हमें शैव ग्राम क्यों चाहिये

आधुनिक मनुष्य जिस दुनिया में सांस ले रहा है, वह असल में ईंट-पत्थर या प्राकृतिक संपदा से अधिक, संगठनों और गढ़ी हुई व्यवस्थाओं का एक जटिल ढांचा है। शिक्षा प्रणाली से लेकर आर्थिक तंत्र और कॉरपोरेट संरचनाओं तक, यह सभी…

आधुनिक मनुष्य जिस दुनिया में सांस ले रहा है, वह असल में ईंट-पत्थर या प्राकृतिक संपदा से अधिक, संगठनों और गढ़ी हुई व्यवस्थाओं का एक जटिल ढांचा है। शिक्षा प्रणाली से लेकर आर्थिक तंत्र और कॉरपोरेट संरचनाओं तक, यह सभी…

सफल व्यक्ति में संत खोजने की नासमझी संसार के हर देश की अपनी एक अलग तासीर है, अपना एक अलग मनोविज्ञान है। किंतु भारत के जनमानस की सोच सबसे विचित्र और गहरे अंतर्विरोधों से घिरी हुई है। यहाँ के आम…

सभी समाज में जीने के दो तरीके हैं, एक वैष्णव और दूसरा शैव जीवन शैली ! समाज को एक सुव्यवस्थित तरीके से चलाने के लिए वैष्णव ने संचय, गृहस्थ और पितृ तर्पण को नितांत आवश्यक कर्म कहा है, क्योंकि यह…

शैव समाज लोगों के एक ऐसे समूह या समुदाय को कहते हैं, जो एक साथ रहते हैं और अपनी संपत्ति, संसाधनों, आय और जिम्मेदारियों को आपस में साझा करते हैं। इस व्यवस्था में व्यक्तिगत (निजी) संपत्ति की बजाय सामूहिक संपत्ति…

शैव ग्राम की सर्व कर्म साधना “जाति संघर्ष से मुक्ति और समता मूलक समाज का निर्माण” की दिशा में एक बड़ी पहला है ! आज मानव सभ्यता भौतिक और तकनीकी विकास के अपने चरम बिंदु पर खड़ी है। हमारी उंगलियों…

कंक्रीट के जंगल में कैद मानवता की मुक्ति के लिए निर्मित ‘शैव ग्राम’ 12 एकड़ में फैली एक बेहद खूबसूरत और शांत प्राकृतिक जीवन की अनुभूति है। इसे साक्षात ईश्वर के घर के रूप में बनाया गया है। यहाँ साधकों…

तेज और प्रज्ञा के मिलन से ही वह स्वतंत्र विचार उत्पन्न होता है, जो मनुष्य को भीड़ से निकालकर एक श्रेष्ठ विचारक बनाता है, उसके कुछ विशेष ग्रहीय योग होते हैं । वैदिक ज्योतिष में सूर्य को हमारी आत्मा, प्राण…

2032 के महाविनाश की राख से फूटता भविष्य का धर्म मनुष्य ने अपने अहंकार, कृत्रिम उपभोक्तावाद और अंधी भक्ति के मद में इस स्वर्ग जैसी पृथ्वी को विनाश के कगार पर ला खड़ा किया है। जब भविष्य के महाविनाश का…

भारतीय दर्शन का एक मूलभूत और शाश्वत सिद्धांत है, “शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्”। अर्थात्, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन जीवन के सभी सर्वोच्च लक्ष्यों की प्राप्ति का प्रथम साधन यह मानव शरीर ही है। इसलिए, इस शरीर की रक्षा और…

भगवान कबीले से साम्राज्य तक मानव सभ्यता के क्रमिक विकास में ‘ईश्वर’ या ‘देवता’ की अवधारणा कभी स्थिर नहीं रही। धर्म का वह स्वरूप जिसे आज हम देखते हैं, वह एक लंबी और बेहद रोचक ऐतिहासिक यात्रा का परिणाम है।…