वैदिक ज्योतिष में वंश वृद्धि और संतान सुख का विचार मुख्य रूप से कुंडली के पंचम भाव, इसके स्वामी (पंचमेश) और नैसर्गिक कारक देवगुरु बृहस्पति से किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार संतान प्राप्ति के सात अचूक नियम निम्नलिखित हैं :-
1. मजबूत पंचम भाव :- कुंडली का पांचवां घर संतान का है। यदि इस भाव पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो और पंचमेश केंद्र या त्रिकोण में बलवान होकर बैठे, तो संतान सुख निश्चित होता है।
2. शुभ बृहस्पति :- गुरु संतान के नैसर्गिक कारक हैं। इनका स्वराशि, उच्च राशि (कर्क) या शुभ प्रभाव में होना अनिवार्य है।
3. सप्तमांश कुंडली (D7) :- सूक्ष्म फल के लिए वंश वृद्धि की मुख्य वर्गीय कुंडली ‘सप्तमांश’ के लग्न और पंचम भाव का सुदृढ़ होना आवश्यक है।
4. बीज और क्षेत्र स्फुट :- पुरुष की जैविक क्षमता के लिए ‘बीज स्फुट’ (विषम राशि) और स्त्री के लिए ‘क्षेत्र स्फुट’ (सम राशि) का सकारात्मक होना अनिवार्य है।
5. दोषों से मुक्ति :- पंचम भाव राहु-केतु, पितृदोष या सर्प दोष के प्रभाव से मुक्त होना चाहिए, अन्यथा संतान प्राप्ति में कड़ा अवरोध आता है।
6. अनुकूल दशा व गोचर :- संतान का जन्म पंचमेश या गुरु की महादशा-अंतर्दशा में होता है। साथ ही, गोचर में शनि और गुरु दोनों का संयुक्त प्रभाव (डबल ट्रांजिट) पंचम भाव पर होना चाहिए।
7. अष्टकवर्ग बिंदु :- अष्टकवर्ग गणना में पंचम भाव को २५ या उससे अधिक बिंदु मिलने पर बिना किसी बाधा के योग्य संतान की प्राप्ति होती है।
विशेष :- संतान सुख के सटीक आकलन के लिए पति-पत्नी दोनों की कुंडलियों का संयुक्त अध्ययन और ग्रहों का गोचर सबसे महत्वपूर्ण आधार बनता है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
कुण्डली परामर्श हेतु सम्पर्क कीजिये
मोबाईल : 9453092553

