उच्च चेतना के महापुरुषों के लिए प्राकृतिक चिकित्सा केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि उनके भौतिक शरीर (पिण्ड) को ब्रह्मांडीय ऊर्जा के प्रचंड प्रवाह के बीच जीवित और संतुलित रखने का एकमात्र विशुद्ध वैज्ञानिक व्यवस्था है।
जब चेतना पूरी तरह से ‘स्व में स्थिर’ हो जाती है, तो शरीर एक अत्यंत संवेदनशील जैविक यंत्र बन जाता है। इस अवस्था में केवल प्राकृतिक चिकित्सा ही वह माध्यम है जो शरीर की आवृत्ति को बिना किसी कृत्रिम हस्तक्षेप के ब्रह्मांड की लय के साथ जोड़ सकती है।
उच्च चेतना का सीधा अर्थ है, स्नायुतंत्र में ऊर्जा का ‘हाई वोल्टेज’ प्रवाह। जब न्यूरॉन्स और नाड़ियां इस असीम ऊर्जा को धारण करती हैं, तो शरीर में भारी घर्षण और ताप उत्पन्न होता है। तब प्राकृतिक चिकित्सा सीधे पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) का उपयोग करती है।
जब ऐसे व्यक्ति का शरीर प्राकृतिक मिट्टी (मड बाथ) या ठंडे जल के संपर्क में आता है, तो वह मिट्टी और जल एक ‘अर्थिंग वायर’ की तरह काम करते हैं। वे शरीर के भीतर पल रहे अतिरिक्त खगोलीय ताप और विद्युत तरंगों को सोख लेते हैं, जिससे स्नायुतंत्र को तुरंत विश्राम मिलता है और शरीर टूटने से बच जाता है।
आधुनिक दवाएं शरीर के प्राकृतिक रक्षा तंत्र को ‘कमांड’ देकर उसे अपने तरीके से काम करने पर मजबूर करती हैं। लेकिन एक उच्च चेतना वाले व्यक्ति की ‘प्राण शक्ति’ पहले से ही अत्यंत जागृत होती है। इसलिये उन्हें किसी अन्य कृतिम रसायन की आवश्यकता नहीं है !
प्राकृतिक चिकित्सा बाहर से कोई दवा नहीं देती; यह केवल शरीर को उपवास, विश्राम, धूप और जल के माध्यम से वह स्थान देती है, जहाँ शरीर का अपना भीतरी विज्ञान खुद को ‘रिपेयर’ कर सके। यह शरीर की स्वाभाविक बुद्धिमत्ता में कोई बाहरी रासायनिक बाधा उत्पन्न नहीं करती।
जिस प्रकार मन को शुद्ध करने के लिए मानसिक वृत्तियों और संस्कारों का शोधन आवश्यक है, उसी प्रकार शरीर की कोशिकाओं में भी पिछले आघातों और विकारों की स्मृतियां दर्ज होती हैं। प्राकृतिक चिकित्सा शरीर की एक गहरी ‘संस्कार चिकित्सा’ है।
यह रसायनों के माध्यम से बीमारी को दबाने के बजाय, पसीने, उपवास और प्राकृतिक लेप के जरिए कोशिकाओं में गहरे बैठे विष को बाहर निकालती है। यह प्रक्रिया शरीर को भीतर से इतना खोखला और शुद्ध कर देती है कि वह उच्च ब्रह्मांडीय ऊर्जा के लिए एक आदर्श बांसुरी बन जाता है।
सिंथेटिक दवाएं और अस्पतालों का कृत्रिम वातावरण एक महापुरुष की अत्यंत उच्च और सात्विक ऊर्जा के साथ सीधा टकराव पैदा करते हैं। इसके विपरीत, जब वे एक प्राकृतिक इको-कम्यून या ऐसे ग्राम्य परिवेश में रहते हैं जहाँ शून्य-बजट प्राकृतिक जीवनशैली हो, चारों ओर देशी बीजों से उपजाए गए पौधे हों और मिट्टी की स्वाभाविक गंध हो, तो वह पूरा पारिस्थिकीय तंत्र उनके शरीर के लिए एक प्राकृतिक अस्पताल बन जाता है। प्रकृति की अपनी एक ‘रेजोनेंस’ होती है, जो बिखरी हुई शारीरिक ऊर्जा को स्वतः समेट लेती है।
प्राकृतिक चिकित्सा महापुरुष के उस मनोविज्ञान का पूर्णतः समर्थन करती है, जहाँ वह रोग से लड़ता नहीं, बल्कि उसे स्वीकार करता है। जब रोग रूपी विष शरीर में उठता है, तो प्राकृतिक चिकित्सा उसे दबाकर भगाने के बजाय, शरीर को उस विष को पचाने (नीलकंठ की तरह) की क्षमता देती है।
व्यक्ति दर्द या रोग को ‘देखता’ है, उसका साक्षी बनता है, लेकिन उसकी चेतना खंडित नहीं होती। प्राकृतिक चिकित्सा शरीर पर कोई तामसिक प्रभाव (जैसे नींद या बेहोशी) नहीं डालती, जिससे व्यक्ति का ध्यान और जाग्रत अवस्था पूरी तरह सुरक्षित रहती है।
संक्षेप में महापुरुष अपनी चेतना में जी रहा होता है। जब चेतना प्रकृति के साथ एक हो चुकी है, तो शरीर का उपचार भी उसी प्रकृति के पांच तत्वों से होना चाहिये यही ब्रह्माण्ड की निर्दोष चिकित्सा प्रक्रिया है।
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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