आपने भी ने अपने जीवन में यह अनुभव किया होगा कि जब हम कोई ऐसा काम करते हैं जिसमें हमारी कोई रुचि नहीं होती, तो हमें बार-बार भूख लगती है, थकान हावी होने लगती है और मन किसी न किसी बहाने काम से भागने की कोशिश करता है।
इसके ठीक विपरीत, जब हम अपने मनपसंद काम में डूबे होते हैं, तो घंटों बीत जाने पर भी न तो भूख का अहसास होता है और न ही प्यास का। अक्सर हम इसे एक सामान्य मनोवैज्ञानिक स्थिति मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन आधुनिक विज्ञान, विशेषकर तंत्रिका विज्ञान और जीव विज्ञान, अब यह पूरी तरह प्रमाणित कर चुका है कि ‘उमंग’ केवल एक भावना नहीं है, बल्कि हमारे शरीर को संचालित करने वाला एक वास्तविक भोजन और सबसे शुद्ध ऊर्जा है।
जब हम कोई उबाऊ काम करते हैं, तो हमारे मस्तिष्क को अपना ध्यान भटकने से रोकने के लिए बहुत अधिक ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है। हमारा मस्तिष्क शरीर के कुल वजन का केवल दो प्रतिशत होता है, लेकिन यह शरीर की बीस प्रतिशत ऊर्जा की खपत करता है। अरुचिकर काम के दौरान मस्तिष्क के ‘प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स’ को जबरन एकाग्र होने के लिए अतिरिक्त ग्लूकोज जलाना पड़ता है। जैसे ही ग्लूकोज का स्तर गिरता है, शरीर तुरंत ऊर्जा की मांग करता है और हमें तेज भूख लगने लगती है।
इसके साथ ही, उबाऊ काम करने से मस्तिष्क में खुशी का अहसास कराने वाले रसायन ‘डोपामाइन’ का स्राव लगभग शून्य हो जाता है। मस्तिष्क इस उदासी की भरपाई के लिए किसी त्वरित ‘इनाम’ की तलाश करता है, जो अक्सर मीठे या तले-भुने भोजन के रूप में सामने आता है। यही कारण है कि बोरियत में लगने वाली भूख शारीरिक कम और मानसिक ज्यादा होती है।
मन मारकर किया गया काम मस्तिष्क के लिए एक प्रकार का तनाव है, जो शरीर में ‘कोर्टिसोल’ नामक स्ट्रेस हार्मोन का स्राव बढ़ा देता है। तनाव की इस स्थिति में हमारा तंत्रिका तंत्र ‘फाइट या फ्लाइट’ (लड़ो या भागो) मोड में चला जाता है, जिससे पाचन तंत्र की ओर रक्त का प्रवाह काफी कम हो जाता है।
ऐसी स्थिति में हम जो भी खाते हैं, वह शरीर की वास्तविक जरूरत नहीं होती बल्कि भावनाओं को शांत करने का एक प्रयास होता है। वह भोजन ठीक से पचने के बजाय आंतों में सड़ने लगता है और ‘ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस’ पैदा करता है। यही अतिरिक्त कैलोरी सीधे पेट के आसपास वसा (फैट) के रूप में जमा हो जाती है, जो आगे चलकर मेटाबोलिक सिंड्रोम, टाइप-2 डायबिटीज, मोटापा और हृदय रोगों जैसी हजारों बीमारियों का मुख्य कारण बनती है।
इसके ठीक विपरीत, जब व्यक्ति अपनी आत्मा और मन के अनुरूप काम करता है, तो वह उमंग से भर जाता है। मनोविज्ञान की भाषा में इसे ‘फ्लो स्टेट’ कहा जाता है। इस अवस्था में शरीर के भीतर एक अद्भुत रासायनिक चमत्कार होता है। मस्तिष्क लगातार चार महत्वपूर्ण रसायनों डोपामाइन, ऑक्सीटोसिन, सेरोटोनिन और एंडोर्फिन, का उत्पादन करता है।
इन हैप्पी हॉर्मोन्स के प्रभाव में तंत्रिका तंत्र इतना शांत और ऊर्जावान रहता है कि शरीर बाहरी उत्तेजनाओं की मांग करना बंद कर देता है। उमंग की इस स्थिति में मस्तिष्क पेट से आने वाले ‘ग्रेलिन’ (भूख लगाने वाले हार्मोन) के सिग्नल्स को पूरी तरह से ब्लॉक कर देता है। व्यक्ति अपने काम में इतना लीन हो जाता है कि भूख-प्यास की जैविक सूचनाएं उसकी चेतना तक पहुंच ही नहीं पातीं।
उमंग में जीने वाले व्यक्ति के शरीर में ऑक्सीजन का प्रवाह सबसे बेहतर स्थिति में होता है। इस प्रचुर ऑक्सीजन की उपस्थिति में हमारी कोशिकाओं के भीतर मौजूद माइटोकॉन्ड्रिया (शरीर का पावरहाउस) पहले से जमा वसा को बहुत आसानी से ऊर्जा में बदलने लगता है। यह वह आंतरिक भोजन है जो व्यक्ति को बिना कुछ खाए भी घंटों तक बिना थके काम करने की शक्ति देता है।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की एक नई शाखा ‘साइकोन्यूरोइम्यूनोलॉजी’ यह स्पष्ट रूप से बताती है कि उमंग में रहने वाले व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता असाधारण रूप से मजबूत होती है। उमंग शरीर में क्रोनिक इन्फ्लेमेशन (सूजन) को कम करती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उमंग और खुशी हमारे डीएनए के सिरों पर मौजूद ‘टेलोमेयर’ के छोटे होने की गति को धीमा कर देती है, जिससे कोशिकाएं जल्दी बूढ़ी नहीं होतीं। मनुष्य का शरीर एक ऐसा अद्भुत यंत्र है, जो अन्न से ज्यादा विचारों और भावनाओं की ऊर्जा से काम करता है !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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