शैव और वैष्णव योगी में अंतर : Yogesh Mishra

भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद भगवत गीता के छंठे अध्याय के अठारहवे श्लोक में कहा है कि –

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते !!

निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥ 6/18

अर्थात्- जब (यदा), विशेष रूप से संयत किया हुआ (विनियतं), चित्त (चित्तम्), आत्मा में ही (आत्मनि एव), स्थित रहता है (अवतिष्ठते), तब (तदा), सब प्रकार के काम्य विषयों- आकांक्षाओं से (सर्वकामेभ्यः), कामनारहित (निःस्पृहः), व्यक्ति योग में स्थित है (युक्तः), ऐसा कहा जाता है (इति उच्यते)॥

यह शब्दार्थ हुआ, अब भावार्थ देखते हैं-

अत्यंत वश में किया हुआ चित्त जिस काल में परमात्मा में ही भली भाँति स्थित हो जाता है, उस काल में संपूर्ण भोगों-कामनाओं से स्पृहारहित (पूर्णतः निस्पृह) पुरुष योगयुक्त है, ऐसा कहा जाता है !

भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य कब योग में स्थित है, यह जानना हो तो यह देखना होगा कि वशीभूत चित्त परमात्मा में लगा हुआ है या नहीं एवं उसके मन में भोगों के प्रति निर्लिप्तता का भाव पैदा हुआ या नहीं !! जब- जब, जिन- जिन क्षणों में, जिस- जिस अवधि में मनुष्य इस स्थिति को प्राप्त होता है, वह युक्तः- सही अर्थों में एक योगी- एक दिव्यकर्मी कहा जाता है !

आहार- विहार की अति से बचने की बात कहने के तुरंत बाद वे ध्यानयोग की अति महत्वपूर्ण शर्तें बताते हैं- विनियतं चित्तं- विशेष रूप से संयत किया हुआ चित्त- सारी वृत्तियों को सिकोड़कर एकाग्र किया गया मन तथा

फिर कहते हैं- च्च्आत्मनि अवतिष्ठतेज्ज् अर्थात् ऐसा चित्त फिर परमात्मा में ही स्थित हो, इधर- उधर नहीं तथा इसके बाद कहते हैं- निस्पृहः सर्वकामेभ्यः- समस्त कामनाओं की, भोग की कल्पना या इच्छा- आकांक्षा से मुक्त एवं पूर्णतः निस्पृह (कोई भी लगाव न रखने वाला, किसी भी प्रकार की रुचि न रखने वाला) व्यक्ति ही सही मायने में योगी कहलाता है !

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि सभी वैष्णव दर्शन भक्ति प्रधान हैं और भक्ति का तात्पर्य है, अपने कल्याण के लिए किसी अन्य व्यक्ति या ऊर्जा पर आश्रित हो जाना !

 जबकि शैव जीवन शैली में व्यक्ति अपने कल्याण के लिए किसी अन्य पर आश्रित नहीं है ! भगवान शिव स्वयं कहते हैं कि मनुष्य अपने आप में पूर्ण है किन्तु वह संसार के प्रपंच में फंसा हुआ है, इसलिए उसे पूरे जीवन अपनी पूर्णता का ज्ञान नहीं हो पाता है !

 और वह अपने को अपूर्ण मानकर जीवन भर व्यर्थ के धार्मिक या आध्यात्मिक प्रपंचा में फंसा रहता है, जिससे कुछ समय तक तो व्यक्ति को सुख जैसी अनुभूति होती है, किंतु अंततः वह पहुंचता कहीं नहीं है !

 इसलिए आत्म कल्याण के लिए व्यक्ति को किसी भी सांसारिक प्रपंच अर्थात मंदिर, मस्जिद, घंटा, घड़ियाल, नगाड़ा, कीर्तन आदि में नहीं पड़ना चाहिये बल्कि अपने “स्व” को विकसित  करना चाहिये ! जिससे वह इस सांसारिक प्रक्रिया से मुक्त हो सके !

 इस “स्व” को विकसित करने के लिये व्यक्ति को संसार के प्रति दृष्टा भाव विकसित करना चाहिये ! उसे  सांसारिक क्रियाओं में इन्द्रीय रसास्वादन से मुक्त होना चाहिये क्योंकि संसार में इन्द्रीय रसास्वादन ही आपके पूर्ण विकसित होने में सबसे बड़े बाधक हैं !

 भगवान शिव का कहना है कि जो व्यक्ति इन्द्रीय रसास्वादन से मुक्त हो गया ! जिसने सम्मान और सम्पत्ति की कामना छोड़ने का अभ्यास कर लिया ! वह संसार में रहते हुये भी वैराग्य में स्थिर है ! वही जीव संसार में रहते हुये भी अपने को पूर्ण विकसित कर पाता है !

 इसके लिये व्यक्ति को किसी भगवान, आचार्य, गुरु, ग्रंथ, मंत्र आदि की कोई आवश्यकता नहीं है !!

योगेश कुमार मिश्र

संस्थापक

सनातन ज्ञान पीठ

ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान

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