शोध पत्र
हमारे ब्रह्माण्ड में पृथ्वी अत्यन्त साधारण जीव के लिये निर्मित प्रशिक्षण स्थल है ! यहाँ पर जब उच्च चेतना स्तर के महापुरुष जीव के कल्याण के लिये जन्म ले लेते हैं, तो उन्हें ऊर्जीय अभ्यास अपनी उसी उच्च अवस्था में रहने का होता है !
लेकिन हमारा शाररिक पिण्ड उस उच्च अवस्था की ऊर्जा को बर्दास्त नहीं कर पाता है, तो यह पिण्ड धीरे धीरे ख़राब होने लगता है, और ऊर्जा के इस खेल को बड़े बड़े डाक्टर नहीं समझ पाते हैं ! और वह अपनी सामान्य चिकित्सा के द्वारा अनाड़ी मिस्त्री की तरह इस पिण्ड को और ख़राब कर देते हैं !
पृथ्वी का जैविक ढांचा मुख्य रूप से अस्तित्व को बचाए रखने और सामान्य जीवन जीने के लिए विकसित हुआ है। जब कोई महापुरुष गहन आत्म-साक्षात्कार की अवस्था में होता है, तो उसकी चेतना की आवृत्ति इस भौतिक जगत की सामान्य आवृत्ति से बहुत ऊँची हो जाती है।
पृथ्वी पर शरीर का निर्माण पंचमहाभूतों से हुआ है, और यह उस अनंत, असीम ऊर्जा को धारण करने के लिए स्वाभाविक रूप से तैयार नहीं होता। यह वैसा ही है जैसे किसी मिट्टी के साधारण बर्तन में खौलता हुआ तरल धातु डाल दिया जाए; बर्तन का चटकना या टूटना तय है।
हमारे शरीर का स्नायुतंत्र और मस्तिष्क एक सीमित वोल्टेज (ऊर्जा) को ही प्रोसेस कर सकते हैं। जब व्यक्ति ‘स्व’ में पूरी तरह स्थिर हो जाता है या ब्रह्मांडीय चेतना से जुड़ जाता है, तो भीतर ऊर्जा का एक प्रचंड प्रवाह (जिसे योग में कुण्डलिनी या प्राण ऊर्जा का जागरण कहा गया है) शुरू हो जाता है।
यह उच्च ऊर्जा शरीर की नाड़ियों, न्यूरॉन्स और ग्रंथियों पर अत्यधिक दबाव डालती है। इस लगातार ‘हाई-वोल्टेज’ के कारण शरीर का रोग प्रतिरोधक तंत्र भ्रमित हो जाता है और कोशिकाएं समय से पहले ही क्षरित होने लगती हैं, जिससे शरीर रुग्ण दिखाई पड़ता है।
एक सामान्य डॉक्टर इस पिण्ड को केवल एक जैविक मशीन के रूप में देखता है। वह इस बीमारी को केवल रसायनों के असंतुलन या अंगों की खराबी मानकर भारी दवाओं (केमिकल्स) का प्रयोग करता है।
चूँकि वह उस बीमारी के मूल कारण यानी ‘ऊर्जा के अतिरेक’ को नहीं समझता है, इसलिए उसकी दवाएं शरीर की प्राकृतिक लय को और अधिक बिगाड़ देती हैं।
वह ऊर्जा को संतुलित करने के बजाय उसे रोग समझकर दबाने का काम करता है और अनाड़ी मिस्त्री की तरह, डॉक्टर इंजन के उस पुर्जे को हथौड़े से ठीक करने की कोशिश करता है, जो वास्तव में खराब नहीं है, बल्कि अत्यधिक ऊर्जा के कारण कांप रहा है।
ऐसी उच्च चेतना वाले महापुरुषों के शरीर को अस्पतालों की कृत्रिम व्यवस्था और रसायनों से अधिक प्राकृतिक जीवन की आवश्यकता होती है। जब बिजली का वोल्टेज बहुत अधिक होता है, तो उसे ‘अर्थिंग’ की जरूरत होती है।
इसी प्रकार, उच्च आध्यात्मिक ऊर्जा को संतुलित करने के लिए शरीर का सीधे मिट्टी से संपर्क, शुद्ध सात्विक आहार, खुले जंगल या प्राकृतिक पारिस्थिकीय तंत्र में रहना सबसे कारगर होता है। प्रकृति स्वयं अपनी लय से उस अत्यधिक ऊर्जा को सोख लेती है और शरीर को टूटने से बचाती है।
महापुरुषों का शरीर उनकी चेतना के विकास का मूल्य चुकाता है, और यही कारण है कि वे भौतिक दृष्टि से अस्वस्थ दिखते हैं, पर भीतर से पूर्णतः शांत और मुक्त होते हैं !!
योगेश कुमार मिश्र
संस्थापक
सनातन ज्ञान पीठ
ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान
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