन्हीं के कुल के पितामह वेदव्यास ने राजकीय खर्चे पर दो महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे एक महाभारत और दूसरा श्रीमद्भागवत पुराण !

इन दोनों ग्रंथों के माध्यम से समाज को यह बतलाने का भरसक प्रयास किया गया कि कृष्ण कोई सामान्य व्यक्ति नहीं थे बल्कि वह भगवान विष्णु का अवतार थे और समाज में धर्म की पुनः स्थापना के लिए उन्होंने महाभारत युद्ध करवाया था ! इसी ग्रंथ में युधिष्ठिर को भी “धर्म का अवतार” बताया गया है !

अपने इसी प्रपोगंडा को गति देने के लिये पूरे भारत में जगह-जगह कृष्ण के मंदिर बनवाये गये ! जिनमें कृष्ण को क्षेत्रीय व्यक्तियों का आराध्य घोषित करने के लिए कृष्ण के विभिन्न नाम और स्वरूप अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग रूप में प्रचारित और प्रसारित किये गये !

 जिसके कुछ उदाहरण में नीचे दे रहा हूं :-

उत्तर प्रदेश में कृष्ण या गोपाल गोविन्द इत्यादि नामो से जानते है ! राजस्थान में श्रीनाथजी या ठाकुरजी के नाम से जानते है ! महाराष्ट्र में बिट्ठल के नाम से भगवान् जाने जाते है ! उड़ीसा में जगन्नाथ के नाम से जाने जाते है !

बंगाल में गोपालजी के नाम से जाने जाते है ! दक्षिण भारत में वेंकटेश या गोविंदा के नाम से जाने जाते है ! गुजरात में द्वारिकाधीश के नाम से जाने जाते है ! असम ,त्रिपुरा,नेपाल इत्यादि पूर्वोत्तर क्षेत्रो में कृष्ण नाम से ही पूजा होती है ! मलेसिया, इंडोनेशिया, अमेरिका, इंग्लैंड, फ़्रांस इत्यादि देशो में कृष्ण नाम ही विख्यात है ! आदि आदि

 ठीक इसी तरह वर्तमान में राम और कृष्ण के समय जिस तरह से शैवों का धर्मांतरण कर उन्हें छल पूर्वक वैष्णव बना दिया गया ! ठीक उसी तरह वर्तमान समय में ईसाई भारतीय समाज को छल और भ्रम का सहारा लेकर इसाई बना रहे हैं !

 इसलिए यह स्पष्ट कहा जा सकता है कि ईसाइयों का वर्तमान छद्म धर्मांतरण वैष्णव सूझबूझ और परंपरा की देन है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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